श्रीमद्भागवद्गीता : द्वितीय अध्‍याय, श्‍लोक संख्‍या 11 से 15

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नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS  भी अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या छह से दस की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या ग्‍यारह से पंद्रह पर नजर डालते हैं।

अध्‍याय दो

लोक संख्‍या ग्‍यारह से पंद्रह


अशोच्‍यानन्‍वशोचस्‍त्‍वं प्रज्ञावादांश्‍च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्‍च नानुशोचन्‍ति पण्‍डिता:।। (11)
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भावार्थ: श्रीभगवान् बोले – हे अर्जुन, तू न शोक करने योग्‍य मनुष्‍यों के लिए शोक करता है और पण्‍डितों के से वचनों को कहता है, परंतु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिए भी पण्‍डितजन शोक नहीं करते।


नत्‍वेवाहं जातु नासं न त्‍वं नेमे जनाधिपा:।
न चैव न भविष्‍याम: सर्वे वयमत: परम्।। (12)
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भावार्थ: न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।


देहिनोस्‍मिन्‍यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्‍तरप्राप्‍तिर्धीरस्‍तत्र न मुह्यति।। (13)
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भावार्थ: जैसे जीवात्‍मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्‍था होती है, वैसे ही अन्‍य शरीर की प्राप्‍ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।


मात्रास्‍पर्शास्‍तु कौन्‍तेय शीतोष्‍णसुखदु:खदा:।
आगमापायिनोनित्‍यास्‍तांस्‍तितिक्षस्‍व भारत।। (14)
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भावार्थ: हे कुन्‍तीपुत्र, सर्दी-गर्मी और सुख-दु:ख को देनेवाले इन्‍द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्‍पत्‍ति विनाशशील और अनित्‍य हैं, इसलिए हे भारत, उनको तू सहन कर।


यं हि न व्‍यथयन्‍त्‍येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समुद:खसुखं धीरं सोमृतत्‍वाय कल्‍पते।। (15)
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भावार्थ: हे पुरुषश्रेष्‍ठ, दु:ख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्‍द्रीय और विषयों के संयोग व्‍याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्‍य होता है।


क्रमश:

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