श्रीमद्भागवद्गीता : द्वितीय अध्‍याय, श्‍लोक संख्‍या 21 से 25

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नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS भी अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या सोलह से बीस की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या इक्‍कीस से पच्‍चीस पर नजर डालते हैं।

अध्‍याय दो

श्‍लोक संख्‍या इक्‍कीस से पच्‍चीस


वेदाविनाशिनं नित्‍यं य एनमजमव्‍ययम्।
कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्‍ति कम्।। (21)
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 भावार्थ: पृथापुत्र अर्जुन, जो पुरुष इस आत्‍मा को नाश रहित, नित्‍य, अजन्‍मा और अव्‍यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्‍यन्‍यानि संयाति नवानि देही।। (22)
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 भावार्थ: जैसे मनुष्‍य पुराने वस्‍त्रों को त्‍यागकर दूसरे नये वस्‍त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्‍मा पुराने त्‍यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्‍त होता है।


नैनं छिन्‍दन्‍ति शस्‍त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्‍लेदयन्‍त्‍यापो न शोषयति मारुत:।। (23)
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 भावार्थ: इस आत्‍मा को शस्‍त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता।


अच्‍छेद्योयमदाह्योयमक्‍लेद्योशेष्‍य एव च।
नित्‍य: सर्वगत: स्‍थाणुरचलोयं सनातन:।। (24)
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 भावार्थ: क्‍योंकि यह आत्‍मा अच्‍छेद्य है, यह आत्‍मा अदाह्य, अक्‍लेद्ये और नि:संदेह अशेष्‍य है तथा यह आत्‍मा नित्‍य, सर्वव्‍यापी, अचल, स्‍थिर रहने वाला और सनातन है


अव्‍यक्‍तोयमचिन्‍त्‍योयमविकार्योयमुच्‍यते।
तस्‍मादेवं विदित्‍वैनं नानुशोचितुमर्हसि।। (25)
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 भावार्थ: यह आत्‍मा अव्‍यक्‍त है, यह आत्‍मा अचिन्‍त्‍य है और यह आत्‍मा विकार रहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन, इस आत्‍मा को अपर्युक्‍त प्रकार से जानकर तू शोक करने को योग्‍य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है।


क्रमश:

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