बनारस  के पतित पावन जननी के तट पर स्थित काशी जहा मंदिरो , मठो , साधू , संतो ,विद्वानों ,आचार्यो और राजनेताओं की विख्यात नगरी हैं। वही इस देश की स्वतंत्रता  के खातिर भारत मां के चरणों में अपने प्राणो की आहुति देने वाले महान क्रांतिकारियों की कर्म स्थली भी रही हैं। इसी में एक महान क्रांतिकारी का नाम आता हैं। जिसका नाम हैं चंद्रशेखर आज़ाद। बनारस में चंद्रशेखर ने शिक्षा ग्रहण करने की नियत से क़दम रखा था पर इस क्रांतिकारी को बनारस के केन्द्रीय कारागार में 12 बेतों की सज़ा भी मिली। शायद यही से उनको आज़ाद का लकब भी मिला क्योंकि फिर कभी इतिहास में उनके पकडे जाने का वाकया नहीं मिलता। हमने केन्द्रीय कारागार और चंद्रशेखर आज़ाद से काशी से जुड़े हर पहलू की पड़ताल की पेश है देश की आज़ादी पर चंद्रशेखर आज़ाद पर एक विशेष रिपोर्ट।

काशी के असहयोग आन्दोलन के पहले क्रांतिकारी
राष्ट्रिय संस्कृत कालेज कमच्छा और काशी विद्यापीठ के कुमार विद्यालय के छात्र रहे आज़ाद संस्कृत विद्यालय के पास मठ में ही रहते और अखाड़ा भी लड़ा करते थे। उक्त बातें महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पत्रकारिता विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ विनोद कुमार सिंह ने बताई। उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर के जीवन में जो क्रांतिकारी परिवर्तन आया वो काशी से ही आया था। जब महात्मा गांधी ने असहयोग आन्दोलन शुरू किया तो उनका आकर्षण गांधी वादी विचारधारा की तरफ उनका आकर्षण था और आज़ाद इस आन्दोलन में कूद गये। वो काशी के पहले असहयोग आन्दोलनकारी थे जो गिरफ्तार हुए।

जज को नाम बताया आज़ाद
डॉ विनोद सिंह ने बताया कि चंद्रशेखर तिवारी को आज़ाद का नाम वाराणसी में ही मिला। छात्रों के साथ गोदौलिया चौराहे पर सत्य्ग्राह कर रहे आज़ाद को पुलिस पकड कर ले गई और उन्हें जज के सामने पेश किया गया। सुनवाई के दौरान ,जब चंद्रशेखर से जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने बड़े स्वाभिमान के साथ अपना नाम “आज़ाद ” पिता का नाम ” स्वाधीन ” तथा पता “जेलखाना ” बताया। तब से उनके नाम के साथ चंद्रशेखर तिवारी के बजाय “चंद्रशेखर आज़ाद” के नाम जुड़ गया ।

मिली 12 बेतों की सजा
आज़ाद की इस दृढ़ता से नाराज़ जज ने उन्हें 12 बेतों की सज़ा सुनाई। उस समय उन्हें शिवपुर स्थित केन्द्रीय कारागार में 12 बेतों की सज़ा दी गयी। जिसमे वो हर बेंत पर भारत माता की जय, महात्मा गांधी जिंदाबाद और वन्देमातरम के नारे लगाये थे।

जेलर ने कहा मांग लो माफ़ी
इतिहासकारों की माने तो केन्द्रीय कारागार के तत्कालीन जेलर गंडा सिंह उन्हें अल्पवयस्क होने केर कारण उनसे भावनावश माफ़ी मांगने की बात कही। स्वाधीनता के दीवाने फौलादी व्यक्तित्व वाले चंद्रशेखर भला स्वाभिमान के विपरीत जेलर की राय कैसे स्वीकार कर लेते। अंततः सेंट्रल जेल में उन्हें 12 बेत मारे गए।

स्मृति को संरक्षित किया गया है जेल में
वाराणसी के केन्द्रीय कारागार में आज भी इस स्मृति को संजो के रखा गया है और रोज़ इस स्मृति स्थल पर बनी आज़ाद की प्रतिमा पर फूल चढ़ाया जाता है। केन्द्रीय कारगार के जेल सुपरिटेंडेंट अम्बरीश गौड़ ने बताया कि केन्द्रीय कारगार में वह स्थल आज भी संजोकर रखा गया है जहां चंद्रशेखर आज़ाद को असहयोग आन्दोलन के दौरान बेंत मारने की सज़ा दी गयी थी।

इस 12 बेंत ने क्रांतिकारी आज़ाद के मन में हिंसा वादी विचारधारा का बीज बो दिया था। आज़ाद भारत की आज़ादी के गरमपंथी गुट के सबसे प्रमुख क्रांतिकारी थे। वाराणसी से आज़ाद का नाम पाने वाले आज़ाद दुबारा कभी पकडे नहीं गये और अंतिम समय भी वो खुद अपनी गोली से इलाहबाद अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए।

 

Comments