बनारस। भारत के इतिहास में 6 दिसम्बर का दिन दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है। जहां कुछ लोग इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं तो वहीं मुस्‍लिम समाज का एक बड़ा हिस्‍सा इस दिन को काला दिवस के रूप में मनाता है।


साल 1992 में हुए बाबरी विध्वंस की चिंगारी आज भी कहीं न कहीं लोगों के दिल में सुलग रही है। शहर के मुस्लिम बाहुल्‍य इलाके दालमंडी, नई सड़क, बेनियाबाग, कज्जाकपुरा, दोषिपुरा तथा बजरडीहा में लोगों ने इस दिन अपनी दुकाने बंद रखी। वहीं कुछ ऐसे भी लोग मिले जो इस चिंगारी से अब निजात चहते हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इस मामले में अगली तारीख 8 फरवरी तय कर दी है पर इससे निजात पाने के लिए लोग इंतज़ार में हैं।


दालमंडी के व्‍यापारियों की मानें तो छह दिसंबर का दिन उन लोगों के लिए काफी आघात का दिन है। दालमंडी के स्थानीय निवासी शकील अहमद और दुकानदार नासिर ने बताया कि साल 1992 में जो घटना हुई वह भारतीय इतिहास के पन्नों में बेशक काले अक्षरों में लिखी जायेगी।


उन्‍होंने बताया कि हम जबतक जीते रहेंगे तबतक इस दिन अपने काम-धंधे बंदकर काला दिवस मनाएंगे।कपड़ा व्यापारी आसिफ अली ने बताया कि अब मामला न्यायलय में है तो जो भी फैसला आएगा उसे माना जायेगा। उन्‍होंने बताया कि पिछले 25 सालों से हम सब व्‍यापारी अपनी दुकानें बंद कर के काला दिवस मनाते आ रहे हैं।

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