गोयनका लाइब्रेरी का होगा कायाकल्प, पांडुलिपियों के डिजिटाइजेशन का सपना होगा पूरा

नारस। विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए अन्य भवनों के साथ साथ ललिता घाट पर बनी गोयनका लाइब्रेरी को भी खरीदने का प्रस्ताव हाल ही में रखा गया था, लेकिन कंसल्टेंसी कंपनी की और से इस लाइब्रेरी से कोई छेद छड़ न कर समृद्धीकरण करने के खाके को पेश करने के बाद इसके संरक्षित होने का द्वार खुल गया है।

गंगा तट स्थित विश्वनाथ पुस्तकालय ( गोयनका लाइब्रेरी ) के ग्रंथों और पुस्तकों का अब डिजिटाइजेशन का सपना भी पूरा हो सकेगा। गौरी शंकर गोयनका समर्पित निधि के पदेन ट्रस्टी व गोयनका महाविद्यालय के प्राचार्य पं. सुधीर कांत झा ने इसे लाइब्रेरी के लिए नवजीवन बताया।

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श्रीकाशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद् की ओर से ग्रंथालय को सवारने में मदद का भरोसा दिए जाने के बाद गौरी शंकर गोयनका निधि को या उम्मीद जगी है। ट्रस्ट ने लगभग एक दशक पहले भी केंद्र सरकार की योजना के तहत इस लाइब्रेरी के लिए प्रयास किये थे पर उस समय यह कार्य संभव नहीं हो पाया। अब कारिडोर निर्माण के समय विशिष्ट क्षेत्र प्रशासन की ओर से जब ग्रंथालय को ट्रस्ट के पास ही रहने देने और संरक्षण में मदद की मंशा आम की गई तो एक बार फिर से उम्मीदों को पंख लग गए।

विश्वनाथ कॉरिडोर योजना में अन्य भवनों की तरह गोयनका लाइब्रेरी को भी खरीदने का प्रस्ताव था लेकिन जो कंपनी यह कॉरिडोर बना रही है उसके पहले ही प्रजेंटेशन में गोयनका लाइब्रेरी से छेड़ छड़ नहीं की गयी है। इसमें यदि ट्रस्ट चाहेगा तो यह लाइब्रेरी खरीदी जायेगी वरना ऐसे ही इसका समृद्धीकरण और सुंदरीकरण किया जायेगा।

1926 से ललिता घाट पर है लाइब्रेरी
इस ग्रंथालय के ट्रस्टी पं. झा के अनुसार दुनिया के गिने चुने ग्रंथालयों में से एक गोयनका लाइब्रेरी जो वास्तव में विश्वनाथ लाइब्रेरी है का संचालन साल 1910 से 15 के बीच में नीलकंठ मणिकर्णिका घाट जाने वाले रस्ते पर शुरू हो चुका था। इसे बड़ा करने के लिए शहर के उद्यमी गौरी शंकर गगोयन्का ने 1926 में ललिता घाट पर चार बीघा में भवन खरीद कर इस वृहद् लाइब्रेरी का निर्माण करवाया, जिसके अंदर संस्कृत भाषा का खज़ाना मौजूद है। इस ग्रंथालय में तंत्र, पुराण, वेद, व्याकरण, साहित्य, इतिहास, ज्योतिष, बारहों दर्शन, आगम तंत्र समेत संस्कृत जगत के सभी विषयों के ग्रंथ और पांडुलिपियां है।

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