नातन धर्म के महान ग्रंथों में श्रीमद्भागवद्गीता का नाम बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। दरअसल, ये महान ग्रथ महर्षि वेदव्‍यास द्वारा रचित दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्‍य महाभारत के भीष्‍मपर्व के अंतर्गत एक उपनिषद् है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीमद्भागवद्गीता का अनुवाद किया जा चुका है।

Live VNS अपने पाठकों के लिए प्रतिदिन गीता के पांच श्‍लोकों को हिन्‍दी अनुवाद के साथ प्रस्‍तुत कर रहा है। हम अपने पाठकों से अपेक्षा करते हैं कि गीता के इन श्‍लोकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें और भक्‍ति, कर्म और ज्ञान योग से संबंधित अपनी जिज्ञासाओं को शांत करें। कल हमने गीता के द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या छब्‍बीस से तीस की व्‍याख्‍या की थी। आइए अब इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए द्वितीय अध्‍याय के श्‍लोक संख्‍या इकत्‍तीस से पैंतीस पर नजर डालते हैं।

अध्‍याय दो

श्‍लोक संख्‍या इकत्‍तीस से पैंतीस


स्‍वधर्ममपि चावेक्ष्‍य न विकम्‍पितुमर्हसि।
धर्म्‍याद्धि युद्धाच्‍छ्रेयोन्‍यत्‍क्षत्रियस्‍य न विद्यते।। (31)
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भावार्थ: तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्‍य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए, क्‍योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युक्‍त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्‍याणकारी कर्तव्‍य नहीं है।


यदृच्‍छया चोपपन्‍नं स्‍वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्‍ते युद्धमीदृशम्।। (32)
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भावार्थ: हे पार्थ, अपने-आप प्राप्‍त हुए और खुले हुए स्‍वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्‍यवान क्षत्रिय लोग भी पाते हैं।


अथ चेत्‍त्‍वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्‍यसि।
तत: स्‍वधर्मं कीर्तिं च हित्‍वा पापमवाप्‍स्‍यसि।। (33)
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भावार्थ: किंतु यदि तू इस धर्मयुक्‍त युद्ध को नहीं करेंगा तो स्‍वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्‍त होगा।


अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्‍यन्‍ति तेव्‍ययाम्।
सम्‍भावितस्‍य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्‍यते।। (34)
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भावार्थ: तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी कढ़कर है।


भयाद्रणादुपरतं मंस्‍यन्‍ते त्‍वां महारथा:।
येषां च त्‍वं बहुमतो भूत्‍वा यास्‍यसि लाघवम्।। (35)
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भावार्थ: और जिकी दृष्‍टि में तू पहले बहुत सम्‍मानित होकर अब लघुता को प्राप्‍त होगा, वे महारथी लोग तुझे भयके कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे।


क्रमश:

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