नारस। साल 1968 में पंडित दीन दयाल उपाध्याय का शव घायल अवस्था में तत्कालीन मुगलसराय रेलवे स्टेशन और आज के पंडित दिन दयाल रेलवे स्टेशन पर मिला था। इस सूचना के बाद पूरे देश में हड़कंप मच गया था, पर काशी का कोई नेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय को देखने मुगलसराय नहीं पहुंचे, लेकिन काशी के जनसंघ कार्यकर्ता नत्थूलाल पाठक ने 3 आने में वाराणसी से मुगलसराय का सफर तय किया और अपने प्रिय का शव देख फफक पड़े थे।

पंडित दिन दयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर हमने काशी के इस कार्यकर्ता से बातचीत की और दीन दयाल जी के साथ की स्मृतियों को उनसे साझा किया। इस दौरान कई बार नत्थूलाल पाठक आतीत की गहराइयों में उतरे तो कई बार गुमसुम आंखे बोल पड़ीं।

उन पांच लोगों में पाठक जी भी शामिल थे
बेहद वृद्ध हो चुके पाठक जी से हमने मुगलसराय स्‍टेशन से जुड़ी यादों के बारे में पूछा, जो की अब यहां दिवंगत हुए पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम से जाना जाता है। पाठक जी ने हमें बताया कि साल 1968 में जब पंडित दीन दयाल उपाध्‍याय जी का शव जब मुग़लसराय स्टेशन पर मिला था पटरी के किनारे, तो उन्‍हें वहां से कंधे पर लादकर लाने वाले पांच आदमियों में से एक नत्थूलाल पाठक भी थे।

पाठक जी ने बताया, ”पंडित दीन दयाल उपाध्याय बहुत ही सरल स्वभाव के थे। अक्सर हम लोगों के साथ आकर कार्यालय नीचीबाग पर बैठते थे। उनके पास एक कपडे का झोला हुआ करता था, जिसमें हर समय एक धोती कुर्ता, एक लोटा, ब्रश-मंजन, कलम-कागज और एक डायरी हुआ करती थी। हम लोगों से अक्‍सर बनारस शहर की चर्चा होती थी और हम सभी उन्हें बहुत प्‍यार करते थे।”

उस दिन, जब मिली वो मनहूस खबर
पाठक जी ने आगे बताया, ”11 फरवरी 1968 का दिन था। धूप खिली थी। हम लोग बुलानाला पर जो देना बैंक है, पहले ये बैंक नहीं था। इसी भवन की छत से पतंग उड़ाने के बाद हम नीचे उतरे ही थे, तभी एक व्यक्ति जो कि मुझे जानता था, उसने आकर मुझे बताया कि आप यहां खड़े हैं और आप के नेता को किसी ने मुगलसराय में मार के फेंक दिया है। उस वक़्त हमारे जेब में पैसा सिर्फ 3 आना ही था।”

पं दीन दयाल को देखते ही फफककर रो पड़े पाठक जी
पाठक जी ने स्‍मृति पर जोर देते हुए बताया, ”जानकारी होते ही हम बिना किसी को बताये पैदल ही राजघाट की तरफ भागे। वहां पहुंचे तो काशी स्टेशन पर मुग़लसराय की ट्रेन खड़ी थी, बिना टिकट लिए ट्रैन में बैठ गए और ट्रेन मुग़लसराय के एक नंबर प्लेटफार्म पर रुकी तो देखा वहां यात्रियों की भीड़ लगी हुई थी। पंडित दीन दयाल जी का शव एक टेबल पर रखा गया था। उनके एक तरफ सिर में, हाथ-पैर में काफी चोट लगी थी। ये देखकर हम फफक कर रोने लगे।”

नत्‍थूलाला पाठक ने आगे बताया, ”मेरे पहुँचने के थोड़ी देर बाद ही दिल्ली जनसंघ के पार्टी अध्यक्ष मदनलाल खुराना और दिल्ली के मेयर केदार नाथ सहानी अपने दो सहयोगियों के साथ वहां पहुँचे। ये लोग जौनपुर में संघ के एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। समस्या यह थी कि पंडित जी का शव कैसे सीढ़ी से चढ़ाकर ऊपर लाया जाए। हमने उनका शव उसी टेबल पर रस्सियों के सहारे बांधा और टेबल सहित उठाकर स्टेशन के बाहर लाये, जहां हाफ डाला गाड़ी में लादकर शव को वाराणसी चीर घर (पोस्‍टमार्टम हाउस) लाया गया।

शव के पास भी नहीं गये दिल्‍लीवाले नेता
पाठक जी ने बताया कि तब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पोस्‍टमार्टम हाउस नहीं था। उस समय शिवपुर में पोस्टमार्टम होता था। उन्‍होंने कहा, ”मदन लाल जी और उनके साथ आये केदार नाथ सहानी के साथ आये दो अन्य व्यक्ति और जौनपुर में चल रहे संघ के सम्मलेन से पहुंचे 5 पदाधिकारियों ने शव के करीब भी जाना उचित नहीं समझा। मैंने ही खड़े होकर पोस्टमार्टम करवाया। उसके बाद मदन लाल खुराना और कैलाश नाथ पंडित जी का शव दिल्‍ली ले जाने लगे तो बोले, पाठक तुम भी चलो। दिल्ली जाने की बता थी तो हमने कहा की हम अपने घर नहीं बताये हैं, हम घर से बताकर आते हैं। इसपर खुराना जी ने कहा कि अच्छा-अच्‍छा रहने दो, मत जाओ।”

बनारस का कोई नेता नहीं पहुंचा
पाठक जी ने एक बड़ा खुलासा करते हुए यह भी कहा कि ”उस समय पंडित जी के देहावसान के समय कोई भी व्यक्ति उनके शव के करीब नहीं पहुंच सका था। यहां तक की बनारस से मुझे छोड़कर कोई भी नेता या कार्यकर्ता उनके पास तक नहीं पहुंचा था। आज उनके नाम पर इतनी बड़ी राजनीती हो रही है।”

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