‘मोदी के नेतृत्व में भारत ने वह अंगड़ाई ली है, जिसकी प्रतीक्षा शिवाजी महाराज के समय से भारत को रही है’

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प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय, सेन्टेनियल चेयर प्रोफेसर
भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
(लेखक पूर्व में आज तक से जुड़े रहे हैं)


भारत पर पुलवामा आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वक्तव्य ने स्पष्ट कर दिया था कि बड़ी और निर्णायक कार्यवाही में अब और देर नहीं। पुलवामा हमले के ठीक 12 दिन बाद 12लड़ाकू विमानों के जरिए 1200 टन बारुदी बरसात ने पाकिस्तान की आर्मी और उनके हुक्मरानों के दिल की धड़कने बढ़ा दी हैं कि अब वह किस रास्ते से पलटवार करें।

आतंकवाद के जरिए भारत के विरुद्ध अरसे से छद्म युद्ध लड़ रहा पाकिस्तान का गीदड़-सियार स्वरूप फिर से करवट बदलता दिखने लगा है जिसमें प्रधानमंत्री इमरान खान एक ओर तो युद्ध की धमकी देते दिख रहे थे कि अचानक बड़ी कार्यवाही का खतरा सर पर मंडराते देखकर भारत से विनती करने लगे कि शांति का एक मौका और दें। शांति और अमन के मतलब को ही जिस देश और जिस पाकिस्तानी प्रवृत्ति ने आजादी के बाद से आजतक कोई अहमियत नहीं दी, उसी पाकिस्तान में आज रुदन, चीख-पुकार मची है, आतंक का बुखार समूचे इस्लामिस्तान को इस हद तक बेहोशी के गोते लगवाएगा, किसी को उम्मीद न थी।

सर्जिकल स्‍ट्राइक 2 के दौरान पाक अधिकृत कश्‍मीर में कहर बरपाता एक भारतीय बम वर्षक विमान मिराज 2000

 

पाकिस्तान में रुदन-पिटन-घुटन मची है लेकिन इधर भारत में पाकिस्तान समर्थक बनकर जो भारतीय कूटनीति और राजनीति पर ही कुंडली मारकर दशकों तक बैठे रहे, ऐसे पत्रकार, बुद्धिजीवी, अकादमिक चेहरे, सियासतदां और उनकी कृपा पर जीने-खाने वाले भी बौराहट-तिलमिलाहट का शिकार हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 56इंची स्वरूप उन्हें पच नहीं रहा और दिलो-दिमाग इस तरह सुन्न हो गया लगता कि है कि कैसे इस सैनिक कार्यवाही की तारीफ करें? करें भी या ना करें? लेकिन देश का जो मिजाज बन चुका है, उसके सामने बेपर्दा हो चुके ऐसे लिखावटी और दिखावटी तत्वों की कोई चाल अब सफल होती नहीं दिख रही है इसलिए आर्मी की जय का नारा लग रहा है, पुराने विजय-तराने निकालकर गाए-बजाए जा रहे हैं गोया पाकिस्तान के खिलाफ ये नही एयर स्ट्राइक और इसके पहले सर्जिकल स्ट्राइक कोई बड़ी बात नहीं।

तो ऐसे लोगों को आईना दिखाना जरूरी हो जाता है कि राजनीति की लगाम जब देशभक्तों के हाथ में रहती है तभी देश के जवान इतने बुलन्द हौंसलों के साथ आतंक के ठिकानों पर टूट पड़ते हैं।

आर्मी तो सदा से ही भारत के गले में जय-माल डालती रही है लेकिन यह कुटिल राजनीति ही है जो मंथरा बनकर हमारे संपूर्ण बौद्धिक चैतन्य को बार-बार कुम्हलाती रही है जिसके कारण देश इस्लामी आतंकवाद के सामने लगातार लाचारगी के हालात में खड़ा दिखाई पड़ने लगा था। लेकिन आज भारत की राजनीति की लगाम वीरविचारधारी, निर्णय-कुशल नेता और रणनीति में योद्धा महानायक ऐसे राजपुरुष के हाथ में चुकी है जिसके एक हाथ में विनय है तो दूसरे हाथ में युद्ध-नय। परिणाम ये है कि हमारी आर्मी इतनी बली हो गई है कि उसके सामने अब पीछे मुड़कर देखने की जरुरत नहीं जबकि सेना के बुलंद हौंसले सदा ही देश को विजयी बनाते रहे और सियासत की कुटिल चाल हमेशा देश को पीछे ढकेलती रही।

चूंकि आर्मी 1947 में भी थी और 1948 में भी, लेकिन 370 सियासत की तिकड़म में संविधान में घुसेड़ दी गई और पाक की पछाड़ खाकर भागती कबायली आर्मी को खत्म करने और उसे वापस इस्लामाबाद तक खदेड़ तक आने के पहले ही हिन्द की आक्रामक आर्मी को रुक जाने के आदेश दिए गए, देश के रणबांकुरों को पीछे धकेलकर यूनओ को कश्मीर में आगे कर दिया गया।

1947 में पाकिस्‍तानी कबायली आतंकियों के खिलाफ मोर्चा लेते भारतीय सैनिक (फोटो सौ. इंडियन आर्मी डॉट एनआईसी डॉट इन)

1954 में भी आर्मी थी लेकिन आर्मी को बिना खबर दिए सेक्युलर ब्रिगेड ने 35ए नामक अवैध जारज सन्तान कश्मीर में पैदा कर दी।

1962 में भी आर्मी थी लेकिन पंचशील का अहिंसात्मक कवच पहनाकर उसे 62 के रण में ड्रैगन ड्रैकुला के सामने उतार दिया गया।

1965 में भी आर्मी थी किन्तु 1965 की विजय को ताशकन्द की मेज पर किसके इशारे पर पराजय में इस तरह कैसे बदल दिया गया कि वतन का लाल भी सदा के लिए ताशकन्द में ही सो गया। एओसी पारकर लाहौर तक चढ़कर खड़ी भारतीय सेना को किसके कहने पर वापस एलओसी लाकर खड़ा कर दिया गया।

तत्‍कालीन यूएसएसआर के ताशकंद में बातचीत की मेेज पर बैठे भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्‍त्री और पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति जनरल अयूब खान (फोटो सौजन्‍य www.advantour.com)

1971 में भी आर्मी ने संसार का सबसे बड़ा रणकौशल कर दिखाया। पाकिस्तान आर्मी के 1 लाख हिजड़े सैनिक तब हथियार छोड़कर जान की भीख मांग रहे थे। ज्ञात इतिहास में इतना बड़ा सरेंडर कभी किसी हथियारबंद आर्मी ने नहीं किया जो भारतीय सेना के जांबांजों के सम्मुख नापाक आर्मी ने किया। किन्तु कूटनीति की मेज पर भी हम जीतकर भी बाजी हार गए, बांगलादेश बनवा दिया लेकिन पाकिस्तान की सेना से गुलाम कश्मीर खाली नहीं करवा पाए। क्यों ऐसा हुआ?

1975 आपातकाल के बाद ऐसा क्या हुआ कि पंजाब धधक उठा। आईएसआई की साजिशें इस्लामाबाद की बजाए श्रीनगर और दिल्ली में रची-बुनी जाने लगीं। 1984 में सियासत की शेरनी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का बलिदान आखिर क्यों होने दिया गया? 71 की हार का बदला भारत से आतंकवाद के जरिए पाकिस्तान चुकाने लगा। दलालों और गद्दारों की बाढ़ राजनीति से रणनीति तक इसी भूमि पर खड़ी होती गई, किसने प्रश्रय दिया। आर्मी तो थी।

1991 आर्मी तो थी लेकिन अपनी मातृभूमि से ही, कश्मीर घाटी से ही देशभक्त समाज को लाखों की तादाद में घर-बार, परिवार, बिजनेस, धन-दौलत सब छोड़कर जम्मू-दिल्ली के शरणार्थी कैंपों में शरणार्थी बनकर आना पड़ा क्योंकि सियासत ने चूड़ियां पहन ली थीं। हिन्दुओं के आंसुओं की कोई कीमत उनके लिए नहीं थी।

दिल्‍ली में ‘घर वापसी’ की मांग करते कश्‍मीरी पंडित (फाइल फोटो)

1998 में भी आर्मी थी, करगिल में विजय का इतिहास फिर से दोहरा उठा।
2004 से 2014 तक अनगिनत घाव भारत के सीने पर इसी पाकिस्तानी आतंकवाद ने दिए। आर्मी, एयर फोर्स, नेवी और अर्धसैनिक बल सब के सब कीमत चुकाते रहे इसी आतंकवाद की। कितनी ही आवाजें उठीं कि पराक्रम करो, सीमोल्लंघन करो, घुसकर मारो लेकिन सारा शोर सड़क से संसद तक उठता था और कागजों के जरिए जवाब बनकर फाइलों में गुम हो जाता था।

1998 में टाइगर हिल विजय के बाद भारतीय सेना के जवान

वही देश है, वही आर्मी, वही भुजाएं और वही युद्धक विमान। घुसकर मार गिराने का जज़्बा भी वही पुराना है लेकिन दिल्ली ने पहली बार आजादी दी है, सैनिकों के हाथों में देश और संविधान की शपथ के साथ नियमों में बांधकर रखने वाली हथकड़ियां बंधे होने की कसमसाहट आज छूमंतर हुई है। दुश्मन थर्रा रहा है और घाटी में दुश्मनों के समर्थक थर्रा रहे हैं।

2019 की ये आर्मी है जहां आर्मी अध्यक्ष यह खुलेआम बोलने का साहस रखता है कि घाटी की माताएं और बहनें अपने बेटों, भाइयों और शौहरों को आतंक के मिशन से वापस बुलाकर लोरी थपथपाकर सुला दें नहीं तो आर्मी के जवानों के हाथों की राइफलें अब खामोश नहीं रहेंगी, मांओं की लोरी से अगर आतंकवादी वापस आने को तैयार नहीं तो राइफलों की गोली से हम मौत की नींद सुलाकर उन्हें वहां दफा करने को तैयार हैं जहां जाने कितने गाजी गजवा-ए-हिन्द की यलगार लिए आए और सदा के लिए चले गए।

भारतीय सेना (फोटो सौजन्‍य. www.indianarmy.nic.in )

याद रखिए, धरती हर 40-50 वर्ष पर लहुलूहान होती है, होकर ही रहती है। दुनिया का हजारों वर्ष का इतिहास यही है। आप हम चाहें या ना चाहें, युद्ध के मौसम धरती पर आते ही हैं और ऐसे मंडराते हैं कि अगर आपकी तैयारी नहीं है तो आपको सदा के लिए इतिहास के प्रवाह में बहाकर युद्ध के मौसम किसी समूह को विजयी नायक बनाकर धरती का साम्राज्य पलट जाते हैं। अगर आपकी तैयारी है तो यही धरती फिर से हिन्दुभूमि को संसार का नेतृत्व प्रदान कर देगी और अगर युद्ध की तैयारी नहीं है तो यही धरती आपको सदा के लिए इतिहास का खामोश हिस्सा बना देगी।

2017 में सैनिकों के बीच दीपावली मनाने कश्‍मीर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी (फाइल फोटो, सौ. प्रेस इन्‍फॉर्मेशन ब्‍यूरो)

मोदी के नेतृत्व में भारत ने वह अंगड़ाई ली है, जिसकी प्रतीक्षा शिवाजी महाराज के समय से भारत को रही है। हे वीर हिन्द को तुम पर नाज है। तुम्हारे जैसे नेतृत्व पर नाज है जिसने आर्मी के दिल की आवाज सुनकर उसे वह करने का मौका दिया जिसे करगुजरने के लिए कुरुक्षेत्र के रण से लेकर सियाचिन और करगिल के रण तक हिन्द की आर्मी संसार भर में चर्चित है।


नोट : उपरोक्‍त लेख, लेखक के निजी विचार हैं। Live VNS का इनसे सहमत होना आवश्‍यक नहीं है।