नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS भी अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के प्रथम अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या 42 से 47 की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या एक से पांच पर नजर डालते हैं।

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अध्‍याय दो

श्‍लोक संख्‍या एक से पांच


संजय उवाच

तं तथा कृपयाविष्‍टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्‍तमिदं वाक्‍यमुवाय मधुसूदन:।। (1)
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भावार्थ : संजय बोले – उस प्रकार करुणा से व्‍याप्‍त और आंसुओं से पूर्ण तथा व्‍याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्‍त उस अर्जुन के प्रति भगवान् मधुसूदन ने यह वचन कहा।


श्रीमगवानुवाच

कुतस्‍त्‍वा कश्‍मलमिदं विषमे समुपस्‍थितम्।
अनार्यजुष्‍टमस्‍वगर्यमकीर्तिकरमर्जुन।।(2)
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भावार्थ : श्रीभगवान् बोले – हे अर्जुन, तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्‍त हुआ ? क्‍योंकि न तो यह श्रेष्‍ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्‍वर्ग को देनेवाला है और न कीर्तिको करने वाला ही है।


क्‍लैब्‍यं मा स्‍म गम: पार्थ नैतत्‍त्‍वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौबग्‍ल्‍यं त्‍यक्‍त्‍वोत्‍तिष्‍ठ परन्‍तप।। (3)
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भावार्थ : इसलिए हे अर्जुन, नपुंसकता को मत प्राप्‍त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप, हृदय की तुच्‍छ दुर्बलता को त्‍यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।


अर्जुन उवाच

कथं भीष्‍महं संख्‍ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभि: प्रतियोत्‍स्यामि पूजार्हावरिसूदन।। (4)
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भावार्थ : अर्जुन बोले – हे मधुसूदन, मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्‍मपितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूंगा ? क्‍योंकि हे अरिसूदन वे दोनों ही पूज्‍यनीय हैं।


गुरुनहत्‍वा हिमहानुभवांछ्रेयो भोक्‍तुं भैक्ष्‍यमपीह लोके।
हत्‍वार्थकामांस्‍तु गुरुनिहैव भुंजीय भोगान्‍रुधिरप्रदिग्‍धान्।। (5)
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भावार्थ : इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्‍न भी खाना कल्‍याणकारक समझता हूं, क्‍योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूंगा।


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क्रमश:

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