नारस। उत्तर प्रदेश पुलिस में कई नायाब हीरे विभाग के मस्तक को लगातार ऊंचा करते रहे हैं। ऐसे पुलिसकर्मी अपनी कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं और अपराधियों में इनकी कार्यशैली को लेकर खौफ रहता है। ऐसे ही एक पुलिसकर्मी इस वक़्त वाराणसी क्राइम ब्रांच की कमान संभाल रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं वाराणसी क्राइम ब्रांच प्रभारी सब इंस्‍पेक्‍टर विक्रम सिंह की, जिन्होंने साल 2001 में पुलिस की वर्दी पहनने के बाद नित्य नए कीर्तिमान रचे हैं। साथ ही जनता को भयमुक्त वातावरण दिया है।

वाराणसी पुलिस के इस सुपरकॉप के बारे में जानने के लिए हम ने विक्रम सिंह से बात की। हमने इनके पुलिस करियर और इस दौरान आयी चुनौतियों के बारे में जानने की कोशिश की कि कैसे इन्होने सुल्तानपुर, फैज़ाबाद, झाँसी और अब बनारस के अपराधियों को जेल की राह दिखायी।

सीधी भर्ती से हुए सब इन्स्पेक्टर
यूपी पुलिस के साल 2001 बैच के सीधी भर्ती में सब इन्स्पेक्टर हुए विक्रम सिंह के दादा और और उनके पिता भी उत्तर प्रदेश पुलिस की सेवा में रहे हैं। इकोनोमिक्स में एम ए करने वाले विक्रम सिंह कॉलेज के दिनों से ही मेधावी छात्र रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके बाबा डिप्टी एसपी किशन सिंह सुल्तानपुर से रिटायर्ड हुए थे और पिताजी सब इन्स्पेक्टर पद से। विक्रम सिंह मूल रूप से बलिया ज़िले के रहने वाले हैं।

सुल्तानपुर में मिली पहली पोस्टिंग
विक्रम सिंह ने बताया कि 2001 में बाबा और पिता जी के नक्शे कदम पर चलते हुए मैंने भी सीधी भर्ती के द्वारा सब इन्स्पेक्टर की पोस्ट पाई। पहली तैनाती सुल्तानपुर में एसओजी प्रभारी के पद पर हुई। विक्रम सिंह ने बताया कि इस दौरान कई सारे दुर्दांत अपराधियों को मुठभेड़ करके पकड़ने में कामयाबी हासिल हुई। इसमे सबसे ज़्यादा चैलेंजिंग टास्क था शातिर डकैत और हत्यारे सुलतान कोरी के साथ मुठभेड़।

ख़त्म किया सुल्तानपुर में सुलतान कोरी का आतंक
उन्होंने बताया कि सुलतान कोरी बहुत ही शातिर हत्यारा और डकैत था। उसे सुल्तानपुर जेल से प्रतापगढ़ पेशी पर ले जाया गया था। वहां से वापसी में सुलतान कोरी ने अपने साथी के साथ मिलकर ट्रेन में ही दो पुलिसकर्मियों की ह्त्या की और राइफल लूटकर फरार हो गया था। उस दौरान एसओजी प्रभारी रहते हुए सुल्‍तान को पकड़ना बहुत ही चैलेंजिंग काम था। डेढ़ महीने बाद ही हमें सूचना मिली की सुलतान कोरी किसी की ह्त्या की फिराक में सुल्तानपुर आया हुआ है। इस सूचना के बाद हुई मुठभेड़ में हमने सुल्तान कोरी को मुठभेड़ के दौरान मार गिराया।

वीर बहादुर का किया खात्मा
विक्रम सिंह के अनुसार इसके बाद एक और अपराधी था वीर बहादुर, जो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जान से मारने की धमकी के साथ साथ रंगदारी मांगने का काम करता था। उसने एसपी सुल्तानपुर को भी हत्या की धमकी दी थी। उसके बाद एक व्यक्ति से रंगदारी मांगने के लिए सुल्तानपुर पहुंचे वीर बहादुर को एनकाउंटर में मार गिराया था।

दिसंबर 2017 से वाराणसी में अपराधियों को भेज रहे जेल
विक्रम सिंह सुल्तानपुर में एसओजी प्रभारी के बाद एसओ लम्भुआ, एसओ हलियापुर और एसओ कूड़ेभार रहे। उसके बाद उनका ट्रांसफर 2007 में फैज़ाबाद हुआ वहां भी एसओजी प्रभारी के पद पर रहते हुए उन्‍होंने कई अपराधियों पर नकेल कसी। इसके बाद एसओ कैंट, एसओ रौनाइ और एसओ पूराकलंदर के पद पर तैनाती मिली। फिर वहां से 2011 में झाँसी ट्रांसफर हुआ। वहां से दिसंबर 2017 में वाराणसी ट्रांसफर हुआ और तब से ही क्राइम ब्रांच का प्रभार मिला हुआ है।

जब वीर बहादुर के भाई ने किया हमला
पुरानी और अघोषित रीति रही है कि ना तो पुलिसवाले और ना ही अपराधी एक दूसरे के परिवार वालों पर हमला करते हैं। मगर विक्रम सिंह के मामले में ऐसा नहीं हुआ। विक्रम सिंह ने बताया कि जब मैं एसओ हालिया हुआ करता था, उस समय वीर बहादुर सिंह नाम के अपराधी का भाई सूरज जो की लखनऊ जेल से भगा हुआ था, उसने मेरे परिवार को निशाना बनाने के लिए मेरे हालिया एसओ रहते हुए थाने पर मेरे परिवार को लक्ष्य कर हमला किया था। उसे बाद में लखनऊ एसटीएफ ने गिरफ्तार कर लिया।

डीजीपी पदक से हुए हैं सम्मानित
पुलिस सेवा में उत्कृष्ट कार्यों के लिए विक्रम सिंह को तीन बार डीजीपी पदक और एक बार सिल्वर एकमंडेशन डिस्क मिल चुकी है। इसके अलावा एडीजी, आईजी, डीआईजी और एसएसपी द्वारा भी विक्रम सिंह कई बार सम्मानित किये जा चुके हैं।

आदिवासी बच्चों की शिक्षा का करते हैं इंतज़ाम
विक्रम सिंह की पर्सनाल्टी एक रियल सिंघम जैसी है। विक्रम सिंह एक सुपरकॉप के साथ-साथ एक समाजसेवी भी हैं। झांसी में पोस्टिंग के दौरान विक्रम सिंह जब एसो मऊरानीपुर थे, उसी समय उस क्षेत्र के आदिवासी बच्चों को देख कर उनके मन में कुछ करने का उत्साह जगा। आसरा नाम की संस्‍था के तहत तेंदू पत्ता और पत्तल बनाने के पत्तों को बीनने वाले आदिवासी बच्चों की शिक्षा का बीड़ा विक्रम सिंह और झाँसी के कुछ व्यवसाइयों ने मिलकर उठाया। आज ‘आसरा’ के ज़रीये 70 आदिवासी बच्‍चों की पढ़ाई और भोजन की व्‍यवस्था विक्रम सिंह और झांसी के वे व्‍यवसायी कर रहे हैं।

सब इसंपेक्टर के पद से रिटायर्ड हुए स्वर्गीय बृजेश कुमार सिंह और बिंदु सिंह की दूसरी संतान विक्रम सिंह से बड़ी एक बहन हैं, जो अधिवक्ता हैं। छोटा भाई विकास दवा का व्यवसाय करता है। विक्रम सिंह के दो बेटे भी हैं जो अभी पढ़ रहे हैं। इन सब की सुरक्षा के साथ साथ विक्रम आज वाराणसी की जनता की सुरक्षा के लिए दिन रात लगे हुए हैं। बीते साल 2018 में वाराणसी में रिकॉर्डतोड़ दुर्दांत अपराधियों की गिरफ्तारी के बाद वाराणसी पुलिस का मनोबल काफी ऊंचा हुआ है।

तस्‍वीरों में देखिए विक्रम सिंह का अलग-अलग व्‍यक्‍तित्‍व

 

विज्ञापन