मुगल शहजादी लवंगलता और बनारस के पंडितराज की मार्मिक प्रेम गाथा ही है ‘प्रेम लहरी’

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तिहास ज्यादातर राजा-महाराजाओं के वैभव-पराभव की कहानी है। जो इतिहास की पकड़ से छूट जाते हैं उनकी खोज-खबर कौन ले? यह जिम्मेदारी साहित्यकार पर आती है। इसी ज़िम्मेदारी को निभाया है भारत सरकार के गुप्‍तचर सेवा से रिटायर गृहमंत्रालय के पूर्व अधिकारी और वाराणसी निवासी लेखक त्रिलोक नाथ पांडेय ने। आपने इतिहास और लोककथा की गहराइयों से निकालकर ‘प्रेम लहरी’ उपन्‍यास की रचना की है। ख्‍यातिप्राप्‍त राजकमल प्रकाशन ने इस उपन्‍यास को प्रकाशित किया है।

Live VNS ने इस उपन्‍यास को लेकर त्रिलोक नाथ पांडेय जी से विशेष बातचीत की है।

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किताबों में नहीं जुबानों में मिलती है ये कहानी
त्रिलोक नाथ पांडेय जी के अनुसार प्रेमलहरी’ इतिहास के बड़े चौखटे में कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से बुनी हुई प्रेमकथा है। यह इतिहास नहीं है, न ही इसका वर्णन किसी इतिहास की पुस्तक में मिलता है, लेकिन जनश्रुति में इस कथा के अलग-अलग हिस्से या अलग-अलग संस्करण अकसर सुने जाते हैं। इस प्रेम-आख्यान के नायक-नायिका हैं शाहजहाँ के राजकवि और दारा शिकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ और मुगल शाहज़ादी गौहरआरा उर्फ लवंगी उर्फ लवंगलता।

एक मुगल शहजादी और ब्राह्मण की प्रेम कथा
लेखक बताते हैं कि मध्यकालीन इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम प्रेम-आख्यान तो कई मिलते हैं, लेकिन किसी शाहज़ादी की किसी ब्राह्मण आचार्य और कवि से यह अकेली प्रेम कहानी है जो मुगल दरबार की दुरभिसन्धियों के बीच आकार लेती है। प्रचलित बतकहियों की गप्प समाजविज्ञान से मिल जाए तो उससे एक बड़ा सच भी सामने आ जाता है। इस उपन्यास में यही हुआ है।

इतिहास की एक फैंटेसी है प्रेम लहरी
लेखक त्रिलोक नाथ पांडेय ने अपने उपन्‍यास के जरिये इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि मुगल शाहज़ादियों को न शादी की इजाज़त थी न प्रेम करने की। ऐसे में चोरी-छुपे प्रेम-सुख तलाश करना उनकी मजबूरी रही होगी। इस उपन्यास में ऐसे कुछ विवरण आए हैं। यह उपन्यास इतिहास की एक फैंटेसी है, जिसमें किंवदन्तियों के आधार पर मध्यकालीन सत्ता-संरचना के बीच दो धर्मों और दो वर्गों के बीच न पाटी जा सकनेवाली खाली जगह में प्रेम का फूल खिलते दिखाया गया है। प्रेम लहरी’ में प्रेम की अनेक लहरें हैं। इसमें मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के ख़ुद की प्रेम कहानी के अलावा उसके बेटे-बेटियों की प्रेम-लीलाओं की चर्चा है।

आखिर में गंगा की लहरों में समा जाती है प्रेम लहर
त्रिलोक नाथ पाण्डेय ने हमें बताया कि एक प्रेमलहर पूरे उपन्यास में मुख्य रूप से चलती है और अंत में इसी (बनारस के) पंचगंगा घाट पर गंगा की लहरों में समा जाती है। पंडितराज जगन्नाथ अपने को गंगा का बेटा मानते हैं और अंत में अपनी प्रेमिका सहित गंगा की गोंद में लौट जाते हैं।

इस वजह से उपन्यास का नाम रखा ‘प्रेम लहरी’
लेखक बताते हैं कि पंडितराज जगन्नाथ मध्यकाल के मशहूर कवि हैं। वे सनातन संस्कृत काव्य-परंपरा के अंतिम कवि हैं। इतिहास में पंडितराज जगन्नाथ की सुप्रसिद्ध कृति है ‘गंगालहरी’, जिसमें पंडितराज ने बड़े भक्तिभाव से 52 श्लोकों में गंगा माँ के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है। ‘गंगालहरी’ खुद पंडितराज जगन्नाथ का अद्भुत संस्कृत काव्य है जिसमें कहीं-कहीं खुद उनके प्रेम की व्यंजना निहित है। उसी प्रेम की पराकाष्ठा को प्रकाश में लाने के लिए गंगालहरी की तर्ज पर इस उपन्यास का नाम ‘प्रेमलहरी’ रखा गया है।

इतिहास की नींव पर साहित्‍य की इमारत
त्रिलोक नाथ पांडेय के अनुसार इस उपन्यास में इतिहास नींव है और साहित्य उसपर उठी हुई इमारत है। इतिहास पृष्ठभूमि है तो साहित्य उस पर पड़ने वाला प्रकाश है। कल्पना और जनश्रुतियों के धागों से इतिहास की जमीन पर बुनी हुई यह प्रेमकथा है। अगर प्रतिशत में जानना चाहें तो कह सकते हैं की इस कथा में इतिहास और कल्पना का अनुपात 50-50 है।

बनारस से शुरू बनारस में अंत
अपनी पुस्तक ‘प्रेम लहरी’ के बारे में बताते हुए त्रिलोक नाथ पाण्डेय बताते हैं कि पूरे उपन्यास में बनारस ही छाया हुआ है। नायक की जन्मस्थली और कर्मस्थली है बनारस और नायिका के संग यहीं पर वह अंतिम विश्राम लेता है। कहानी बनारस से ही शुरू होती है– बनारस में शाहजहाँ का आगमन, यहां के मंदिरों का ध्वंस, बनारसियों के ऊपर बनारस के फौजदार और अल्लाहाबाद के सूबेदार का अत्याचार का चित्रण है। साथ ही, बनारस का तत्कालीन समाज उभर कर आया है– पंडितों का पारस्परिक वैमनस्य, वर्चस्व के लिए उनके बीच कटु प्रतिद्वंद्विता और असहिष्णुता भी इसमें बताया गया है।

बनारस की मस्‍ती और मौज भी है
इन सब नकारात्मकाताओं के बीच बनारस की मस्ती और मौज भी छलकता है इस उपन्यास में। बनारसी जिन्दादिली की मिशाल है यह उपन्यास। आखिर में, लवंगलता मिठाई की चर्चा आई है, जिसे माना गया है कि इसका अविष्कार बनारसियों ने प्रेम की महान पुजारिनी के सर्वोच्च बलिदान की स्मृति में किया है। बनारसियों के मन में पंडितराज जगन्नाथ अपनी कृति ‘गंगालहरी’ और लवंगी एक खास मिठाई ‘लवंगलता’ के रूप में आज भी जीवित हैं। दरअसल जिन्हें इतिहास नहीं समझ पाता, उन्हें लोक मान्यता देता है। उपन्‍यास में इस बात पर भी अफसोस जाहिर किया गया है कि अगर शाहजहां का पुत्र दारा शिकोह जिन्दा रहा होता तो बनारस की कुछ और ही बात होती, यहाँ कुछ और ही रौनक होती।

लेखक के बारे में
‘प्रेम लहरी’ के लेखक त्रिलोक नाथ पाण्डेय मूलत: अंग्रेजी भाषा लेखक हैं। इनकी पहली रचना ‘Chanakya’s Spies‘ प्रकाशनाधीन है। आप अभी हाल में ही दिल्ली में भारत सरकार के गुप्तचर विभाग से निदेशक-स्तरीय उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। बनारस ही इनका पता-ठिकाना है।

राष्‍ट्रपति पदक से सम्‍मानित हो चुके हैं त्रिलोक नाथ पांडेय
इनका कहना है कि पूरा संसार ही इनका परिवार है, खासकर इनका पाठकवर्ग। इन्हें देश की सुरक्षा में इनके योगदान को सम्मानित करने के लिए भारत सरकार द्वारा कई पुरस्कार प्रदान किये गए हैं। इनमें ‘सुकृति पुरस्कार’, भारतीय पुलिस पदक और राष्ट्रपति का पदक प्रमुख हैं।

तस्‍वीरें : उत्‍कृष्‍ट गुप्‍तचर सेवा के लिये पुरस्‍कृत हो चुके हैं त्रिलोक नाथ पांडेय

हाथों हाथ बिक रहा उपन्‍यास
नई दिल्‍ली के प्रगति मैदान में 5 से 13 जनवरी तक चल रहे विश्‍व पुस्‍तक मेले में भी प्रेम लहरी उपन्‍यास की डिमांड काफी ज्‍यादा है। त्रिलोक नाथ पांडेय द्वारा रचित प्रेम लहरी उपन्‍यास ई-कॉमर्स की वेबसाइट अमेज़न पर भी उपलब्‍ध है। आप यहां क्‍लिक करें इसे ऑर्डर कर सकते हैं।

देखें वीडियो, प्रेम लहरी के लेखक त्रिलोक नाथ पांडेय जी से की विशेष बातचीत के अंश

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