बनारस से हस्‍तिनापुर तक जाती है ये रहस्‍यमयी गुफा ! BHU खोलेगा इसके राज़

बनारस से हस्‍तिनापुर तक जाती है ये रहस्‍यमयी गुफा ! BHU खोलेगा इसके राज़

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बनारस। धर्म की नगरी काशी में अनेक रहस्‍य दबे हुए हैं। इनमें से कुछ उजागर हो चुकें है तो कुछ पर से पूरी तरह से पर्दा अभी उठना बाकी है। ऐसा ही एक रहस्य है शहर के पातालपुरी मठ में। जिस पर से पर्दा उठाने के लिए टीम Livevns  पातालपुरी मठ पहुंची। जहां मठ के नाम के अनुसार पातल तक जाने वाली एक गुफा का द्वारा खुला दिखाई दिया।

 

आखिर कहां तक गयी है यह गुफा? इसका निर्माण किसने कराया और तो और आखिर बनारस हिन्‍दू यूनिवर्सिटी आखिर क्‍यों करने जा रहा है इस गुफा पर रिसर्च ? इन सब पहलुओं पर से हम पर्दा उठाएंगे अपनी इस ख़ास रिपोर्ट में।

 

दरअसल, जोगीश्वर महादेव के पीछे के हिस्से में स्थित पातलपुरी मठ का नाम पातालपुरी क्यों पड़ा, पहले ये जानने का विषय। इसी सच्चाई को जानने के लिए जब हम पातालपुरी मठ पहुंचे तो वहां मठ के महंत बाबा बालक दास से हमारी मुलाकात हुई। उनसे जब हमने इस तथ्य के बारे में जानने की इच्छा ज़ाहिर की तो उन्होंने कई रोचक चीज़ें बताईं जो शायद ही आम जनमानस को पता हो। इस पातलपुरी मठ में पाताल को जाने वाली गुफा के रहस्य से उन्होंने ही पर्दा उठाया।


काशी खंड में है गुफा का ज़िक्र  
पातलपुरी मठ के महंत बाबा बालक दास ने बताया कि इस मठ में जो गुफा है उसके बारे में काशी खंड में भी ज़िक्र आया है –

 

‘विश्वेशं माधव ढूंढी दंडपाणि। वन्दे काशी गुहां गंगा भवानी मणिकर्णिका।।

ये वो वाक्य हैं जो इस गुफा के बारे में कशी खंड में वर्णित हैं। कहते हैं कि यह गुफा द्वापर काल की है। जिसे गंगापुत्र भीष्म पितामह ने बनाया था।


इसी रास्‍ते हस्‍थिनापुर तक भागे थे भीष्म

बाबा बालक दास ने बताया कि द्वापर युग में काशी नरेश ने अपनी तीन बेटियों अम्बा, अम्बे और अम्बालिका का स्वयंवर आयोजित किया था। उन्होंने देश और दुनिया के सभी राजा-महराजाओं को  स्वयंवर में पधारने का न्‍यौता भेजा, किंतु हस्तिनापुर के राजा को इस स्वयंवर का न्योता नहीं दिया गया।

 


जिसके बाद गंगापुत्र भीष्म खुद काशी आये और क्रोध में उन्होंने काशी नरेश की तीनो बेटियों का हरण कर लिया। उन्हें ढूंढने के लिए काशी नरेश ने अपनी सेना उनके पीछे लगा दी। मगर भीष्म उनकी सेना से झगड़ा करना नहीं चाहते थे। कहते हैं कि भीष्‍म ने आज जहां पातालपुरी मठ है वहां से भूमि में एक तीर छोड़ा जो गुफा बनाते हुए सीधा हस्तिनापुर निकला।  इसी रस्ते से भीष्मपितामाह अपने रथ के साथ हस्तिनापुर तक गए। तब से ही यह गुफा आजतक यहां मौजूद है।

 

अम्बा बनी भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण  
हस्तिनापुर पहुंचकर भीष्म ने अपने दो भाइयों चित्रवीर और विचित्र वीर का अम्बे और अम्बालिका से विवाह करा दिया। भीष्‍म अम्बा को वो वापस छोड़ देना चाहते थे। अम्बा ने तब भीष्म से कहा था, आप मुझे हरण कर लाये हैं, अब आपको ही मुझसे विवाह करना पड़ेगा। तब भीष्म ने अपने ब्रह्मचर्य और भीषण प्रतिज्ञा की बात कहकर अम्‍बा को मना कर दिया। इससे नाराज होकर अम्बा ने श्राप दिया अगले जन्म में मैं शिखंडी के रूप में जन्‍म लूंगी और आपकी मृत्‍यु का कारण बनूंगी । आखिरकार अम्‍बा का शाप सही साबित हुआ और कुरुक्षेत्र के रण में भीष्‍म पितामह की मौत का कारण शिखंडी ही बना।

 


रिसर्च करने गुफा में गए अंग्रेज़ आज तक नहीं लौटे 

दुबारा लौटते हैं पातालपुरी मठ के गुफा के रहस्‍य की ओर। जैसा कि मठ के महंत बाबा बालक दास  पहले ही बता चुके हैं कि इस गुफा का काशीखण्ड और स्कंदपुराण में भी वर्णन मिलता है। बाबा ने बताया कि सन 2003 में मठ के जीर्णोद्धार के समय मैंने भी अंदर जाने का प्रयास किया, करीब 30 फिट जाने के बाद मेरा दम घुटने लगा और मैं वापस आ गया।

 


उन्‍होंने बताया कि आज से कई वर्ष पहले इस गुफा के रहस्य को जानने के लिए दो विदेशी स्कॉलर आये थे। उन्हें तत्कालीन महंत जी ने मना किया की आप अंदर न जाएं। अंदर ऑक्सीजन की कमी है। इसपर वो लोग बोले की हमारे पास ऑक्सीजन सिलेंडर है हमें कोई दिक्कत नहीं होगी और वे दोनों  इस गुफा में चले गए। काफी दिनों तक जब वो जब नहीं लौटे तो पुलिस को सूचित किया गया। जिसके बाद पुलिस ने इस गुफा के दरवाजे को बंद करा दिया।

 

बिना गुफा के दर्शन के काशी दर्शन अधूरा
बाबा बालक दास के अनुसार यह गुफा द्वापर काल की है और काशी दर्शन में इस गुफा का बहुत महत्त्व है। यहां दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। यदि आप भी काशी दर्शन का लाभ लेना चाहते हैं तो आपको इस गुफा के दर्शन करना अनिवार्य है।

 

कई इतिहासकारों ने लिखा गुफा का इतिहास
हमने गुफा की सच्चाई जानने के लिये जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास डिपार्टमेंट के प्रोफ़ेसर राजीव श्रीवास्तव से बात की तो उन्‍होंने भी इसके इतिहास पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि यह गुफा इतिहास में दर्ज है। समय-समय पर भारतीय इतिहासकारों के साथ-साथ विदेशी इतिहासकारों ने भी इस गुफा का वर्णन अपनी किताबों और रिसर्चों में किया है। इस गुफा के कई पुख्ता सुबूत भी मिले हैं।

 


बीएचयू करेगा शोध
डॉ राजिव श्रीवास्तव ने बताया कि इस गुफा के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए बीएचयू का इतिहास विभाग जल्‍द ही रिसर्च शुरू करने वाला है। इस गुफा के बारे में कई अनकहे तथ्यों से बीएचयू पर्दा उठाएगा।

 

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