नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS भी अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या इक्‍कीस से पच्‍चीस की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या छब्‍बीस से तीस पर नजर डालते हैं।

अध्‍याय दो

श्‍लोक संख्‍या छब्‍बीस से तीस


अथ चैनं नित्‍यजातं नित्‍यं वा मन्‍यसे मृतम्।
तथापि त्‍वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि।। (26)
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भावार्थ: किन्‍तु यदि तू इस आत्‍मा को सदा जन्‍मनेवाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो, तू इस प्रकार शोक करने को योग्‍य नहीं है।


जातस्‍य हि ध्रुवो मृत्‍युर्ध्रुवं जन्‍म मृतस्‍य च।
तस्‍मादपरिहार्येर्थे न त्‍वं शोचितुमर्हसि।। (27)
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भावार्थ: क्‍योंकि इस मान्‍यता के अनुसार जन्‍मे हुए की मृत्‍यु निश्‍चित है और मरे हुए का जन्‍म निश्‍चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने को योग्‍य नहीं है।


अव्‍यक्‍तादीनि भूतानि व्‍यक्‍तमध्‍यानि भारत।
अव्‍यक्‍तनिधनान्‍येव तत्र का परिदेवना।। (28)
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भावार्थ: हे अर्जुन, सम्‍पूर्ण प्राणी जन्‍म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्‍थिति में क्‍या शोक करना है ?



 आश्‍चर्यवत्‍पश्‍यति कश्‍चिदेन माश्‍चर्यवद्वदति तथैव चान्‍य:।
आश्‍चर्यवच्‍चैनमन्‍य: श्रणोति श्रुत्‍वाप्‍येनं वेद न चैव कश्‍चित्।। (29)
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भावार्थकोई एक महापुरुष ही इस आत्‍मा को आश्‍चर्य की भांति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्‍व का आश्‍चर्य की भांति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्‍चर्य की भांति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता।


देही नित्‍यमवध्‍योयं देहे सर्वस्‍य भारत।
तस्‍मात्‍सर्वाणि भूतानि न त्‍वं शोचितुमर्हसि।। (30)
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भावार्थ: हे अर्जुन, यह आत्‍मा सबके शरीरों में सदा ही अवध्‍य है। इस कारण सम्‍पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने के योग्‍य नहीं है।


क्रमश:

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