( साभार : वरि‍ष्‍ठ पत्रकार और शि‍क्षावि‍द् डॉ. राकेश उपाध्‍याय के फेसबुक वॉल से)
झूठ का पहाड़ कैसे बनाया जाता है, कोई इन तथाकथित बुद्धिजीवियों से सीखे। मैं बीएचयू में पिछले दिनों घटित दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर लिखने के मूड में कतई नहीं था लेकिन आज जब मेरी नजर विद्वान पत्रकार उर्मिलेश जी के आलेख पर गई तो मन बेहद खट्टा हो गया। संदीप पांडे और सुभाषिनी अली समेत तमाम लोगों के आलेख पढ़ चुका था लेकिन उर्मिलेश को पढ़कर धैर्य जवाब दे गया।

 

संयोग है कि मैं कोलकाता में हूं, नेताजी सुभाष बोस के घर से होकर रविन्द्रनाथ टैगोर के घर पहुंचा ही था कि यह आलेख पढ़ने के लिए एक मित्र का व्हाट्स एप पर संदेश आया। अमूमन टीवी पत्रकारिता की दुनिया से 10 महीने पहले विदा लेने के बाद मैं 24X7समाचारों पर ध्यान नहीं देता, काम भर की न्यूज गूगल पर पढ़ लेना ही पर्याप्त मानता हूं। वाराणसी में मेरे घर में अब तक टेलीविजन नहीं लग सका क्योंकि मेरी रूचि टीवी में है नहीं, हालांकि टीवी पत्रकारिता में मैंने काफी वक्त गुजारा।

खैर मुद्दे पर आता हूं। राज्यसभा टीवी के ‘विद्वान संपादकाचार्य’ उर्मिलेश एक अंग्रेजी पोर्टल पर लिखते हैं-

‘Malviya was not ideologically broad minded. Acclaimed Hindi poet Mahadevi verma was not given permission to pursue an MA in Sanskrit in BHU for being a women and a non-brahman. This goes to prove the narrow mindedness of its founder.’

 

मैं उर्मिलेश जी का तमाम मतभेदों के बावजूद सम्मान करता रहा हूं, लेकिन उनका यह निष्कर्ष बेहद आपत्तिजनक है। उन्होंने जानबूझकर अपनी सनक में पत्रकारिता और अकादमिक लेखन की पीठ में बार-बार इतना भयानक खंजर चुभोया है कि समय इन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

एक ही तथ्य काफी है। भारत रत्न पंडित मदन मोहन शिक्षाविद् और समाज सुधारक थे तो पत्रकार भी रहे थे। क्या नहीं थे वे? महिलाओं के सशक्तिकरण की उस वक्त की सबसे बुलंद आवाज थे। मालवीय जी ने उस वक्त महिला महाविद्यालय की बीएचयू में स्थापना की जबकि लोग लड़कियों को उच्च शिक्षा में दाखिला दिलाना तो दूर, घर से दूर जाकर पढ़ने के सवाल पर ही हाथ खड़े कर देते थे। हर वर्ग और हर जाति के लिए मालवीय जी ने हिन्दू विश्वविद्यालय का दरवाजा पहले दिन से खोलकर रखा इसीलिए वह महामना कहलाए।

 

लोकसभा की पूर्व स्पीकर आदरणीया मीरा कुमार जी के आदरणीय पिता बाबू जगजीवन राम को बीएचयू में दाखिला देकर उन्हें उच्च शिक्षा की ओर प्रेरित करने वाले कोई और नहीं बल्कि मालवीय जी खुद थे, रुइया छात्रावास में जगजीवन राम के बर्तन को जब उस वक्त के मेस महाराज ने उठाने और धोने से मना किया तो मालवीय जी ने जगजीवन राम के बर्तनों को धोने की जिम्मेदारी खुद उठा ली ताकि छुआछूत की परिपाटी को बीएचयू में प्रारंभ से ही रोका जा सके।

 

जाने कहां से महादेवी वर्मा का उद्धरण ले आए उर्मिलेश और बीएचयू के वर्तमान घटनाक्रम के बहाने मालवीय जी और बीएचयू की परंपरा पर झूठे लांछनों की बौछार कर दी। मालवीयजी को संकीर्ण-दिमाग वाला शख्स बता रहे हैं उर्मिलेश। महान था मन जिसका, उस महामना के लिए संकीर्ण शब्द का इस्तेमाल! आपका ये आलेख ही आपकी पढ़ाई-लिखाई, दिमागी बनावट और काबिलियत पर सवाल है उर्मिलेशजी, लानत भेजता हूं आपको मैं।

 

अब आता हूं संदीप पांडेय जी पर। मेरा इनका नाता पुराना है। दरअसल वाराणसी में मेरा गांव धौरहरा से सटा है। वही धौरहरा जिसका नाम सुनकर एक वक्त थर्राहट दौड़ती थी समूचे पूर्वांचल में। बात है 1993 की जबकि मैं बीएचयू में बीए की पढ़ाई के लिए आया था। डॉ. डीएन मिश्रा कुलपति थे और साइन-ए-डाई हो चुकी थी। उस वक्त के छात्र आंदोलन के दौरान बनारस बंद के दौरान मैं दिन भर दशाश्वमेध थाने में बंद रहा तो दूसरी बार प्रदीप दुबे और दूसरे साथियों के साथ पुलिस लाइन ग्राउंड ले जाया गया। एसपी सिटी मरतोलिया ने तब लंका चौराहे के पास लाठी चार्ज किया था, प्रदीप दुबे पर लाठियां बरसने ही वाली थी कि मैं लाठियों के सामने आ गया, कई लाठियां लगीं किन्तु गम नहीं, यह जीवन ही दूसरों की तकलीफ कम करने के लिए मिला है।

 

खैर, अवकाश अवधि में गांव चला आया, जहां मुझे मिले बाऊ भानू प्रताप सिंह। रघुवंशी ठाकुर थे भानू मास्टर साहेब, गंगा किनारे गौरा गांव, दमकता मुखमंडल और अतिशय विनम्रता से भरी आंखें। सुभाष इंटर कॉलेज, चौबेपुर के रिटायर प्रिंसिपल। उन्हें मेरे बारे में जानकारी थी कि मैं संडीला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा जाने वाला बाल स्वयंसेवक हूं। उन्होंने मेरे गांव आकर मुझे प्रेरित किया और ललकारा कि गोलियों की तड़तड़ाहट से थर्रा रहे धौरहरा गांव में गुटीय संघर्षों को थामना है और इसके लिए संघ की शाखा शुरू करनी है। मैंने चुनौती स्वीकार कर ली। कंधे पर कुछ किताबों और चंद कपड़ों से भरा एक झोला लेकर उस इलाके में डेरा डाल दिया। धौरहरा गांव की कुटिया ही मेरा घर-दुआर।

 

धौरहरा की चर्मकार बस्ती में स्थित रविदास मंदिर पर माथा टेककर शाखा शुरु की। रमेश और इन्दल दोनों की याद है मुझे, दोनों हरिजन युवक सबसे पहले मेरे साथ आए। चाहीं के बाऊ रामचंदर सिंह भुलाए नहीं भूलते। लंबी कद-काठी, बुलंद आवाज, बाहुबली जैसा शरीर और रुआब। आज से 40 साल पहले पूर्वांचल के इनामी बदमाश-डकैत बुझारत को सडक पर पटक पटककर मार डालने वाले कद्दावर नायक थे बाऊ रामचंदर सिंह।

 

ऐसे रामचंदर सिंह की छत्रछाया में मैं अजगरा से लेकर धौरहरा तक बेधड़क घूमता था। धौरहरा में गोमती नदी के किनारे बाऊ घनश्याम सिंह इंजीनियर, स्वयंश्याम सिंह, अंगद सिंह, दिनेश सिंह, राजबहादुर मौर्य, गुप्ताजी, और बाबा प्रेमदास समेत सैकड़ों लोगों का मुझे जो सहयोग और प्यार मिला, वह मेरे जीवन की थाती है। सामूहिक सहभोज के साथ कुटिया के प्रांगण में शाखा शुरू हुई। धौरहरा का माहौल बदलने लगा। जिस गांव में शाम ढलते सन्नाटा छा जाता था, वहीं मैं अपने साथियों के साथ एक बस्ती से दूसरी बस्ती में देर रात तक घूमता था, न किसी का डर न कोई भय-क्योंकि डरकर जीना मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं।

 

भानूजी खुद धौरहरा शाखा पर आए, हर जाति-वर्ग की संख्या देखकर प्रसन्न हुए। इसी शाखा के सिलसिले में राजवाड़ी, कैथी, चौबेपुर, गौरा, बर्थरा, अजगरां, दानगंज, चोलापुर समेत पूरे इलाके में मैं साइकिल से घूमने लगा।

 

इसी सिलसिले में कैथी के पास संदीप पांडे के एक रिश्तेदार जिनके पास अमर उजाला में पत्रकार मेरे बड़े भाई का आना-जाना था, ने मुझे संदीप पांडेय के बारे में बताया। अमेरिका से लौटे थे, नाम हो चुका था, उनकी वेषभूषा लुभावनी थी, सादा जीवन उच्च विचार? अच्छा लगता था उनके बारे में सुनकर जानकर। कैथी के पास गंगा किनारे उनका एक सेंटर था, अक्सर मैं सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर वहां जाता था, लेकिन शीघ्र ही समझ आ गया कि गंगा किनारे रहकर भी गंगा के अमृतत्व में इनका विश्वास नहीं। जानकारी मिली वहां से छपने वाली एक पत्रिका के आलेख को पढ़कर। स्पष्ट हो गया कि ये तो देसी वेष में विदेशी विचार का झोला लटकाकर सनातन जीवन और धर्म के प्रति घोर घृणा फैलाने के लिए घूमने वाली पूर्वांचली-वामी-टीम के कप्तान हैं। मैंने तभी ऋषि मुखौटे में छुपे इन मारीच महोदय को पहचान लिया था। प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने तो बहुत बाद में पहचाना।

 

आज ये बीएचयू में महिलाओं के सवाल पर आन्दोलन को धार दे रहे हैं, मुझे वो दिन याद है जबकि बीएचयू की एक महिला प्रोफेसर कुसुम लता केडिया का इन्होंने जीना दूभर कर दिया था। जैसे धरना बीएचयू गेट पर हुआ, यही धरना इन्होंने आज से 15 साल पहले प्रो. कुसुम लता केडिया के घर के सामने शुरू किया था। अखबार भरे रहते थे तब इनके कारनामों से। सांसद वीरेंद्र सिंह सब जानते हैं। प्रो. केडिया ने उनसे रक्षा की गुहार लगाई थी तब।

 

पांडेजी को आपत्ति इस बात पर थी कि जेपी के संस्थान की निदेशक कोई महिला प्रोफेसर कैसे बन सकती है जबकि जेपी का असल वारिस तो मैं हूं मैग्सेसे अवार्डी। मुझे याद है प्रो. केडिया ने तब मुझे फोन पर बातकर पूरी जानकारी दी थी, मुझसे भी सहायता मांगी थी, मैंने अपने कुछ रघुवंशी मित्रों को तब प्रो. केडिया के घर सुरक्षा के लिए लगाया था, तब प्रो. केडिया ने अपने हाथ पर गड़े नाखून और टूटी चुड़ियों के टुकड़े दिखाए थे जिनसे रक्त बहा था, प्रो. केडिया ने मुझे बताया था उनके साथ हाथापाई संदीप पांडेय ने की थी। प्रो. केडिया और प्रो. रामेश्वर मिश्र पकंज आज भी हैं पांडे जी की महिलाओं के प्रति सोच और करनी का चिट्ठा बताने के लिए। तब महिला सुरक्षा का सवाल हर वामपंथी के एजेंडे से जाने कहां दरककर दूर खिसक गया था। और आज घड़ियाली आंसू इतने कि पुरसा हाल न पूछो।

 

प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी और बीएचयू के पूरे वर्तमान परिदृश्य के मुद्दे पर भी आऊंगा लेकिन पहले प्रो. त्रिपाठी को धन्यवाद जरूर दूंगा कि उन्होंने आईआईटी से संदीप पांडेय को बर्खास्त करने की हिम्मत दिखाई जहां वो ये पाठ पढ़ा रहे थे कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं और जाने क्या क्या? बीएचयू आईआईटी की स्थापना के लिए इसलिए तो हम लोगों ने संघर्ष नहीं किया था कि वहां एक अध्यापक अपनी सनक में अरुन्धती रॉय के बौद्धिकों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए और देश की संप्रभुता, लोकतंत्र और चुनी हुई सरकारों पर ही सवालिया निशान लगाए।

 

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बीएचयू आईटी को आईआईटी स्टेटस दिलाने के आन्दोलन में मेरी भी छोटी सी भूमिका थी। बीएचयू आईटी के प्रो. बंसल, रंजीव तिवारी, वसुदेव सिंह, ऋषि, रवि, वीरेंद्र समेत दर्जनों छात्रों ने इस अभियान की शुरूआत की थी तो साल 2003 में आयोजित शुरुआती बैठकों में मैं खुद शामिल रहता था, हालांकि तब मुझे अहसास नहीं था कि यह अभियान आगे चलकर बीएचयू में प्रशासनिक टकराव और बंटवारे से जुड़े विवाद की बड़ी वजह बन जाएगा।

 

फिलहाल बीएचयू आन्दोलन के बहाने जो आलेख लिखे जा रहे हैं उसका मज़मून यही है कि बीएचयू के वाइस चांसलर के दायरे से आईआईटी को बाहर रखा जाए। बीएचयू का वीसी बनने के लिए दोबारा लालायित ऐसे प्रोफेसरों का दर्द यही है कि कोई गैर-इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि का व्यक्ति आईआईटी गवर्निंग काउंसिल का चेयरमैन कैसे बना रह सकता है? प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी के बारे में सुभाषिनी अली, संदीप पांडे, उर्मिलेश ने जो बातें लिखी हैं या जो उन्हें लिखकर दी गई हैं, उसका मज़मून यही है कि बीएचयू के वाइस चांसलर पद पर या तो किसी आईआईटीयन को बिठाओ या फिर बीएचयू वीसी के दायरे से आईआईटी को हटाओ। बीएचयू के वर्तमान का ये सारा आन्दोलन आगे चलकर इसी सवाल पर केन्द्रित होगा क्योंकि पूरे आन्दोलन की पृष्ठभूमि में आईआईटी-बीएचयू के कुछ लोग गहराई से शामिल है।

 

मैं नहीं लिखना चाहता, फिर भी लिख रहा हूं ताकि सनद रहे। 2003-04 में जब बीएचयू आईटी को आईआईटी बनाने का मुद्दा जोरों पर चल निकला था, आईटी के छात्र और पूर्व छात्र सभी लामबंद होने लगे थे तब मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी के साथ मैं दिल्ली से चार्टर्ड प्लेन से वाराणसी आया था, प्रो राव कुलपति थे, स्वतंत्रता भवन में दीक्षांत समारोह था। मैं डॉक्टर जोशी के साथ ही कार से स्वतंत्रता भवन पहुंचा। भवन के बाहर मुझे रंजीव तिवारी साथियों के साथ मिले, बाद में डॉ. जोशी से आईटी के छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करवाई और फिर मैं डॉक्टर जोशी के साथ ही विशेष विमान से दिल्ली लौट गया। विमान में डॉक्टर जोशी ने मुझे बताया कि अटल जी बीएचयू आईटी को आईआईटी स्टेटस फौरन देने के पक्ष में हैं, मेरा भी पूरा मन है लेकिन अशोक सिंघल जी बीएचयू से आईटी को अलग करने के विरोध में हैं, तुम उन्हें बातकर राजी करो। मैं डॉ. जोशी के निर्देश पर अशोक सिंहल जी से मिला, उन्हें समझाया कि आईआईटी बनने से बीएचयू और वाराणसी का भला होगा, इसमें देर नहीं करनी चाहिए। लेकिन अशोकजी बंटवारे के सवाल पर खिन्न हो जाते थे।

 

अशोकजी इस बात की गारंटी चाहते थे कि महामना की भावनाओं के अनुरूप आईटी बीएचयू से कभी अलग नहीं किया जाएगा, इसकी गारंटी मिले बगैर मैं क्या बीएचयू का कोई पूर्व छात्र सहमति नहीं दे सकता। अशोक सिंहल बीएचयू आईटी के पूर्व छात्र रहे थे, उनसे बाद में बातचीत के लिए तमाम वरिष्ठ पूर्व छात्रों और प्रोफेसरों ने मोर्चा संभाला। बीएचयू के बंटवारे का सवाल संवेदनशील था लिहाजा यूपीए सरकार ने भी फूंक फूंक कर कदम आगे बढ़ाया। बाकी आगे जो हुआ, सब इतिहास है।

 

विषय पर आता हूं। प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी से सवाल पूछते हुए विद्वान उर्मिलेश लिखते हैं कि despite being a resourceful central university BHU has failed to become the focal point of knowledge. अब इन्हें कौन समझाए कि बीएचयू भारत के उच्च शिक्षा के केंद्रों के लिहाज से देश-विदेश के टॉप केंद्रों में लगातार अग्रणी है। अपने पिछले 25 वर्ष के इतिहास में रैंकिंग के लिहाज से पिछले वर्ष बीएचयू ने सर्वश्रेष्ठ पायदान पर छलांग लगाई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलुरु के बाद स्नातक-परास्नातक और शोध अध्ययन के लिहाज से बीएचयू आज देश का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है जहां सर्वविद्या समेत नर्सरी से पोस्ट डॉक्टोरल तक सभी विषयों की पढ़ाई होती है। माहौल ऐसा है कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन तक से जुड़े वैज्ञानिक कैंब्रिज छोड़कर बीएचयू में शोध और अध्यापन करने आए हैं ताकि विश्व स्तरीय मानदंडो के अनुरूप बीएचयू के शैक्षणिक माहौल को निखारा जा सके।

 

रह गईं सुभाषिनी अली। हार्डकोर कम्यूनिस्ट हैं मैडम, कोई छिपी बात नहीं। फिर भी लिखती हैं कि बीएचयू महामना की विरासत से दूर खड़ा हो गया है। आपको महामना की विरासत की इतनी फिक्र कब से सताने लगी? महामना जब मार्क्स पर भारी पड़ते दिख रहे हैं तो विषकुंभम पयोमुखम का रूप आख्तियार कर लिया आपने। महामना की विरासत पर ऐसा दावा ठोंक रही हैं मानो मार्क्सवाद की जगह मालवीयवाद की पीएचडी कर रखी हो। याद रखिए मार्क्सवाद Vs मालवीयवाद का पाला खिंच चुका है, बीएचयू सरकारी पैसे से बना विश्वविद्यालय नहीं है, इस देश ने, देश के समाज ने महामना के आह्वान पर बीएचयू की ईंट दर ईंट के लिए पाई पाई चुकाई है।

 

बीएचयू आईआईटी भी महामना की देन है, जब देश इंजीनियरिंग की शिक्षा के सपने देख रहा था, आजादी के पहले महामना उस सपने को साकार कर रहे थे ताकि आजादी मिलने पर देश के नवनिर्माण के लिए इंजीनियरों का टोटा न पड़ जाए। वो महामना दूरद्रष्टा थे, संकीर्ण और orthodox कहकर आप लोगों ने महामना की पूरी परंपरा पर कालिख मलने की कोशिश की है, ठीक उसी तरह जैसे 22 सितंबर की रात कोशिश की गई। लीपापोती से पाप नहीं धुलने वाला।
( साबित करुंगा अगली किश्त में)

 

इसलिए कह रहा हूं कि घटनाक्रम का सच लिखने की बजाए आलेख दर आलेख लिख दिया गया है वीसी के खिलाफ और दर्द यही कि आईआईटी की गवर्निंग काउंसिल का चेयरमैन बीएचयू का वो वीसी कैसे हो सकता है जिसने कभी इंजीनियरिंग पढ़ी नहीं। गजब हाल है इन लेखकों का। सबके सब आईआईटी पर ही आकर अपनी बात जिस तरह से खत्म कर रहे हैं उसी से साफ हो जाता है कि बीएचयू की समस्या के पीछे आस्तीन के सांप छुपे है जिन्हें पूरा बनारस पहचान रहा है, सारा बीएचयू इनके कारनामों को गौर से देख रहा है।

 

छात्राओं के आंदोलन के सवाल पर रहस्योद्घाटन अभी बाकी है। 22 और 23 सितंबर की आंखों देखी, अनुभव से भरी पूरी कथा परत दर परत लिखूंगा पूरी सच्चाई के साथ। कोलकाता में हूं इसलिए बोलता हूं-काली कलकत्ते वाली, तेरा वचन न जाए खाली। न काहू को भय देत न भय मानत आन।।

 

महामना की बगिया बीएचयू के लिए यही पंक्तियां हैं मेरे पास-
महिमा महान तू है, गौरव निधान तू है,
तू प्राण है हमारी जननी समान तू है,
तेरे लिए जिएंगे, तेरे लिए मरेंगे,
तेरी जनम जनम हम साधना करेंगे, अर्चना करेंगे।।
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