नारस। पद्म पुरुस्कार की घोषणा में इस वर्ष उत्तर प्रदेश में काशी का दबदबा रहा। बनारस के चार धुरंधरों को इस सम्मान से नवाज़े जाने की घोषणा की गई है, जिसमे बनारस संगीत घराने के डॉ राजेश्वर आचार्य को भी पद्मश्री एवार्ड से सम्मानित किये जाने का एलान किया गया है।

इस बात की सूचना मिलते ही पंडित राजेश्वर आचार्य के घर बधाई देने वालों का तांता लग गया। उनके परिवार में इस सम्मान मिलने के बाद ख़ुशी का माहौल है। पंडित राजेश्वर आचार्य ने इसे अपना सम्मान ना बताकर इसे कला जगत का सम्मान बताया। पंडित राजेश्वर आचार्य का भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई से भी गहरा नाता था ।

टीम Live VNS ने गणतंत्र के 70वें पर्व की पहुंचकर उन्हें बधाई दी और उनसे इस सम्बन्ध में बात की। पंडित राजेश्वर आचार्य की जन्मस्थली काशी है, तो उनकी कर्म भूमि गोरखपुर रही है। पण्डित राजेश्वर जी वाद्य यंत्र जल तरंग के अकेले साधक के साथ साथ ध्रुपद गायकी के पुरोधा हैं।

दूसरों के बड़प्पन को स्वीकार करने का मौक़ा मिला है
हमने जब पंडित राजेश्वर से जानना चाहा कि आप को सरकार ने पद्मश्री एवार्ड दिया है, कैसा लग रहा है तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि राष्ट्र ने आप को सम्मान का पात्र बनाया है, अब आप इस सम्मान को बांटिए। आप अब जिसे सम्मान बाटेंगे खुद को विशिष्ट व्यक्ति समझेगा। इस सम्मान से मैं बड़ा हो गया हूं, ऐसा नहीं है। मुझे दूसरे के बड़प्पन को स्वीकार करने का मौक़ा सरकार ने दिया है।

भोलेनाथ का प्रसाद
पंडित राजेश्वर आचार्य ने बताया कि एक तरह से मुझे सम्मान की फ्रेंचाईजी मिली है, जो भी गुणी जन हों उन्हें सम्मान का हिस्सेदार बनाऊं और भोलेनाथ द्वारा दिया गया यह प्रसाद सब मे वितरित करूँ। यह मेरा नहीं पूरे कलाकार वर्ग और रचना प्रेमियों का सम्मान है।

बाबा भोलेनाथ और बाबा गोरखनाथ इस सम्मान के अधिकारी
पंडित राजेश्वर आचार्य ने एक शिक्षक के रूप में गोरखपुर विश्विद्यालय को लम्बी सेवा दी और गोरखपुर विश्विद्यालय का कुलगीत भी आप ने ही लिखा है। पंडित राजेश्वर आचार्य ने बताया कि मेरी जन्मस्थली काशी है और कर्मस्थली गोरखपुर विश्विद्यालय है इसलिए इस सम्मान के बाबा भोलेनाथ और बाबा गोरखनाथ अधिकारी हैं, मैं तो केवल पात्र हूं।

कलाकार का सम्मान ख़ुशी का विषय
पंडित राजेश्वर आचार्य से जब पूछा गया कि कितने खुश हैं आप इस सम्मान से तो बोले की कलाकार का जब भी सम्मान होता है तो वह ख़ुशी की बात होती है, क्योंकि अवन्दनीय का वंदन और वन्दनीय का अवंदन सांस्कृतिक अपराध माना जाता है, इसलिए आप को जब भी सम्मान मिले उस समग्र कला का सम्मान समझें, मात्र अपना नहीं। ये कला जगत का सम्मान है और काशी के लोगों का मेरे लिए प्यार का सम्मान है।

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