नज़र हो ख़्वाह कितनी ही हक़ाइक़-आश्ना,
फिर भी हुजूम-ए-कशमकशमें आदमी घबरा ही जाता है।  
हवाएं ज़ोर कितना ही लगाएं आंधियां  बनकर,  
मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है। ।
उर्दू अदब के बेहतरीन शायर जोश मलीहाबादी की ये पंक्तियां काशी की इस बेटी के ऊपर सटीक बैठती है।  जो काशी में बहु बनकर आयी और सबके दिलों में बेटी बनकर छा गयी।  काशी में काश ही कोई ऐसा होगा जिसे योग गुरु पुष्पांजलि शर्मा का नाम न पता हो।  आखिर ये गज़ब की दृण इच्छा वाली लड़की है कौन और इसने यह मुकाम कैसे हासिल किया।
इन सब चीज़ों को टटोलने और पुष्पांजलि की अनकही कहानी को जानने के लिए टीम Livevns पुष्पांजलि के घर पहुंची। अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ पुष्पांजलि ने हमारा अभिवादन किया और भारतीय संस्कार के तहत चाय ठन्डे का न्योता दिया।  हमारे सहयोगी प्यास से इस गर्मी में तड़प रहे थे बस ठन्डे की बात सुनी और हां में सर  हिला दिया।
औपचारिकताओं के बाद झारखण्ड की इस बेटी की ज़िंदगी जब हमने जानी तो इसे लिखने की ज़रूरत नहीं अलबत इसे समझने की कोशिश की।  पेश है काशी की होनहार और गरीब महिलाओं को आत्मशक्ति से लड़ने का तरीका बताने वाली योग गुरु पुष्पांजलि शर्मा पर एक ख़ास एहसास।
झारखंड के एक पिछड़े कस्बे में माध्यमिक तक की पढ़ाई करने के बाद कम उम्र में ही एक लड़की घूंघट में शरमाने वाली पुरातन परंपरा की भेंट चढ़ा दी जाती है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद अपनी सकारात्मक सोच,  बालसुलभ हठ के आगे सास-ससुर को इस बात के लिए राजी कर लेती है कि वह आगे पढ़ेगी और अपने पैरों पर खड़ी होगी।
यह कहानी है उस व्यक्तित्व की जो वाराणसी में रहकर दुनियाभर में योग और फिटनेस की ज्योत जला रही है। नाम है पुष्पांजलि शर्मा और पहली नजर में उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। जब वह बताती हैं कि मैं पत्नी और मां भी हूं तो तमाम लोगों के चेहरे पर चमक आ जाती है। यह चमक इसलिए कि उन्हें यह भरोसा हो जाता है कि योग और जीवन को नियम-अनुशासन में बांधकर चलने से तन-मन सब अजेय रूप में परिलक्षित होने लगते हैं।

 

यही लड़की जब परीक्षा भवन में हाथभर घूंघट काढ़कर कापियों पर राजधानी एक्सप्रेस के मानिंद फाउंटेन पेन को गति देती है तो कक्ष निरीक्षक हैरत में पड़ जाते हैं। घूंघट की आड़ से जरूरत पड़ने पर उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी लोगों को हतप्रभ करती। यही लड़की गोरखपुर विश्वविद्यालय में एमए राजनीति शास्त्र में घोषित मेधावी छात्रों से कहीं ज्यादा नंबर लाती है।  यही लड़की जीवन के कंटीले सफर में संभलकर लेकिन मजबूती से चलने का जिद पाल लेती है तो तमाम पारिवारिक-सामाजिक अड़चनें उसका लोहा मानने लगती हैं।

आज यही लड़की पत्नी, मां और बहू के धर्म का निर्वाह करते हुए समाज सेवा की डगर पर चलनेवाली खास शख्सियत बन गई है। उसके मार्गदर्शन से हताश, निराश, बीमार और लाचार लोगों को नई रोशनी, नई ऊर्जा मिलती है।

पुलिस विभाग में सम्मानित पद पर कार्यरत पिता को देखकर पुष्पांजलि ने कभी सिविल सेवा में जाने का ख्वाब संजोया था। तैयारी भी शुरू कर दी थी। उस युग में शहरों में कंप्यूटर सामान्य घरों के लिए दुर्लभ हुआ करता था, पुष्पांजलि की जिद पर पिता ने पिछड़े कस्बे में तैनाती होने के बावजूद कंप्यूटर खरीदने का साहस किया। हालांकि तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में जब भी पुष्पांजलि उच्च शिक्षा और सिविल सेवा में जाने का अपना इरादा जतातीं तो पिता को छोड़ बाकी परिजन हतोत्साहित करते।

कुछ लोग तो यहां तक तंज करते कि अब ससुराल में जाकर हाकिम बनने का सपना पूरा करना।  यहां तो कामभर की पढ़ाई करा दी गई। गंवई मानसिकता के बीच झल्लाती, घुटती पुष्पांजलि की डोली सजने की बारी आई तो पिता के सामने विद्वान ससुर ने भरोसा दिया कि बेटा तुम जितना पढ़ना चाहोगी, हम तुम्हें पढ़ाएंगे। यहां तक कि प्राचीन विचारों, परंपराओं की पोषक सास ने भी मुस्कुराकर कहा था कि तुम बहू नहीं बेटी हो हमारी। हम तुम्हें बेटी की तरह दुलार देंगे …और आजादी भी।

 

बकौल पुष्पांजलि उस दिन सासू मां का प्यार जन्मदात्री माता से कहीं ज्यादा दिल की गहराईयों में नरम थपकी की मानिंद महसूस हुआ था। सासू मां ने विवाह के बाद अपनी घोषणाओं के कण-कण का पालन किया। कतिपय सदस्यों के विरोध के बावजूद वह साथ खड़ी रहीं। उच्च शिक्षा का रास्ता सुगम किया। देररात तक पढ़ाई के दौरान चुपके से किचन में चली जातीं और चाय बनाकर पहुंचा देतीं। सिर पर हाथ फेरते हुए कहतीं- बहुत देर हो गई है बेटा। अब सो जाओ। सासू मां की ममताभरी छांव ने गंवई परिवेश से विद्रोह कर उबरी पुष्पांजलि को संवेदनाओं की एेसी थाती दी कि उसे वह पल-पल सहेजती हैं। हर पक्ष, हर स्तर पर न्याय करती हैं।

 

घर में अवस्थागत व्याधियों से पीड़ित ससुर की देखरेख, दो बच्चों के करियर की चिंता और पति का ख्याल। यह सब पूरी शिद्दत से निबाहते हुए पुष्पांजलि ग्रामीण महिलाओं की सेहत, शिक्षा और स्वाबलंबन के लिए समर्पित नजर आती हैं। कभी बीमार-लाचार लोगों को देखकर भावुक हुईं पुष्पांजलि ने सिविल सेवा में जाने का इरादा छोड़ दिया।
पुष्पांजलि ने बताया की किसी ने राह सुझाई कि योग और फिटनेस के नियम से तन-मन को स्वस्थ बनाया जा सकता है। यह वही विधा है जिसमें अनर्गल दवाइयों का हस्तक्षेप नहीं है। बस, नियम अनुशासन और निरंतरता से स्वस्थ जीवन का निर्माण किया जा सकता है।
फिर क्या था मैंने योग और फिटनेस के प्रमुख कोर्स पूरे मनोयोग से कर डाले। केरल के योग आश्रम में गुरुकुल पद्धति  से मिली शिक्षा को आत्मसात किया। आधुनिक फिटनेस कोर्स के लिए महानगरों में शिक्षार्थी बनीं। अनुभव के लिए वहीं कई प्रतिष्ठित जिम में फिटनेस ट्रेनर के रूप में नौकरी की और जब वाराणसी लौटीं तो धन्वतंरि, चरक की नगरी को प्राचीन योग और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नए अवतार का आभास हुआ।

अपने क्षेत्र में वर्षों-वर्षों से एकाधिकार रखनेवालों के लिए पुष्पांजलि की दक्षता जलन का कारण बनी लेकिन एक जिद्दी और दृढ़ निश्चयी इस महिला ने हार नहीं मानी। लगन ने उसे कुछ दिनों में अलग पहचान दे दी। पुष्पांजलि ने अपनी इस विधा को कभी कमाई का साधन नहीं बनाया बल्कि वह इसके जरिेए जरूरतमंद, गरीबों, असहायों की मददगार बन गईं।

पुष्पांजलि ने जैतपुरा स्थित नारी संरक्षण गृह और रामनगर स्थित बाल सुधार गृह के रहवासियों की मनोदशा के बारे में पता चलने पर उन्होंने वहां अपने खर्चें पर कैंप लगाना शुरू किया। प्रशासनिक अनुमति से वहां लड़कियों, बच्चों में नकारात्मकता के बादल छांटने के लिए योगाभ्यास और मोटीवेशन क्लासेज चालू कीं।
यही नहीं स्वाबलंबन के लिए प्रोफेशनल कोर्स की संभावनाओं को साकार किया। कुछ ही महीनों में नारी संरक्षण गृह की लड़कियों ने अपने कल से तौबा कर आज की सुखद राह थाम ली। कुछ ने कुटीर उद्योग के गुर सीख लिये तो एक-दो ऐसी भी थीं जिन्होंने नर्स की ट्रेनिंग लेकर बीमारों की सेवा शुरू कर दी।

पुष्पांजलि की इस सकारात्मक अभियान की चर्चा पूरे देश में ही नहीं विदेशों में भी होने लगी।  पिछले दिनों वर्ल्ड बाडी बिल्डिंग और फिटनेस स्पाट्र्स फाउंडेशन के जनरल सेक्रेटरी डी पाल चुआ ने पुष्पांजलि को फिटनेस के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान और महिलाओं के सामाजिक उत्थान के बेहतरीन काम करने के लिए रजत पदक प्रदान किया।

वह यह मेडल और सर्टिफिकेट देने के लिए खुद वाराणसी आए। इससे पहले थाईलैंड के पटाया शहर में आयोजित वर्ल्ड  बाडी  बिल्डिंग और फिटनेस स्पोट्र्स स्पर्धा में पुष्पांजलि ने महिला विंग की असिस्टेंट मैनेजर के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। वहां भारतीय टीम ने कई पदक हासिल कर देश को गौरव प्रदान किया।

आयर की महिलाओं में जगाई आगे बढ़ने की आस
पुष्पांजलि ने बनारस के आदर्श गांव आयर की लड़कियों में शिक्षा और सेहत की अलख जगाई। जिनके घरवाले कभी स्कूल जाने की बात कहने पर खीझ जाते थे, वहां हर घर से लड़कियां पास के स्कूल में नियमित पढ़ाई करने जाती हैं। इन लड़कियों ने सुबह योगाभ्यास का अपना रुटीन बना लिया है। इस दौरान गांव की विवाहिताएं और बुजुर्ग महिलाएं भी योग करने आती हैं। गांव की दलित बस्ती में योग ने सोच और शिक्षा का अलग माहौल बना दिया है।

इस गांव की कुछ लड़कियों ने पुष्पांजलि की पहल पर जूडो कराटे  और स्वयं सुरक्षा के गुर भी सीख लिये हैं। आयर की नीलम ने बताया कि पहले है सब गाँव में कही अकेले जाते थे तो गाँव के लड़के हमपर छीटाकशी करते थे। जब से पुष्पांजलि दीदी ने हमें योग और कराटे की ट्रेनिंग दिलवाई है तब से हमें शोहदे नहीं छेड़ते। गांव की इन वीरांगनाओं को देखकर वे खुद-ब-खुद रास्ता बदल देते हैं।

पुष्पांजलि ने उन  बच्चों के लिए भी अलग-अलग समय में शिविर लगाए जो अपने माता-पिता के साथ कूड़ा बीनकर जीवनयापन करते है  उन्हें पढ़ाई की तरफ प्रेरित किया। यह एक जटिल काम था  लेकिन वह हार नहीं मानीं। आज की तारीख में 15-20 ऐसे बच्चे हैं जो सुबह-शाम माता-पिता के साथ कूड़ा बीनते हैं लेकिन दोपहर में  पास के सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने भी जाते हैं। इन बच्चों के लिए कापी, किताब, ड्रेस, फीस का इंतजाम खुद पुष्पांजलि कराती हैं। उन्हें कैसे सरकारी मदद मिले, इसके लिए भी उनका प्रयास दिखता है।

पुष्पांजलि ने गंवई महिलाओं  के लिए वाराणसी में योगसूत्र ग्राम यात्रा शुरू की है। योग को समाज में प्रभावी ढंग से प्रसारित करने के लिए उन्होंने योगसूत्र नाम की जो संस्था बनाई है, उसी के बैनर तले यात्रा का संचालन हो रहा है। यात्रा 21 जून तक 21 गांवों  में महिलाओं को योग सिखाएगी। इस यात्रा में चुनी गईं उत्साही महिलाओं को 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर वाराणसी शहर में प्रस्तावित भव्य समारोह का अहम हिस्सा बनाया जाएगा।
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