बनारस। अमूमन श्‍मशानघाट का नाम सुनकर आपके जेहन मे मातमी माहौल का नजारा कौंध जाता होगा। लेकिन, शमशान घाट पर ही अगर आपको तवायफ़ों के ठुमके दिखाई देने लगे तो जाहीर है आपको अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं होगा।
जी हां, पुरानों मे महाशमशान के नाम से विख्यात काशी के मणिकर्णिका घाट पर आपको कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल सकता है। चिता की लपटों के साथ कमर लचकाती और अपने ठुमकों के जरिये तवायफें न सिर्फ पूरी रात महफिल को जवान बनाए रखती हैं, बल्कि इसके एवज मे वो के रुपये की भी मांग नहीं करतीं। और तो और महाशमशान पर अपने हुस्न का जलवा बिखेरने के लिए नगरवधुओं मे बकायदा होड मची रहती है।
नवरात्रि की सप्तमी तिथि को बाबा महाशमशान का वार्षिक शृंगारोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान सुबह-सवेरे बाबा की भव्य आरती के बाद शाम ढलते-ढलते नगर वधुएं पहले स्वरंजली प्रस्तुत करती हैं, इसके बाद शुरू होता है धधकती चिताओं के बीच घुंघरुओं की झंकार का सिलसिला। ‘जिंदगी’ और ‘मौत’ का एक साथ एक ही मुक्ताकाशीय मंच पर प्रदर्शन किसी को भी आश्चर्य से भर सकता है।
मान्यता है की इस महानिशा को महा शमशान पर नृत्य करने वाली नगरवधुओं को उनके अगले जन्म मे इज्जत भरी जिंदगी जीने का सौभाग्य प्राप्त होता है। तवायफें यहां पूरी रात फिल्मी गीतों पर ठुमके लगाती है और भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं की, अगले जनम मे उन्हें अपना जिस्म न बेचना पड़े।
महाशमशान मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर बताते हैं की ऐसी महफिल केवल और केवल अड़भंगी भोले की नागरी काशी मे सज सकती है। इस दौरान पूरे महाशमशान को दुल्हन की तरह सजाया जाता है।
कहते हैं महा शमशान मे सजने वाली नगरवधुओं की इस महफिल का इतिहास राजा मानसिंह से जुड़ा हुआ है। हालांकि, चौबीसों घंटे और पूरे साल इस जगह पसारे रहने वाले मातमी माहौल को तोड़ने के लिए वाराणसी के विद्वानों ने इस परंपरा का रूप दे दिया।
महाश्मशान मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर बताते है कि ऐसा माहौल केवल और केवल अड़भंगी भोले की नगरी काशी में ही सज सकता है। वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर नवरात्रि की सप्तमी को मातम नहीं बल्कि मौजमस्ती का आलम था। पूरे महाश्मशान घाट को दुल्हन की तरह सजाया गया था। एक तरफ नृत्य सगीत के लिए मंच लगा था तो दूसरी तरफ धू धू करके चिताएं भी जल रही थी।
हालांकि, श्मशान में सजने वाली संगीत की इस महफ़िल का इतिहास राजा मानसिंह से जुड़ा हुआ बताया जाता है लेकिन पूरे साल इस महाश्मशान में रहने वाले मातमी सन्नाटे को भेदने के लिए वाराणसी के लोंगो ने इसे परंपरा का रूप दे दिया है। जिसे सैकड़ों साल पुराना भी बताया जाता है।
मान्यता ये भी है की जो भी तवायफ बाबा महाशमशाननाथ के इस मुक्ताकाशीय दरबार मे नृत्य साधना करेगी उसका अगला जन्म नारकीय नहीं होगा। यही कारण है की साल दर साल यहां नृत्य साधना करने के लिए तवायफ़ों, गणिकाओं और बार बालाओ मे होड़ मची रहती है। और तो और बाबा के इस दरबार मे अपनी प्रस्तुति देने के लिए दिल्ली, जयपुर, चंडीगढ़, अहमदाबाद, काठमांडू, कोलकाता, मुंबई और हैदराबाद से गणिकाएं हर साल यहां आती है।
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