बनारस। चार बार सरकार और खेल मंत्रालय का दरवाज़ा खटखटाकर परेशान हो चुकी काशी की प्रशांति को जब पांचवीं बार में अर्जुन एवार्ड के लिए नामित किया गया तो उनके साथ-साथ उनकी पांच बहनों का सपना भी पूरा हुआ। पिछले 15 साल से खेल को ही अपना सबकुछ मानने वाली प्रशांति को अर्जुन पुरस्‍कार मिलते ही हर तरफ खुशियां हैं। अर्जुन पुरस्‍कार को लेकर ममता की छांव में अपने घर वाराणसी लौटी प्रशांति से टीम livevns ने कई पहलुओं पर बात की। पेश है काशी की बेटी और अर्जुन पुरस्कार विजेता प्रशांति सिंह पर एक विशेष रिपोर्ट।

”पांडवों में अर्जुन भी तीसरे नंबर पर थे और मै भी तीसरे नंबर की हूं और हम सभी बास्केटबाल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। तीसरे नंबर पर होने की वजह से यह अर्जुन पुरूस्कार भी मेरे खाते में ही लिखा था। जिसे पाकर मै बहुत खुश हूं।” उक्त बातें कहते हुए अर्जुन एवार्ड विजेता प्रशांति सिंह अपने अतीत में खो गईं। बास्केटबाल में पहली बार किसी महिला खिलाड़ी को खेल रत्न के बाद प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से काशी की बेटी को सम्मानित किया गया है। इस पुरस्कार को उन्होंने अपने मां बाप को समर्पित किया है। साथ ही अपने सभी कोच का धन्यवाद दिया।

मां के ऊपर था सोशल प्रेशर 
शार्ट्स, सैन्डोज़ और टीशर्ट पहनकर लड़कों के साथ खेल रहे हैं। ये देखकर लोगों ने कई बार मां को कहा की इन्हे कहिये टीचर बने। हमने हमेशा लड़कों के साथ खेला कभी लड़का लड़की नहीं सोचा। एक बार मेरी बहन दिव्या से एक आदमी ने कहा था मुझे याद है कि क्या करते हो तुम लोग दिन भर भागते दौड़ते हो तुम्हारी मम्मी को दिन भर तुम्हारे कपडे धोने पड़ते हैं। घर का काम किया करो भागना दौड़ना छोडो। तो यहां का वो माहौल ही नहीं है। आप सिर्फ लड़कियों को एक सीमा में बांध रहे हो हमारा काम बस क्या घर के कामों में हाथ बटवाना है।



खुद को बनायें मज़बूत 
खेल में प्रतिस्पर्धा हमेशा आती है लेकिन हमें अपने प्रतिद्वंदी से लड़ने के बजाये खुद को मज़बूत करने में वक़्त बिताना चाहिए। ये कहना है अर्जुन पुरुस्कार विजेता प्रशांति सिंह का। उन्होंने कहा कि खिलाड़ी को फिटनेस के साथ साथ दिमाग से भी मज़बूत होना चाहिए। क्योंकि इस 15 साल के कैरियर में बहुत सारी चीजें सामने आई और बहुत सी चीजों को सामने नहीं आने दिया और उससे लड़कर आज इस मुकाम पर पहुंची हूं। कभी कभी इंजरी होती है कभी कभी टीम में और कभी कभी फेडरेशन में भी होता है पर स्पोर्ट्स में अगर आप थोड़ा सा भी मौक़ा देंगे तो आप पीछे हो जायेंगे। इसलिए रुकिए मत चलते रहिये।

बचपन से लड़कों के साथ सीखा बास्केटबाल 
प्रशांति ने बताया कि हमारी दीदी रानी मुरारका इंटर कालेज में पढ़ती थी। मेरे परिवार में मेरे मम्मी पापा स्पोर्ट बैकग्राउंड से नहीं थे। उस समय उदय प्रताप कालेज में स्पोर्ट्स अथारटी ऑफ़ इण्डिया के सेंटर के कोच अमरजीत सिंह ने मेरी बड़ी बहन प्रियंका को बुलाया और उसे खेलता देख कर दिव्या भी गयी खेलने, वो बहुत टैलेंटेड थी। उसका जूनियर में सेलेक्शन हुआ। उसके बाद मै गयी और शुरू किया खेलना। इसी दौरान बहुत कम उम्र में मेरा सेलेक्शन हुआ। जिसके बाद एमटीएनएल की दिल्ली टीम में मेरा सेलेक्शन हुआ। जिसके बाद हमने उसमे खेल कर 12 साल की चैम्पियन रेलवे को हरा दिया।

बास्केटबाल का माहौल बनाया अमरजीत सर ने 
प्रशांति ने बताया कि हमारे घर में जो बास्केटबाल का माहौल है। वो अमरजीत सर का बनाया हुआ है।  उन्होंने हमारी प्रतिभा पहचानी और आज मै अर्जुन पुरूस्कार एवार्डी हूं। उन्होंने हम सब बहनों को बास्केटबाल का ककहरा सिखाया। हमारा जो भी खेल है उसका श्रेय बस हमारे कोच अमरजीत सिंह को जाता है। उन्होंने लड़कों के ग्राउंड पर अपने रिस्क पर हमें खेलने दिया और हम इस मुकाम पर पहुंचे। इसके अलावा मम्मी और भाई बहन इसके अलावा जिस जगह से हमारी स्कूलिंग हुई है वहां की अध्‍यापिकाओं में भी यह बात थी की नहीं लडकियां भी आगे आकर कुछ कर सकती हैं। इसके अलावा बास्केटबाल को इंडिया में नई उचाई देने वाले स्वर्गीय हरी शर्मा का भी बहुत योगदान है।

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