नारस। आपने नागपंचमी के दिन सुबह-सुबह मोहल्‍लों में ‘बड़े गुरू का छोटे गुरू का नाग ले लो नाग ले लो’ की आवाज लगाते बच्‍चों को जरूर देखा-सुना होगा। लेकिन क्‍या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये बड़े गुरू और छोटे गुरू हैं कौन और इनका नागपंचमी से क्‍या लेना देना है। आइये जानते हैं-

तो महर्षि पतंजलि हैं छोटे गुरू
शिव नगरी काशी अपने भीतर अनगिनत पौराणिक रहस्‍यों को छिपाए हुए है। वैसे तो बनारस को गुरुओं का शहर कहते हैं लेकिन नाग पंचमी के दिन हम दो-दो गुरुओं की बात करते हैं। ये हैं बड़े गुरू और छोटे गुरू। दरअसल, इतिहासकारों का मनना है कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्‍दी में महर्षि पतंजलि काशी में ही रहते थे। काशी में भी इनका निवास नागकूप बताया जाता है। यही पतंजलि आगे चलकर छोटे गुरू के रूप में विख्‍यात हुए।

विज्ञापन

व्‍याकरणाचार्य पाणिनी हैं बड़े गुरू
छोटे गुरू यानी महर्षि पतंजलि व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्‍य थे और काशी के नागकूप परिसर में रहकर अपने गुरू के व्‍याकरण शास्‍त्र अष्‍टाध्‍यायी की टीका तैयार की थी। इस तरह पाणिनी को बड़े गुरू की उपाधि दी गई है। बनारस वाले तब से श्रावण माह की कृष्ण पंचमी तिथि को दोनों गुरुओं के नाम से नाग के चित्र बांटते हैं। यह भी बता दें कि महर्षि पतंजलि को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है।

नाग पंचमी का महत्‍व
नाग पंचमी यानि नागों की उत्पति का दिन। सनातन भारतीय परंपरा में यह पर्व बहुत महत्‍वपूर्ण है। भगवान शिव के कंठहार बने सर्प को पूजने के लिए सावन माह से उत्‍तम और कोई माह नहीं हो सकता। विद्वानों के अनुसार इसी पवित्र माह की पंचमी तिथि को नागवंश का उदय हुआ था। मान्यता हैं की आज के दिन ही नाग देवता के दर्शन-पूजन करने से कालसर्प योग से मुक्‍ति मिलती है।

धर्म की नगरी काशी में विद्यमान है प्राचीन नागकूप
शहर के नवापुरा क्षेत्र में एक ऐसा कुंआ है जिसे प्राचीन विचारक नागों का निवास स्‍थान बताते हैं। इस नाग कुंए का वर्णन विभिन्‍न पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। जिसके अनुसार इस कूप के दर्शन मात्र  से ही आजीवन नाग दंश के भय से मुक्‍ति मिल जाती है। यही नहीं काल सर्प योग से पीड़ित लोगों के लिए भी नागकूप का दर्शन अत्‍यंत शुभ माना जाता है।

करकोटक नाग तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध इस जगह पर शेषावतार (नागवंश) के महर्षि पतंजलि ने व्याकरणाचार्य पाणिनी के भाष्य की रचना की थी। इस कूप की सबसे बड़ी महत्ता ये हैं की इस कूप में स्नान व पूजा मात्र से ही सारे पापों का नाश हो जाता है।

ज्‍योतिषाचार्यों की मान्‍यता है कि जिनकी कुंडली में रहू-केतु बीच में सारे ग्रह आ जाते हैं उसे नागदोष लग जाता है। इसे कालसर्प दोष भी कहते हैं। नागकूप मंदिर के पुजारी राजीव पांडेय की मानें तो आज के दिन इस कुंड में स्नान करने से कालसर्प दोष का प्रभाव नष्‍ट हो जाता है। मंदिर के पुजारी के अनुसार दुनिया में कालसर्प दोष से निवारण के लिए सिर्फ तीन स्‍थान हैं, जिनमें से काशी का ये कारकोटक तीर्थ अति महत्‍वपूर्ण है। इस कुंड को सभी तीनों नागकूपों में प्रधान माना जाता है।

शिव नगरी काशी में नागदेवता की पूजा पूरे श्रद्धाभाव के साथ की जाती है। सदियों से काशी में नाग देवता को पूजने की परंपरा रही है। खासकर श्रावण कृष्‍ण पंचमी की तिथि को पौ फटने के साथ ही श्रद्धालु पूजा की थाल लेकर नागकूप पहुंचने लगते हैं। इस दौरान दूध-घी और नैवैद्य अर्पण कर परिवार को सर्प भय के साथ उतम स्वास्थ्य की कामना की जाती है। इसके अलावा घरों में भी लोग पारंपरिक तरीके से नागदेवता की पूजा करते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में आ चुके सर्प भी भय नहीं देते।

विज्ञापन
Loading...