श्रीमद्भागवद्गीता : द्वितीय अध्‍याय, श्‍लोक संख्‍या छह से दस

0
30

नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS भी अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या एक से पांच की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या छह से दस पर नजर डालते हैं।

अध्‍याय दो

श्‍लोक संख्‍या छह से दस


न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु:।
यानेव हत्‍वा न जिजीविषामस्‍तेवास्‍थित: प्रमुखे धार्तराष्‍ट्रा:।। (6)

भावार्थ  : यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना इन दोनों में से कौन सा श्रेष्‍ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्‍हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते वे ही हमारे आत्‍मीय धृतराष्‍ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं।


कार्पण्‍यदोषोपहतस्‍वभाव: पृच्‍छामि त्‍वां धर्मसम्‍मूढचेता:।
यच्‍छ्रेय: स्‍यान्‍निश्‍चितं ब्रूहि तन्‍मे शिष्‍यस्‍तेहं शाधिमांत्‍वां प्रपन्‍नम्।। (7)
****************

भावार्थ : इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्‍वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहितचुत्‍त हुआ मैं आपसे पूछता हूं कि जो साधन निश्‍चित कल्‍याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिये, क्‍योंकि मैं अपका शिष्‍य हूं, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।


 


न हि:
 प्रपश्‍यामि ममापनुद्या द्यच्‍छोकमुच्‍छोषणमिन्‍द्रियाणाम्।
अवाप्‍य भूमावसपत्‍नमृद्धं राजयं सुराणामपि चधिपत्‍यम्।। (8)
********************

 

भावार्थ : क्‍योकि भूमि में निष्‍कण्‍टक, धन-धान्‍यसम्‍पन्‍न राज्‍य को और देवताओं के स्‍वामीपने को प्राप्‍त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूं, जो मेरी इंद्रीयों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके।


संजय उवाच

एवमुक्‍त्‍वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्‍तप।
न योत्‍स्‍य इति गोविन्‍दमुक्‍त्‍वा तूष्‍णीं बभूव ह।। (9)
********************

भावार्थ : संजय बोले – हे राजन, निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्‍ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्रीगोविन्‍दभगवान् से ‘युद्ध नहीं करूंगा’ यह स्‍पष्‍ट कहकर चुप हो गये।


मुवाच हृषीकेश: प्रहसन्‍निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्‍ये विषीदन्‍तमिदं वच:।। (10)
********************

भावार्थ : हे भरतवंशी धृतराष्‍ट्र, अंतर्यामी श्रीकृष्‍ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए से यह वचन बोले।


क्रमश:

पिछले श्‍लोक को पढ़ने के लिए यहां क्‍लिक करें