नारस। विश्वनाथ कॉरिडोर योजना में विश्वनाथ मंदिर न्यास द्वारा जब आस पास के मकान खरीदे गए तो काशी की सभ्यता के कई अनछुए पहलू निकलकर सामने आये। कई घरों के अंदर नायाब कलाकृतियों को अपनी दीवारों पर संजोये हुए मंदिर निकले, जिन्हे देखकर लोगों ने कयास लगना शुरू किया कि ये सभी विश्वनाथ मंदिर से भी पुराने प्रतीत होते हैं, पर इन सभी अटकलों पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ प्रोफेसरों और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने विराम लगा दिया है।

विश्‍वनाथ मंदिर से पुराना कोई मंदिर नहीं
विशेषज्ञों की मानें तो जिस तरह की नक्काशी और चित्रकारी इन मंदिरों पर हैं उससे प्रतीत होता है कि ये सभी मंदिर या तो काशी विश्वनाथ मंदिर के साथ बने हैं, या उसके बाद। अभी तक की जांच में ये सामने आया है कि विश्वनाथ कारीडोर में कोई भी मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर से पुराना नहीं है।

ध्‍वस्‍तीकरण के बाद सामने आये हैं मंदिर
बाबा विश्वनाथ के परिसर का दायरा बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की योजना बनायी। यही नहीं इस कॉरिडोर के कामों का जायजा लेने खुद प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी और समय समय पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी निरीक्षण करने आते रहते हैं। वहीं पुराने मकानों के ध्‍वस्‍तीकरण के दौरान इस कॉरिडोर से कई चौकानें वाले राज भी सामने आए हैं।

मंदिरों पर बने हैं देवी-देवता, अप्‍सरा और तपस्‍वी
कॉरिडोर के लिए तोड़े जा रहे मकानों में कई ऐसे मंदिर भी निकले है जिन्हें देख हर कोई यही कहता दिखा कि हमारी प्राचीन विरासत को कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ में छिपा रखा था। वहीं जानकार बताते है कि सभी मन्दिर 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के हैं। मन्दिर के चारो तरफ कई देवी देवता, अप्सरा, और तपस्वियों की मूर्तियां हैं।

पहले हजारों साल पुराने बताये जा रहे थे मंदिर
शुरू शुरू में इन मंदिरों को हजारों साल पुराना बताया गया, मगर काशी विश्वनाथ ट्रस्ट ने जब इन मन्दिरों के वास्‍तविक इतिहास को जानने के लिए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से सम्पर्क साधा तो हकीकत कुछ और ही निकली।

रिसर्च करने वालों के लिये अमूल्‍य धरोहर हैं ये मंदिर
हाल ही में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और पुरातत्व अधिकारियों ने इन सभी मंदिरों की बारीकी से जांच की है। इस पूरे मामले पर बीएचयू के कला इतिहास एवं पर्यटन के प्रोफेसर अतुल त्रिपाठी ने बताया कि इन मन्दिरों से यहां आने वाले पर्यटकों को काशी के इतिहास के बारे में जानकारी मिलेगी। साथ ही काशी पर रिसर्च करने वाले देसी-विदेशी विद्यार्थियों के लिये भी ये किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। ये सभी मन्दिर 19 वीं शताब्दी के हैं। इनमें मणिकर्णिका घाट पर मिले शिवालय की नक्काशी अकल्पनीय है।

पत्‍थरों की नहीं होती है कार्बन डेटिंग
पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी डॉक्टर सुभाष चंद यादव की मानें तो मन्दिरों के पत्‍थरों की कार्बन डेटिंग का कोई सवाल ही नही उठता। कार्बन डेटिंग सजीव चीजों की होती है, पत्थरो की नहीं। मन्दिरों के ऊपर उकेरी गयी कलाकृतियों के जरिये ही उनके इतिहास को जाना जाता है। ये सभी मन्दिर महत्वपूर्ण हैं लेकिन कोई भी मंदिर श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर से पुराना नहीं मिला है।

शिव को समर्पित ये सभी मंदिर नागर शैली के हैं
इस टीम में शामिल बीएचयू के सीनियर प्रोफेसर मारुति नंन्द तिवारी ने बताया कि सभी मन्दिर 19 वीं शताब्दी के है, जिनमे दो मन्दिरों में उन्हें 1797 और 1777 का लेख मिला है। कुछ 18 शताब्दी के हैं जो काफी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सभी मंदिरों में एक रूपता है। ये सभी मंदिर नागर शैली के हैं और सभी भगवान शिव को समर्पित हैं। मंदिर के गर्भगृह में पंचोपासन की भी समानता है।

मणिकर्णिका घाट के मंदिर में शैव-वैष्‍णव का मिलन
प्रोफेसर तिवारी के अनुसार मणिकर्णिका घाट के करीब मिला मन्दिर बेहद खास है, क्योंकि यह शैली विशेष मन्दिर है। जिसमें समुंदर मंथन, अष्टभैरव और भगवान विष्णु की भी मूर्ति है, जिससे ये साबित होता है कि यहां शैव और वैष्‍णव का मिलन है।

दो मंदिर हैं बेहद खास
इन मकानों के टूटने के बाद प्राचीन मन्दिरों का एक बड़ा समूह सामने आया है। इनमें चर्चा का विषय बने हैं दो मन्दिर। पहला है लाहौरी टोला स्‍थित श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का हूबहू मन्दिर और दूसरा है मणिकर्णिका घाट के करीब। इनकी कलाकृतियां सबसे अनोखी हैं।

गलियों में चल रहा है बड़े कॉरीडोर का काम
गौरतलब है कि मन्दिरो के शहर कहे जाने वाले काशी में अब यहां आने वाले सैलानियों को पुराणों के आनंद वन का अनुभव होने वाला है। दरसअल इन दिनों काशी में स्‍थित द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में आने वाले भक्‍तों की सुविधा के लिए कॉरिडोर का निर्माण चल रहा है। इसके अंतिम चरण में मंदिर के पूरब दिशा के नीलकंठ प्वाइंट और सरस्वती प्वाइंट के एक बड़े कारीडोर के काम चल रहा है। इसके लिए मन्दिर ट्रस्ट ने अब तक 182 भवनों को उचित मुआवजा देकर खाली भी करा लिया है और अब मकानों को तोड़ने का सिलसिला भी जारी है।

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