वाराणसी । वो गंगा की धारा में अठखेलियां  खाते है । वो हमेशा मां गंगा के सानिध्य में रहते है, पर इनकी गरीबी इनका पीछा नहीं छोडती । ये अपने पूर्वजों के साथ इसी घाट पर आने वाले अलग अलग प्रान्त के टूरिस्टों के गाइड बचपन से ही बन गए । जब इन्हें ह्यूमन ट्रैफिकिंग के विरोध में कार्य करने वाली संस्थागुडिया के संस्थापक अजीत सिंह ने देखा तो उन्होंने इन्हें शिक्षित करने का बीड़ा उठाया ।आज इनकी शिक्षा की ज़िम्मेदारी गुडिया संस्था के संस्थापक अजित सिंह ने ले रक्खी है । पिछले 7 सालों से शहर के मानसरोवर गंगा घाट पर ये मछुआरों के बच्चे “बोट स्कूल” में  शिक्षा का ककहरा मुफ्त सीख रहे है । पेश है एक ख़ास रिपोर्ट |

अपुनी नेबेन, अतो टाका होए ( please sir only 5 rupees) आप सभी के मन में एक सवाल कौंधा होगा कि वाराणसी में बंगाली और अंग्रेजी का क्या काम । ये शब्द गंगा घाट पर गंगा में बहाये जाने वाले दीयों को बेचती 10 साल की रूपा के है । जो कभी बंगाल नहीं गयी है पर बंगाल से आने वाले पर्यटकों को आराम से गाईड करती है । वो भी बंगला भाषा में । इसके अलावा इस घाट पर रहने वाले सभी बच्चे किसी ने किसी भाषा में निपुण है । जबकि वो कभी उन प्रान्तों में गये नहीं है जहां की ये भाषा बोलते है । साल 2010 में जब गुडिया संस्था के संस्थापक अजित सिंह ने इन बच्चों को देखा तो उन्हें शिक्षित करने का मन बना लिया । पिछले 5वर्षों से इस बोट स्कूल में करीब 70 से 100 बच्चे पढ़ रहे हैं।

कैसे शुरू हुआ बोट स्कूल 
बोट स्कूल के बारे में बताते हुए अजित सिंह ने बताया कि हमारी संस्था गुडिया पिछले 25 वर्षों से ह्यूमन ट्रैफिकिंग के लिए काम कर रही है । ऐसे में मै अक्सर घाट पर आता था और यहां बच्चे घुमते पर्यटकों के पीछे अपने सामान दिये, धार्मिक कार्ड और अपनी बोट में आने का न्योता देते फिरते थे । कई दिन लगातार यहां आया । जिस खुले माहौल में ये बच्चियां यहां घूमती है और उनकी उम्र के मुताबिक ह्यूमन ट्रैफिकिंग  के आसार ज्यादा हो जाते है। ऐसे में इन्हें सशक्त करने की ठानी और मैंने एक ऐसा बोट स्कूल शुरू किया जिसमे किसी को आने के लिए दबाव नहीं था ।

पहले आये 4 – 5 बच्चे  
अजीत सिंह ने बताया कि शुरुआत में 4 या 5 बच्चे आते थे उसके बाद बच्चे आने लगे और आज 70 बच्चे है।  यहां हम किसी बच्चे पर कोई प्रेशर नहीं डालते की कैसे बैठ क्या पढ़े क्या करें । ज़्यादातर बच्चे अब स्कूल जाने लगे है । कुछ बच्चे आज भी वहीं काम करते हैं । सबसे ख़ास बात हमारे बोट स्कूल की है कि हमारे यहां पढने वाले बच्चे अलग अलग भारतीय भाषाएं जानते है । वो भी बिना किसी स्कूल गये । अजीत सिंह की 6 वर्षीय लड़की बारिश छुट्टी के  समय में बोट स्कूल आकर बच्चों को संगीत सुनाती है।

कैसा है बोट स्कूल का माहौल 
बच्चों को बोट स्कूल में बच्चों को अजित सिंह के अलावा, अमित गुप्ता, सांत्वना मंजू और रमेश कुमार मिलकर पढ़ाते है। जब हम बोट स्कूल पहुंचे तो बच्चे लाइन में लगकर बोट में जा रहे थे।  कुछ बच्चे काफी देर बाद आये और मैम सांत्वना मंजू को प्रणाम कर खुद से जगह बनाकर बैठते गए और शुरू हो गयी ड्राइंग क्लास।  बच्चों को पहले दिन से पढ़ा रही सांत्वना मंजू ने बताया “घाट बनारस की पहचान है और यहां के घाट किनारे रहने वाले अपने बच्चों को इन घाटों से दूर नहीं भेज सकते। ऐसे में हमने ये बोट स्कूल शुरू किया। जहां बच्चों का आने का कोई समय नहीं फिक्स है और न जाने का।  बच्चे अपनी मर्ज़ी के मालिक है।

जैसा की अन्य विद्यालयों में होता है कि इस जगह बैठो ये करो वो करो।  गलती करने पर सजा मिलती है छात्रों को ऐसा कुछ नहीं होता यहां।  बच्चे खुले वातावरण में अपने घर जैसा महसूस करते हुए पढ़ते है। हमारा मुख्य उद्देश्य घाट पर रहने वाली बच्चियों को मानव तस्करी के प्रति जागरूक करना है वो भी बिना उन्हें बताये। बच्चों के साथ अध्यापक कभी हिन्दी कभी बंगाली कभी कन्नड़ में बात कर रहे थे।

 
सोलर पैनल से आपरेट होता है बोट स्कूल 
मानसरोवर घाट पर एक बोट जिसमे लगा सोलर पैनल बरबस ही अपनी तरफ खींच लेता है।  ये है गुड़िया संस्था का बोट स्कूल जो सोलर एनर्जी से चलता है।  इस विद्यालय में बच्चों के लिए टीवी और कम्प्युटर के साथ साथ एक मैग्नेटिक बोर्ड की व्यवस्था है।  जिसमे बच्चे अंग्रेजी लैंग्वेज, कम्प्युटर  सारे सॉफ्टवेयर जैसे फोटोशॉप, माइक्रोसॉफ्ट वर्ड, एकाउंटिंग आदि की शिक्षा के साथ साथ प्रैक्टिस भी करते है।  इस स्कूल में 70 बच्चे इस समय स्कूल में पढ़ रहे है। बोट स्कूल बाढ़ के समय में भी बंद नहीं होता है। सिर्फ यहां रविवार को अवकाश होता है।

हमें बहुत कुछ सीखने को मिला है 
इस बोट स्कूल में पढ़ने वाली पारो सरकार अब क्लास 8 में पढ़ती है।  पारो सरकार ने बताया कि पहले मै यहां नहीं आती थी। दूर से अंदर चलती टीवी देखकर चली जाती।  एक दिन एक लड़की ने बताया कि यहां बहुत अच्छी पढ़ाई होती है।  तब से मै यहां आने लगी और आज इसी संस्थान की बदौलत पढ़ रही हूं । यहां आकर मैंने कम्प्यूटर सीखा और अब इंग्लिश भी सीख रही हूं।   पारो  सरकार घाट पर गंगा में प्रवाहित किये जाने वाले दिए बेचती है। वही कक्षा ग्यारह के स्टूडेंट सुधीर मानसरोवर घाट क्षेत्र के रहने वाले है।  इनके पिता और ये नाव चलाते है। सुधीर बिना किसी लैंग्वेज स्कूल गए फर्राटे से मद्रासी लैंग्वेज बोल लेते है। सुधीर ने बताया कि टीवी देखकर मै यहां आया और आज मेरा इंटर कम्प्लीट हो चुका है। माता पिता अब तो मुझे संडे को भी भेजने को तैयार रहते है।

 

बच्चों की शिक्षा में लगी गुड़िया संस्था का मुख्य लक्ष्य उन्हें मानव तस्करी से बचाना है।  इस संस्था की आर्थिक मदद संस्था के संस्थापक के कुछ मित्र और अमेरिका की सामाजिक संस्था जेनेवा ग्लोबल बच्चों की कापी किताब और उनकी शिक्षा का खर्च उठाने में सहयोग कर रही है। घाट के ये बच्चे अपने पॉकेटमनी के लिए पर्यटकों को नाव की तरफ ले जाने, दिया बेचने, धार्मिक कार्ड बेचने का कार्य तो करते ही है साथ ही गंगा नदी में लोगों द्वारा फेके गए सिक्कों को भी मैग्नेट के द्वारा बाहर निकालते है।  गुड़िया संस्थान उन घरों में शिक्षा का उजियारा फैला रही जिन घरों में सूरज ढलते ही मां बच्चों को खाना न देने का बहाना ढूंढना शुरू कर देती है। गुड़िया संस्थान के इस प्रयास को। 
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