काशी हि‍न्‍दू वि‍श्‍ववि‍द्यालय : नजर लग गई या फि‍र नजर गड़ गई ?

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पिछले दिनों घटित घटनाक्रम की आंखों देखी रिपोर्ट – डॉ राकेश उपाध्याय जी के फेसबुक वॉल से ली गई है, प्रस्तुत हैं संपादित अंश।

 

23 सितंबर की वो खौफनाक रात अचानक बीएचयू की बीते तीन सालों की उमंग भरी तस्वीरों पर कालरात्रि बनकर टूट पड़ी। नवरात्रि की उस रात पुलिस ने शक्ति-पूजा का जो रूप दिखाया, हर किसी का दिलो दिमाग झनझना गया कि आखिर पल भर में ये क्या हो गया कि बीएचयू की सरजमीं पुलिस की लाठियों, पेट्रोल बमों की कानफाड़ू कारगुजारियों से थर्राने लगी। बीएचयू की चारदिवारियों के भीतर पुलिसिया हूटरों-सायरनों का शोर गूंजने लगा।

 

अनटोल्‍ड स्‍टोरी…
उस स्याह रात की ये वो कहानी है जो आपको किसी रिपोर्टर ने नहीं बतायी, किसी चैनल ने नहीं दिखाई, वो कहानी किसी अखबार की कतरनों में नहीं छपी, वो कहानी केवल दबी जुबान ही सवाल बनकर गूंजती रही, एक कान से दूसरे कान तक हर किसी से पूछती रही कि आखिर महामना की इस बगिया पर नज़र किसकी लग गई।

रंगारंग बीएचयू बदरंग हो गया…

23 सितंबर 2017, वसंत पंचमी 2017, संस्कृति महोत्सव 2016, वसंत पंचमी 2015 की तारीखें बीएचयू के लिए बेहद अहम हैं, ये तारीखें 23 सितंबर के घटनाक्रम की साजिश को समझने के लिए जरूरी हैं। बीएचयू में बीते तीन साल के बड़े आयोजनों की तस्वीर समझिए। हजारों-लाखों बाहरी लोगों और छात्र-छात्राओं के साथ तमाम आयोजनों की बाढ़ यहां लगती रही लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि बगैर किसी आयोजन के अचानक सन्नाटे वाली सड़क देखकर मोटर साइकिल सवार दो शोहदे एक छात्रा को देर शाम छेड़ते हैं और भाग जाते हैं और जल उठता है बीएचयू का सारा रंगारंग मिजाज।

क्‍या कोई गहरी साजि‍श रची गई…

क्या इस छेड़खानी के पीछे कोई साजिश थी, अगर थी तो कौन लोग हैं जिन्होंने बीएचयू को ‘जलाने’ के लिए पेट्रोल बम तैयार किया, कौन लोग हैं जिन्होने पीएम के दौरे के मौके पर बीएचयू में जलजला ला दिया। आखिर किन लोगों ने बीएचयू को आग में झोंकने के षड्यंत्री मिशन का आगाजकर उसे अंजाम तक पहुंचाया।
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जरा पीछे चलते हैं…

बीएचयू में दिसंबर 2016 में आयोजित संस्कृति महोत्सव अनूठा था। इस आयोजन की रंगारंग तस्वीरें सोशल मीडिया से लेकर मेनस्‍ट्रीम मीडिया तक छाई रहीं। झूमते गाते कलाकार, दीपावली की तरह सजा धजा इठलाता कैंपस, मधुवन से लेकर स्वतंत्रता भवन तक कला के हजारों रंग। बीएचयू की बुनियाद के सौ साल पूरे होने पर भारत सरकार ने यहां राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव मनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए, नामचीन हस्तियों का जमावड़ा हुआ। लाखों लोग 10 दिनों तक चले इस उत्सव के गवाह बने, देर रात तक कैंपस में उत्सवी माहौल, हजारों कलाकारों की रंगारंग मौजूदगी। कहीं थिरकन तो कहीं सात सुरों के सरगम पर धड़कती धड़कनें, कहीं ठुमरी तो कहीं सितार, गंगा के पार तक गीत-संगीत की गूंज। पूरा माहौल मस्ती से सराबोर। छात्र-छात्राओं समेत काशी के अमनपसंद आवाम ने पूरा मज़ा उठाया। न किसी को कोई गलत तस्वीर दिखाई पड़ी न कोई गड़बड़ बात सुनाई पड़ी।

बसंतोत्‍सव…

बीते तीन दशक से बीएचयू में वसन्तोत्सव की झांकियां इस इंतजार में थीं कि कभी तो दिन आएगा, सरस्वती के मंदिर में सरस्वती की पूजा का शंखनाद फिर सुनायी पड़ेगा। कोई वाइस चांसलर आएगा, पीले परिधानों में बीएचयू का सौन्दर्य फिर से सड़कों पर सैलाब बनकर मुस्काएगा। वाइस चांसलर प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी की पहल पर बीते 30 साल से बंद पड़ी परंपरा शुरु हुई, प्रोफेसर, विद्यार्थी और कर्मचारी, हर कोई हिस्सेदारी के लिए बेताब। हर विभाग की झांकी एक से बढ़कर एक। परंपरागत वेष-भूषा में सजे-संवरे नौजवान लड़के लड़कियों का हुजूम एक साथ सैलाब बनकर सड़कों पर उतरा दिखा। न किसी को कोई गलत तस्वीर दिखाई पड़ी न कोई गड़बड़ बात सुनाई पड़ी।

जन्‍माष्‍टमी…

ठीक इसी तरह जन्माष्टमी पर टिमटिमाते झालरों से सजे-धजे बिड़ला छात्रावास के आंगन में रात 12 बजे कान्हा के जन्म पर जश्न की तैयारी होती है। पगड़ी बांधे छात्र दिखते हैं, साड़ी पहने छात्राएं इंतजार करती हैं उस घड़ी का जब घंट-घड़ियाल बजेंगे, हजारों साल से भारत की सरज़मीं पर जेल में कैद परमात्मा का प्रकाश फिर से बाहर आएगा। एमएमवी से लेकर आईआईटी हॉस्टल तक हर हॉस्टल में रंगारंग कृष्ण जन्मोत्सव की धूम। कहीं वेदमंत्र की गूंज तो कहीं नृत्य-गीत-संगीत का महारास। छात्र-छात्राओं में हिल-मिलकर एक हॉस्टल से दूसरे हॉस्टल की झांकी देखने का जुनून। जन्माष्टमी से दशहरा पूजा तक उत्सव में जैसे डूबी काशी वैसे ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

आखि‍र कि‍सकी नजर लग गई…

बीएचयू परिसर में बीते तीन सालों में कोई छेड़खानी की घटना नहीं घटी। यूजीसी ने भी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि बीएचयू के बीते तीन सालों में छेड़खानी से जुड़ी कोई शिकायत केंद्र को नहीं मिली। जाहिर तौर पर बीएचयू के कुलपति के कार्यकाल खत्म होने के महज़ 2 महीने पहले कैंपस में छेडखानी हुई है तो सवाल उठने लाजिमी है कि कहीं इसके पीछे कोई गहरी साजिश तो नहीं।

 

कि‍सके आदेश पर बरसी लाठि‍यां…
साजिश की परत दर परत हम उधेड़ेंगे लेकिन उसके पहले हम आपको बताएंगे कि आखिर इस लाठीचार्ज की हकीकत क्या है। पत्रकारों ने बीएचयू के वाइस चांसलर से लाठीचार्ज की बाबत बात की, उनसे पूछा कि आखिर लाठी कैसे चली, क्यों चली। वाइस चांसलर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी कहते हैं कि मैंने लाठीचार्ज के लिए कोई आदेश किसी को भी नहीं दिया, ना तो प्रोक्टोरियल को दिया और ना ही जिला प्रशासन को। अगर कोई लिखित आदेश या मौखिक आदेश मैंने दिया है तो बताइए कहां दिया है।

कुलपति का इनकार

जाहिर तौर पर वाइस चांसलर ने साफ इन्कार किया कि उनकी ओर से छात्राओं पर लाठीचार्ज के लिए कोई आदेश दिया गया। तो फिर सवाल उठता है कि आखिर पुलिस ने 23 सितंबर की आधी रात को एक्शन क्यों लिया। शांतिपूर्ण धरने पर बैठी छात्राओं को क्यों खदेड़ा गया, किसके कहने पर खदेड़ा गया। पुलिस का दावा है कि हमने हवा में लाठियां लहराई थीं, छात्राओं को हॉस्टल वापस भेजना हमारा मकसद था ना कि किसी को नुकसान पहुंचाना।

23 सितंबर की रात पुलिस ने छात्राओं पर बेरहमी दिखाई या नहीं मीडिया में आई तस्वीरें खुद ही सब कुछ साफ बयां कर रही थीं। सर पर पट्टी बांधे खड़ी छात्रा, पैर पर हाथ रखे छात्रा को देखना गुस्‍से से भर देने वाला था।

कहां गईं घायल लड़कियां…

हमने घायल लड़कियों का हाल जानने के लिए सर सुन्दर लाल अस्पताल की ओर रुख किया, लेकिन हमें या जानकर ताज्जूब हुआ कि एक भी छात्रा इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती नहीं हुई तो सवाल उठता है कि जिन छात्राओं को चोटें लगीं क्या वो बीएचयू की नहीं थीं और अगर थीं तो उन्होंने अपना इलाज कहां कराया।

आठ घायलों में से सि‍र्फ एक छात्र…!

बीएचयू के सरसुन्दर लाल अस्पताल से जारी ये मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि लाठीचार्ज से पीड़ित कुल 8 लोगों ने सर सुन्दर लाल अस्पताल में प्राथमिक इलाज कराया। 8 लोगों में बीएचयू की सिर्फ एक छात्रा अंजली मिश्रा ने इलाज कराया। मेडिकल रिपोर्ट में उसे साफ्ट टिश्यू इंजरी यानी मामूली रगड़ लगने की शिकायत पाई गई। इलाज के लिए आए बाकी लोग पुलिस, प्रोक्टोरियल से जुड़े थे। एक वार्डेन ने भी इलाज कराया।

मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, न तो किसी के शरीर पर गंभीर चोट के निशान मिले और ना ही किसी को फ्रैक्चर या बॉडी के किसी हिस्से से ब्लीडिंग की शिकायत पाई गई। सभी लोग इलाज के बाद घंटे भर के भीतर ही डिस्चार्ज कर दिए गए।

लाठीचार्ज ने बि‍गाड़ा मि‍जाज…

पुलिस लाठीचार्ज की घटना ने ही बीएचयू के मामले में माहौल खराब किया। बताया जाता है कि पहले लाठीचार्ज प्रोक्टोरियल बोर्ड ने कुलपति निवास के पास शुरु किया और बाद में पुलिस ने सिंहद्वार पर जबरन छात्राओं को खदेड़ने की कोशिश की।

घटना से दो दिन पहले…

21 सितंबर की दोपहर एक अनाम बिना दस्तखत का खत किसी छात्रा की ओर से प्रॉक्टोरियल दफ्तर को मिलता है कि किसी लड़की से छेड़खानी हुई तो अंजाम प्रशासन को भुगतना होगा। 21 सितंबर की ही शाम को 6.30 बजे भारत कला भवन के पास एक छात्रा से छेड़खानी की घटना घट जाती है जो कि बीते तीन साल में न देखी गई, ना सुनी गई।

उग्र हुईं छात्राएं…

छात्रा ने फौरन मौके पर मौजूद प्रोक्टोरियल गार्डों को जानकारी दी तो गार्डों ने उल्टे ही सवाल दाग दिया कि इस समय यहां क्या कर रही थी। छात्रा रोते हुए त्रिवेणी हॉस्टल पहुंची जहां उसे देखकर छात्राएं उग्र हो गईं। प्रोक्टोरियल बोर्ड के अधिकारी भी फौरन मौके पर पहुंचते हैं। पीड़ित छात्रा की ओर से शिकायत लेकर उसे पुलिस थाने भेजा जाता है, जहां से शिकायत इस बात पर लौट आती है कि छात्रा का नाम-पता स्पष्ट नहीं लिखा है। रिपोर्ट दोबारा भेजी जाती है।

21 सितंबर देर रात तक छात्राओं, अध्यापकों, प्रोक्टोरियल बोर्ड के लोगों के बीच बैठकें चलती हैं, प्रोक्टोरियल बोर्ड की ओर से कुलपति को देर रात सूचना भेजी जाती है कि छात्राएं कार्रवाई से संतुष्ट हैं, पुलिस को एक्शन लेने के लिए कह दिया गया है। परिसर में तलाशी अभियान चल रहा है।

सिंह द्वार क्‍यों गया आंदोलन…

प्रॉक्टोरियल बोर्ड के लोगों को आखिर तक यह पता नहीं चल सका कि पीड़ित छात्रा के पीछे लामबंद छात्राओं के दिलो-दिमाग में क्या चल रहा है। 22 सितंबर की सुबह जबकि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री वाराणसी शहर में थे और पीएम का रुट बीएचयू के सिंहद्वार पर लगने की खबर अखबारों में चस्पा थी, अचानक त्रिवेणी हॉस्टल से छात्राओं का एक झुंड सिंहद्वार की ओर चल पड़ता है।


यहां ये बात समझना जरुरी है कि त्रिवेणी हॉस्टल से बीएचयू के कुलपति निवास की दूरी महज 30 मीटर है जबकि सिंहद्वार एक किलोमीटर से अधिक दूर। साफ है कि सिंहद्वार पर जाने की प्लानिंग के पीछे कोई शातिर दिमाग था, जिसने कुलपति के खिलाफ साजिश की बड़ी जमीन तैयार कर दी।

देखते ही देखते आंदोलन हुआ हाईजैक…

बीएचयू के सिंहद्वार पर छात्राओं का धरना शुरु में तो छोटा था। छात्राओं की भीड़ को उकसाकर सिंहद्वार पर ले जाने वाली छात्रनेता एकता सिंह से हमने बात की, उसने बताया कि सुबह धरना शुरु तो ठीक तरीके से हुआ लेकिन दोपहर होते होते ही हमें लग गया कि हमारा आन्दोलन हाईजैक हो चुका है, वामपंथी लोग कुलपति के खिलाफ इसे हथियार बना चुके हैं।

कामयाब होने लगी साजि‍श…

जाहिर तौर पर साजिश कामयाब हो गई। इधर वाइस चांसलर प्रधानमंत्री की अगवानी के लिए प्रशासन के निर्देश पर उद्घाटन स्थल पर रवाना हो गए तो उधर कुलपति के खिलाफ उनके विरोधियों ने सिंहद्वार पर आसमान सर पर उठा लिया। प्रधानमंत्री शाम को उसी रास्ते से गुजरने वाले थे, आन्दोलन का रुख देखकर प्रशासन को अचानक रुट बदलने का फैसला करना पड़ा।

दिखने लगे अनजाने चेहरे…

वाइस चांसलर प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी 22 सितंबर शाम तक पीएम के कार्यक्रमों को लेकर व्यस्त रहे। प्रधानमंत्री के हाथों बीएचयू की तीन परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन होना था। दूसरी ओर सिंहद्वार पर शाम को भीड़ का मंजर जुदा होने लगा। काले लिबास में ऐसी भीड़ आन्दोलन में शामिल हो गई जो परिसर में पहले नहीं देखी गई। छात्रों के नाम पर गैंगनुमा लोग इकट्ठा हो गए जिन्हें देखकर छात्राओं में सवालों का दौर शुरु हो गया। आंदोलन में शामिल एक छात्रा के मुताबिक, हमें घेरकर वो सब खड़े थे। बहुतों को तो हम जानते भी नहीं थे। उसमें कालिख का डब्बा लेकर भी लोग थे।


और अनसेफ हो गया बीएचयू…

22 सितंबर की रात होते ही अचानक बीएचयू के सिंहद्वार की तस्वीर बदलने लगी। कुछ लोगों का एक ग्रुप जाने कहां से बड़े बैनर लेकर सिंहद्वार के ऊपर चढ़ गया। सिंहद्वार पर अनसेफ बीएचयू समेत कुलपति के खिलाफ लिखे नारों वाला बैनर बीचों बीच टांग दिया गया।

महामना की प्रतिमा पर कालिख पोतने की कोशिश…

कुछ छात्रों का कहना है कि इसी दौरान जेएनयू का एक लडका कालिख का डिब्बा लेकर महामना की मूर्ति की ओर बढ़ा। उसने चिल्लाकर जब ये बताया कि वो मूर्ति पर कालिख फेंकने जा रहा है तो धरने पर बैठी छात्राओं ने उसे डांटना शुरु कर दिया। युवक अभी महामना की मूर्ति की ओर चढ़ ही पाता कि अचानक चार-पांच छात्रों की भीड़ ने उसे दबोच लिया। छात्रों से जेएनयू की हाथापाई हुई और कालिख गिरकर वहीं सड़क पर बिखर गई।

महामना की प्रतिमा पर कालिख पोतने की इस कोशिश की खबर बीएचयू में आग की तरह फैली। हमने इस तथ्य की पड़ताल की और उन छात्रों को हमने खोज निकाला जिन्होंने मृत्युंजय कुमार से कालिख का डिब्बा छीन कर उसे सड़क पर गिरा दिया था।

बगिया को बचाने आगे आये बच्‍चे…

डिब्बा झपटने वाले छात्र दिनेश मिश्रा उस रात को याद करते हुए बताते हैं, ‘ हां मैं और मेरे चार दोस्तों ने उस लड़के को पकड़ा था, उसका चेहरा हमें याद है, उसे हमने मारा भी। और मैंने तो सिंहद्वार पर चढ़कर वो बैनर भी फाड़ डाला जिस पर लिखा था अनसेफ बीएचयू। मुझे ये बर्दाश्त नहीं हो सकता कि मेरी आंखों के सांमने कोई मेरे विश्वविद्यालय को बदनाम करे।’

क्‍यों दबाई गई कालि‍ख पोतने की कोशि‍श वाली बात…

महामना की मूर्ति को कालिख से बचाने वाले छात्रों में कृष्ण मोहन का नाम भी शामिल हैं। कृष्णमोहन के मुताबिक, ‘ मैंने जैसे ही छात्राओं को उसे रोकते देखा मैं समझ गया कि कुछ गड़बड़ है, मैं भीड़ को चीरते हुए अपने दोस्तों को साथ उस लड़के की ओर बढ़ा। वह कालिख लेकर महामना की मूर्ति के घेरे के पास पहुंचकर ऊपर चढ़ने की जुगत तलाश रहा था। हमने उसे घेरकर वहीं पटक दिया। जो कहते हैं कि महामना पर कालिख फेंकने की कोशिश की बात झूठी है, वो ‘दोगले’ हैं। हमने जो आंखों से देखा और रोका, उसे धरने पर बैठी सारी छात्राओं ने देखा था, जाकर पूछ लीजिए।’

बीएचयू में क्‍या कर रहा था जेएनयू का छात्रा…

सिंहद्वार पर महामना की मूर्ति पर वाराणसी के सांसद और देश के पीएम नरेंद्र मोदी कई बार माला-फूल चढ़ा चुके हैं, जेएनयू के छात्र ने इसी पर कालिख फेंकने की कोशिश की थी। अखबारों में छपी तस्वीरें भी प्रमाणित करती हैं कि जेएऩयू का छात्र मौके पर मौजूद था। वाराणसी से प्रकाशित देश के एक अति प्रतिष्ठित अखबार में उक्‍त छात्र डीएम के पास खड़ा साफ दिख दि‍या। अखबार के मुबातिक डीएम ने उससे पूछा भी कि तुम तो जेएनयू के हो, यहां क्या काम है तुम्हारा, कब से आए हो और यहां कैसे खड़े हो।

तो क्‍या कुलपति‍ पर हमले की भी रची गई थी साजि‍श…

विश्वविद्यालय प्रशासन के सूत्र बताते हैं कि वाइस चांसलर प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी पीएम के कार्यक्रम से लौटने के बाद सिंहद्वार पर जाने को तैयार थे लेकिन उन्हें जैसे ही प्रॉक्टोरियल बोर्ड के लोगों ने महामना की मूर्ति पर कालिख फेंकने की कोशिश की बात बतायी, उनका मूड उखड़ गया और उन्होंने साफ कर दिया कि जब महामना पर कालिख पोतने की हद तक लोग जा सकते हैं तो फिर उनकी बिसात ही क्या है।

बड़े उपद्रव की थी तैयारी…

प्रोक्टोरियल बोर्ड के लोगों ने वाइस चांसलर को ये भी बताया कि धरने पर बाहरी अराजक तत्व पत्थर और घातक चीजों के साथ पूरे उपद्रव की तैयारी में बैठे हैं, उनके जाने पर वहां हालात अनियंत्रित हो सकते हैं, छात्राओं की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा खड़ा हो सकता है। विश्वविद्यालय प्रोक्टोरियल अधिकारियों की ओर से बाकायदा इस बारे में जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित मेल और फैक्स के जरिए सूचना भी भेजी जा चुकी थी।

ठुकराया गया कुलपति का प्रस्‍ताव…

बीएचयू में आन्दोलनकारी छात्राओं और कुलपति के बीच संवाद पर पहला ब्रेक इसी खबर के बाद लगा था। हालांकि देर रात में एक प्रोफेसर और कुछ पूर्व छात्रनेताओं ने कुलपति को फिर से तैयार किया कि वह छात्राओं से मिलने सिंहद्वार चलें, पुलिस और सुरक्षा के बन्दोबस्त के साथ। कुलपति ने इस बात पर रजामंदी जाहिर कर दी कि छात्राएं महिला महाविद्यालय के भीतर आ जाएं वहां वो उनसे मिलने को तैयार हैं। चीफ प्रॉक्टर 22 सितंबर की देर रात मौके पर जाकर छात्राओं के सामने वीसी का यह प्रस्ताव रखते हैं लेकिन छात्राएं हिलने को टस से मस नहीं होतीं हैं।

आंदोलन खत्‍म करना चाहती थीं छात्राएं…

चीफ प्रॉक्टर के खाली हाथ लौटने के बाद बीएचयू के दो पूर्व छात्रनेता एक वरिष्ठ प्रोफेसर के साथ सिंहद्वार पर पहुंचते हैं। उन्हें देखकर छात्रों की भीड़ उन्हें घेर लेती है। छात्रों से शुरुआती बातचीत के बाद प्रोफेसर छात्राओं से मिलते हैं। चार छात्राएं उन्हें अलग से बात करती हैं। प्रोफेसर प्रस्ताव देते हैं कि छात्राएं एमएमवी के भीतर चलें, वहीं कुलपति उनसे बात करेंगे। छात्राएं सवाल पूछती हैं कि क्या गारंटी है कि कुलपति आएंगे। प्रोफेसर जवाब देते हैं कि मैं गारंटी लेता हूं। वो मिलने को तैयार हैं। छात्राएं धीरे से कहती हैं-सर हम भी यहां से हटना चाहते हैं, आप सर से बात करा दीजिए।

प्रोफेसर कहते हैं कि आप लोग एमएमवी हॉस्टल चलिए वहीं सर आएंगे। एक छात्रा कहती है कि ऐसा करिए कि एमएमवी हॉस्टल के गेट पर ही हम चलते हैं, वहीं एक तरफ लड़के बैठ जाएंगे, दूसरी ओर हम लोग, वहीं पर बात कर लेंगे। प्रोफेसर कहते हैं कि नहीं सब लोग हॉस्टल के भीतर चलेंगे, क्योंकि कुछ लोग पत्थरबाजी के मूड से ही यहां खड़े हैं, ये रिपोर्ट वीसी के पास है। छात्रा कहती है कि सर हम आपको बाकी छात्राओं से बात कर बताते हैं।

टकराव रोकना नहीं चाहते थे बाहरी…

सूत्रों का कहना है कि प्रोफेसर ने बातचीत की जमीन तैयार कर दी थी, कुलपति भी 22 सितंबर की देर रात एमएमवी हॉस्टल आने को तैयार हो गए थे लेकिन अचानक तभी खेल बिगाड़ने वाला एक ग्रुप इस बातचीत को डिरेल करने के लिए आगे आ जाता है।

प्रोफेसर से धक्‍का-मुक्‍की, गाली-गलौज…

सिंहद्वार पर अचानक लड़कियों से बातचीत कर रहे प्रोफेसर को कुछ लडके धकियाते हुए एक दूसरे किनारे पर ले जाते हैं, छात्राएं इसका विरोध करती हैं लेकिन एक दूसरा ग्रुप छात्राओं को दूर हटने के लिए कहता है।

एक छात्र – कौन हैं आप, यहां क्या करने आए हैं इतनी रात को?

प्रोफेसर – मैं यहां प्रोफेसर हूं, मेरी छात्राएं धरने पर हैं, मैं उन्हें हॉस्टल वापस ले जाने आया हूं।
छात्र – (गाली देते हुए) जितना दम है उस वीसी में (गाली), कह दो पूरी बटालियन लेकर चला आए। क्यं रे, कितने गार्ड है इसके पास, सुना है कि सब आर्मी से रिटायर हैं, बुलाओं सब (गाली) को आज, यहीं फैसला न कर दिया तो कह देना (फिर गाली), (फि‍र गाली) वीसी के दलाल, आए हैं छात्राओं को समझाने. चले जाओ नहीं तो मारे जाओगे।

इनसे बात मत करि‍ए सर…

गाली-गलौज भरी इस घटना से स्तब्ध प्रोफेसर दूर खड़ी एक छात्रा की ओर देखते हैं, उसके पास जाते हैं, वो कहती है सर आप इन लोगों से बात मत करिए, ये लोग बाहरी हैं, ये लोग ही सारी दिक्कत कर रहे हैं नहीं तो सारी छात्राएं तैयार हैं हॉस्टल चलने के लिए…।

दो पूर्व छात्रनेताओं ने संभाला मोर्चा…

सिंहद्वार की इसी जगह पर एक तथाकथित छात्र की अभद्रता ने संवाद की कोशिश पर पानी फेर दिया। प्रोफेसर निराश मन से लौटने लगते हैं कि थोड़ी ही दूर पर मौजूद दो पूर्व छात्र नेताओं को वो पूरे वाकये की जानकारी देते हैं। दोनों पूर्व छात्रनेता प्रोफेसर से की गई इस बदतमीजी पर आगबबूला होकर मौके पर पहुंचते हैं, छात्राओं से फिर से बातचीत की कोशिश होती है। और तभी अभद्र गालियां बकने वाला वह तथाकथित छात्र फिर से हाजिर हो जाता है। इस बार पूर्व छात्रनेताओं का रुख देखकर वो भाग खड़ा होता है।

धीरे-धीरे बीत रही थी रात…

22 सितंबर की देर रात से लेकर 23 सितंबर की भोर 5 बजे तक वाइस चांसलर प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी की कोशिश थी कि वह छात्राओं को किसी तरह से हॉस्टल के भीतर जाने के लिए तैयार कर सकें लेकिन उनकी कोशिश को कुछ बाहरी तो कुछ अन्दुरुनी तत्व सफल नहीं होने देते हैं।

अब 23 सितम्बर की बात…

23 सितंबर को दिन जैसे ही चढ़ने लगता है कि अचानक छात्राओं का एक गुट बाहरी तत्वों की अभद्रता और गाली-गलौज की लगातार हरकतों से आजिज होकर धरने से उठने की जिद पकड़ लेता है। पीड़ित छात्रा अपने दोस्तों को लेकर खुद ही कुलपति निवास पहुंच जाती है, और वहां वो साफ करती है कि हमें जबरन सिंहद्वार पर बिठाकर रखा गया है। कुछ लोगों ने महामना की मूर्ति पर कालिख फेंकने की कोशिश की थी, ये बात सही है।…अब हम धरने पर नहीं जाएंगे। सर आप हॉस्टल आइए, सारी छात्राएं आपसे मिलकर बात करेंगी।


कुलपति‍ और छात्राओं की मुलाकात…

पीड़ित छात्रा को कुलपति भरोसा देते हैं कि वह रात 8 बजे त्रिवेणी हॉस्टल आकर सभी छात्राओं से मुलाकात करेंगे। पीड़ित छात्रा के जाने के बाद पूरे धरने की लीडर एकता सिंह भी अपनी 10 सहेलियों के साथ धरने से उठकर कुलपति निवास पहुंचती है।

कुलपति‍-एकता सिंह की बातचीत

कुलपति एकता सिंह से पूछते हैं, ”क्या ये बात सही है कि महामना की मूर्ति पर कालिख फेंकने की कोशिश हुई।”
एकता सिंह – हां सर, यह बात सही है, मैंने उस लडके को रोका लेकिन वह नहीं माना।
कुलपति – बेटे, मैं सिंहद्वार पर भी आने को तैयार था लेकिन जैसे ही मैंने ये बात सुनी, मैंने तय कर लिया के ये करने और इसे देखकर सहन करने वाले मेरे विश्वविद्यालय के स्टूडेंट नहीं हो सकते। एकता तुम्हें उसी क्षण धरने से अपने दोस्तों के साथ हट जाना चाहिए था। आखिर मैं कब तुम लोगों से नहीं मिला। जो भी समस्या है, हम मिलकर समाधान निकालेंगे।
एकता सिंह – (सुबकते हुए) हां सर, इसीलिए तो आपके पास आई हूं। मुझे कोई शिकायत नहीं है, हमारा मुद्दा बाहरी लोगों ने आपके खिलाफ इस्तेमाल करने का औजार बना दिया।
डीन ऑफ स्टूडेंट – अब तुमको होश आया है, तुम्ही हो ना जिसे देर रात तक मैंने समझाया था। अब जब सारी चीज हाथ से निकल गई तो यहां रो रही हो। अब रोना धोना बंद करो। ये बताओ कि सर से क्या कहना है तुम्हें।
एकता सिंह – यही कहना है कि सर हमारे हॉस्टल आए जाएं, हम लोग सब संभाल लेंगे।
कुलपति – प्रॉक्टर साहेब (बगल में खड़े हैं), मैं हॉस्टल चलूंगा, चलने का इंतजाम करिए।

कुलपति‍ ने फि‍र पूछा…

23 सितंबर की दोपहर ढलते ही धरने से उठकर छात्राओं का एक और ग्रुप कुलपति निवास पर चला आया। ये ग्रुप महिला महाविद्यालय की छात्राओं का था। इसमें करीब 25 छात्राएं शामिल थीं। कुलपति ने सभी छात्राओं से पूछा कि क्या महामना पर कालिख फेंकने की कोशिश वहां की गई थी। तकरीबन सभी छात्राओं ने सर हिलाया कि हां सर, हुई थी।

गलती हो गई सर…

कुलपति ने फौरन दूसरा सवाल दागा कि तुम लोगों ने उसी समय वहां से हटने का फैसला क्यों नहीं किया। एक छात्रा ने कहा-गलती हो गई सर, हमें पता नहीं था कि ये धरना इतना बड़ा रूप ले लेगा।

कुलपति‍ का हॉस्‍टल जाने का वक्‍त हुआ मुकर्रर

कुलपति छात्राओं के कहने पर एमएमवी हॉस्टल आने का वक्त भी मुकर्रर कर देते हैं । हालांकि बाद में साफ करते हैं कि पहले त्रिवेणी हॉस्टल जाएंगे फिर एमएमवी। बातों का ये सिलसिला चलते हुए शाम ढलने लग जाती है।

पहुंचती हैं दो अफसर…

इसी बीच 23 सितंबर की शाम करीब साढ़े 6 बजे एक महिला पुलिस अफसर और महिला आईएएस अधिकारी कुलपति निवास में पहुंचती हैं।
महिला आईएएस – कहां हैं कुलपति, कहिए कि फौरन एमएमवी हॉस्टल चलें, वहां सारी लड़कियां इकट्ठा हैं।
प्रोक्टोरियल बोर्ड के अफसर की ओर से कहा जाता है कि कुलपति हॉस्टल जाएंगे, पहले त्रिवेणी जाएंगे फिर एमएमवी।
महिला आईएएस – नहीं, फौरन चलना होगा, एमएमवी पहले, बाद में कहीं और।
बीएचयू के एक अधिकारी जवाब देते हैं कि सर ने समय दे रखा है, 8 बजे रात त्रिवेणी और 9 बजे रात एमएमवी के लिए।
( शेष कड़ी का इंतजार करिए। अगला हिस्सा ही पूरी कहानी का सबसे अहम यूटर्न है कि आखिर लाठीचार्ज किसने कराया, कैसे कराया)

डॉ. राकेश उपाध्‍याय, देश के कई नामी मीडि‍या समूहों में वरि‍ष्‍ठ पद पर रहे हैं।
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