बनारस। ‘शादी के बाद हाफ पैंट पहनकर कैसे खेलेगी हमारी बहु, नहीं ऐसा नहीं होगा… आप को खेलना छोड़ना होगा।” इतना कहकर बनारस की शान अन्तराष्ट्रीय एथलीट नीलू मिश्रा खामोश हो गईं। दरअसल ये शब्‍द नीलू मिश्रा की सास के थे जो उन्‍होंने तब कहा था जब नीलू शादी के बाद अपने ससुरालवालों को एथलीट जारी रखने के लिए मनाने की कोशिश कर रहीं थीं।

43 वर्षीय नीलू आज भी अपनी सास के उन शब्‍दों को याद करती हैं। आज नीलू खुद भी एक मां हैं और अपने लाडले की जिंदगी बनाने के लिए वो सारे जतन करती हैं जो अमूमन देश की हर मां करती है। मदर्स डे पर आइए जानते हैं एक मां के रूप में कैसी हैं नीलू मिश्रा, साथ ही जानते हैं उनकी जिंदगी के कुछ अनछुए पहलू।

 

कि‍सी पहचान की मोहताज नहीं नीलू मि‍श्रा
आज नीलू मिश्रा किसी पहचान की मोहताज नहीं है। एक पत्‍नी, एक मां, एक बहु और एक जानी-मानी अन्‍तरराष्‍ट्रीय एथलीट नीलू मिश्रा ने काफी संघर्षों के बाद आज ये मुकाम हासिल किया है। बता दें कि शादी के पहले ही नीलू का सेलेक्शन इंडिया कैम्प में हुआ था और वो रेलवे में नौकरी करती थीं। शादी के बाद उनकी जिंदगी में काफी बदलाव आये। केवल इतना ही नहीं उन्‍होंने जीवन में कई उतार-चढ़ाव भी देखे, मसलन कई गंभीर बीमारियों से जूझते, भिड़ते और टकराते हुए नीलू मिश्रा ने संघर्षों पर विजय प्राप्‍त किया है।

 

बस्‍ती की बेटी, बनारस की बहू
बस्ती जिले की रहने वाली नीलू मिश्रा की शादी मैरीन इंजीनि‍यर आनंद दूबे से साल 1994 में हुई। शादी के वक़्त ही नीलू को राष्‍ट्रीय एथलीट कैम्प के लिए बुलावा आ गया था, पर शादी के बाद जब उन्होंने अपनी सास को इस बात से अवगत कराया तो उन्होंने साफ़ लहजों में इसका विरोध कर दि‍या। हालांकि‍ नीलू के मन में देश के लि‍ए ट्रैक पर दौड़ने की चाहत बनी रही। धीरे-धीरे समय बीता और पारि‍वारि‍क जि‍म्‍मेदारि‍यां भी बढ़ीं। आखि‍रकार शादी के 14 साल बाद उनके सपने को एक बार फिर पंख लगने शुरू हुए।

 

नहीं था यकीं रच देंगी इति‍हास
नीलू ने अपने पति को राजी किया और निकल पड़ी फिर से ट्रैक और फील्ड की दुनिया में जहां उन्होंने देश का मान बढाते हुए मास्टर्स एथलीट स्पर्धा में कई सारे मैडल जीते। नीलू ने बताया कि उनके पति को यकीन नहीं था कि‍ मैं ट्रैक पर कुछ भी कमाल कर पाउंगी, क्योंकि मै गंभीर बिमारी से जूझ रही थी। मै जब प्रक्टिस करने स्टेडियम जाती तो वो मुझे छुप-छुप के वहां देखने जाया करते थे। उन्हें यकीन नहीं था की मै कुछ कर पाऊंगी। उसके बाद जब मैं एशिया वर्ल्ड चैम्‍पि‍यनशि‍प में जीत कर आई तब जाकर लोगों को मेरी लगन पर वि‍श्‍वास हुआ।

परि‍वार और एथलीट ट्रैक
एक एथलीट होने के साथ-साथ नीलू एक मां भी हैं। परि‍वार और खेल के बीच सामंजस्‍य बि‍ठाना इतना भी आसान नहीं होता। नीलू कहती हैं, ”बेटे की देखभाल, परि‍वार की जि‍म्‍मेदारी और एथलीट के तौर पर पसीना बहाना, ये इतना भी आसान नहीं है। हमें टाइम मैनेजमेंट करना था और वो हमने किया। शुरू में बहुत दिक्कतें हुईं। जब मैंने 14 साल के गैप के बाद दुबारा शुरू किया उस वक़्त मेरा बेटा आकाश तब 8 साल का था (आज उसकी उम्र 20 साल है) और पति चूंकि‍ मैरीन इंजिनियर हैं इसलि‍ए ज्‍यादातर बाहर ही रहते थे। इसलि‍ए सबकुछ इतना आसां नहीं था। घरेलू कामों के अलावा मुझे तकरीबन 6 घंटे कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी लेकि‍न मैंने टाइम मैनेजमेंट के जरि‍ए कठि‍न लगने वाले इस काम को भी पूरा कि‍या।

बच्चों से दूर हो रही है माताएं
नीलू मानती हैं कि‍ भारत एक अनोखी संस्‍कृति‍ वाला देश है। हमारे देश की महि‍लाएं अन्‍यों की तुलना में ज्‍यादा स्‍ट्रांग होती हैं। आज भी यहां वर्किंग वि‍मेन के ऊपर बहुत ज्‍यादा वर्क लोड होता है। यही कारण है कि‍ ज्‍यादातर कामकाजी महि‍लाएं अपने बच्‍चों से दूर होती जा रही हैं। नतीजन बच्‍चे बि‍गड़ भी रहे हैं। ज्‍यादातर केस में बच्‍चों में डि‍प्रेशन भी देखा जा रहा है। एक मां की सबसे बड़ी जि‍म्‍मेदारी अपने बच्‍चों में अच्‍छे संस्‍कारों के बीज रोपना है। यकीनन कामकाजी महि‍लाओं के लि‍ए बच्‍चों के लि‍ए समय नि‍कालना ज्‍यादा कठि‍न होता है। ऐसी दशा में बच्‍चे कभी-कभी गलत रास्‍ते पर चल नि‍कलते हैं। मेरा तो यही मानना है कि‍ मां को अपने बच्‍चे को ज्‍यादा से ज्‍यादा वक्‍त देना चाहि‍ए।

मां ही रोक सकती है सामाजि‍क कुरीति‍यां
अन्तराष्ट्रीय एथलीट नीलू मिश्रा की मानें तो जब बच्‍चे को मां अच्‍छे संस्‍कार देती है तो बच्‍चों पर उनका प्रभाव पड़ना तय है। पि‍ता की अपेक्षा बच्‍चे मां से ज्‍यादा सीखते हैं ऐसे में बच्‍चों को अच्‍छे संस्‍कार देना ही मां का पहला फर्ज है। नीलू कहती हैं, ”दहेज आदि‍ कुरीति‍यों में महि‍लाओं पर होने वाले जुल्‍मों के पीछे भी घर की औरतें ही जि‍म्‍मेदार होती हैं। अगर एक सास ये चाह ले कि‍ उसकी बहु पर कोई भी अनैति‍क दबाव उसका बेटा नहीं डाल सकता तो घर में कभी भी दहेज आदि‍ के लि‍ए कलह नहीं हो सकता। समाज की कुरीतीयों को कंट्रोल करने के लि‍ए सबसे ज्यादा पावर अगर कि‍सी के पास है तो वह मां के पास ही है। क्‍योंकि‍ एक मां ही पूरे परि‍वार को नि‍यंत्रि‍त करके रखती है।

 

बच्‍चों को बनाएं संस्‍कारवान दोस्‍त
नीलू मि‍श्रा के अनुसर, ”ऐसा देखा जाता है कि‍ बच्चे आज कल मां बाप की रिस्पेक्ट नहीं करते। ठीक है कि वो बच्चों को दोस्त की तरह ट्रीट करते हैं पर आधुनिकता की दौड़ में संस्कार से दूर होना हमारे लिए खतरनाक होगा। दोस्ती होनी चाहिए पर संस्कार बच्चों को हर हाल में देना है, ऐसी सोच होनी चाहि‍ए।

 

बहु को बेटी माने सास
नीलू सभी सास से रि‍क्‍वेस्‍ट करती हैं कि‍ जैसे वो अपनी बेटियों को एवरेस्ट पर ले जाना चाहती हैं वैसे ही अपनी बहु को भी छूट दें क्योंकि उनके मां बाप ने भी अपनी बेटी के लिए सपने देखे होंगे।

 

स्पोर्ट्स कल्चर लाना होगा
हृदय और कि‍डनी की बीमारी को मात दे चुकीं नीलू कहती हैं, ”तीन से चार बार मै मौत के मुह में जाकर वापस आई हूं। मैं यही चाहती हूं की हमें खेल से जुड़ना चाहिए क्योंकि विदेश में हमने देखा है कि रोज शाम को मां बाप बच्चों को लेकर ग्राउंड में जाते हैं। हमारे यहां अभी स्पोर्ट्स कल्चर नहीं है। हमारे यहां के मां बाप बच्चों को लेकर स्टेडियम में आये ताकि वो भी फिट रहें और बच्‍चे भी फिट रहे।”
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