प्रो. राकेश कुमार उपाध्याय, सेन्टेनियल चेयर प्रोफेसर
भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
(लेखक पूर्व में आज तक से जुड़े रहे हैं)


भूमि पर रखा पांव परंपरा है, आगे बढ़ने के लिए उठा हुआ पांव आधुनिकता है। धर्म और परंपरा का यह अखंड हिन्दू जीवन प्रवाह भारत भूमि पर युगों से बहता चला आ रहा है। नाम और रूप बदले होंगे लेकिन सबमें भाव वही कि ईशावास्य मिदम् सर्वम्।। इसलिए आज संभल संभलकर एक एक कदम आगे बढ़ने और बढ़ाने की आवश्यकता है। मातृभूमि और जीवन-जगत के प्रति भारत का सनातन दृष्टिकोण हर तरह के बंधन से आपको मुक्त करता है। असल आजादी की अवश्यंभावी गारंटी, मुक्ति का वास्तविक महापथ।

सूर्य की अनंत रश्मियां जानती हैं कि उस परम चैतन्य और महाकाल का ही स्वरूप सृष्टि रचना की लीला करने के लिए ही बंधनयुक्त होकर देह के असंख्य रूपों में विचरता है। इसीलिए वह प्रकाश और ऊर्जामय सूर्य रश्मियां बिना थके, बिना रुके आसमान के लाखों किलोमीटर दूर के हिस्से से उसी एक परम चैतन्य की उपासना के लिए नित्य अविरत इस धरा-धाम पर आकर उस चैतन्य की सेवा करती हैं।

ऊर्जा का अनंत अखंड स्रोत वह सूर्य नित्य ही उसी एक अद्वैत रूप की उपासना के लिए समस्त भूमंडल को प्रकाशित करने का दायित्व लिए अग्नि रूप में निरंतर चतुर्दिक नृत्य करता ही जैसे घूम रहा है। अग्नि है तो जीवन का रूप है।

भारत के महान अद्वैत दर्शन ने हमें तो यही बताया है। इस प्रकृति पदार्थ मय जगत की हर हलचल इसे प्रमाणित करती है। वायु की लहरें उसी एक की परिक्रमा करने के लिए निरंतर मचलती इठलाती आसमान में ऊपर तक उठती दबाव बनाती देह के पोर-पोर को स्पर्शजन्य सुख प्रदान करते हुए ह्रदय के भीतर तक दौड़ती चली जाती हैं क्योंकि वायु के निर्गुण ऊर्जामय रूप को भी मालूम है कि उसे सृजित करने वाला वह महान स्वामी इसी देह के भीतर अन्तरयामी बनकर निवास कर रहा है।

इसीलिए देह के सो जाने पर भी यह वायु निरंतर सांसों के जरिए भीतर की प्रत्येक कोशिका तक निरंतर ड्यूटी पर निरत रहती है। मन-बुद्धि और शरीर के सारे अवयवों को उसी परम चैतन्य की गोद में लोरी सुना सुनाकर यह सांस इस देह को परम चैतन्य की तरह ही फिर से चैतन्य करती है। जो रूप तुम्हारे भीतर है, उसी को पहचानो, जिसकी सेवा में मैं 24 घंटे जीवन भर इस घर में घूम रही, उसी एक को जानो, वायु का यह संदेश निरंतर पोर पोर तक गीत बनकर समाता है। वायु है तो जीवन में स्पर्श है।

पृथ्वी को भी पता है कि वह चैतन्य नानाविध शरीर के रूप में उसी के गर्भ से नित्य जन्म लेता है। मिट्टी के रजकण विश्व रंगमंच पर उसी एक नटराज के नाट्य के प्राकट्य के लिए पंचतत्वों के साथ लीला रचाते हैं, शरीर रूप में बदलते चले जाते हैं, वनस्पति और अन्न रूपों में वही ज्योति आकार ग्रहण करती है, मिट्टी की गंधमयी ममता में खिलखिलाने वह परम चैतन्य विविध रूप में आते हैं।

स्वयं की इच्छा पर्यन्त ममतामय मिट्टी से सने शरीर रूप का वस्त्र पहनते हैं, माया की माया देखकर मुस्काते हैं। उसे माता होने का का सुख दे जाते हैं। शरीर के ऐन्द्रिक इंद्रिय केंद्रित रूप के कारण वह परम चैतन्य ही इंद्रिय जनित सुख-दुख के हिचकोलों में गोता भी लगाते हैं और कर्तव्य और कर्तृत्व रूप में जीवनभर जीकर जब वह देह छोड़कर निकल जाते है तो मिट्टी की मूरत जस की तस फिर से मिट्टी में मिल जाती है।

वायु का हिस्सा वायु में, अग्नि का हिस्सा अग्नि में, आकाश का हिस्सा आकाश में और जल का हिस्सा जल में वैसे ही विलीन हो जाता है जैसे शरीर की निर्मिति के समय में सब एक साथ चला आता है। जिस देह की साज-संवार में करोड़ों न्यौछावर करते हैं, सबसे तनकर हम जीवन भर चलते हैं, वह तन ही क्षणमात्र में तन्मात्र होकर मिट्टी का ही न्यौछावर बन जाता है। मिट्टी है तो जीवन में गंध है।

वेद ने बताया है कि पृथ्वी युग सृजन के पूर्व कल्पांतकाल में जल में डूब जाती है, और सृजन के समय चतुर्दिक विस्तीर्ण अगाध समंदर रूप जल से ही निकलकर प्रकट हो जाती है क्योंकि वह परम चैतन्यरूप शिव ही सभी पंच तत्वों को क्रीड़ा का समान अवसर और स्थान उपलब्ध कराते हैं, सबको सृजन पथ पर चलने के लिए नियम-निर्देशित करते हैं। वेदों ने इसे ही ऋत कहा है।

ऋत से ही ऋतु है, ऋतुएं हैं, ऋत से ही नियम हैं, यह संपूर्ण ब्रह्मांड ऋत पर टिका है। ऋतेन सत्यं। ऋत क्या है तो ऋत सत्य है। इसी ऋत की रीति चली आई है युगों से भारत में कि रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जायं पर वचन न जाई। क्योंकि वचन जो सत्य है, वह सत्य ऋत है और इस ऋत ने ही प्राण के रूप में समस्त ब्रह्मांड को धारण कर रखा है। ऋत का प्रण या संकल्प है यह ब्रह्मांड और विश्व व्यवस्था।

यह ऋत अपने कर्तव्य पथ पर निर्मम और अप्रतिहत गति से चलता है, एक सेकेंड भी अपनी ड्यूटी से यह ऋत हटता नहीं है क्योंकि उसे मालूम है उसके परम शिव को सत्य से द्रोह यानी कर्तव्य में आलस पसंद नहीं है, जो प्रण रूप है और जो वचन है उसे निभाना ही ऋत है। नहीं निभाया तो ऋत ऋत नहीं रहेगा, प्रण समाप्त होते ही प्राण चले जाते हैं, यही परंपरा हमने देखी है इस देश में सदियों से। यह ऋत ही कर्तव्य रूप है, यह कर्तव्य ही धर्म है अतएव ऋत ही धर्म है।

यह धर्म ही है जो समूचे ब्रह्मांड को धारण करता है। धारयते इति स धर्मः। जो धारण करता है वही धर्म् है, धर्म यानी जो जोड़ता है। मानव को मानव से, मानव को समस्त देहधारियों से और समस्त संसार, भूमि और ब्रह्मांड से जो जोड़ता है वह धर्म है। और जो तोड़ता है, जो शिव की लीला के विरूद्ध जाकर कार्य करता है, उसे ही इस देश ने अधर्म कहा है। आजकल के धर्म इस परिभाषा में कहां टिकते हैं, कौन बताए, कौन सुनाए।

जल तभी से इस ऋत के कारण भूमि पर रस रूप का प्रणेता बनकर जीवन-जगत को सरसाता, हरसाता और सबकी प्यास बुझाता है। रक्त, अस्थि, मांस-मज्जा-त्वचा यानी शरीर से लेकर भूमि पर्यंत यह जल ही ब्रह्णांड के कण-कण में उन परम शिव का साक्षी है। यह उनका आचमन, नीराजन है। यही उनका परम अभिषेक है।

पृथ्वी के सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत भूभाग में जल है तो शरीर के भी सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत भूभाग में जल की हलचल विद्यमान है। और जैसे पंचतत्व स्वयं में जीवित ईकाई के रूप में कार्य करते हैं, उसी तरह से यह जल भी अपनी प्रत्येक बूंद में जीवनी शक्ति यानी ऑक्सीजन लेकर चलता है। रक्त की प्रत्येक बूंद की कोशिका में ऑक्सीजन और पानी की प्रत्येक बूंद में ऑक्सीजन। अद्भुत चैतन्यमयी चिन्मयी यह भूमि है हमारी। जो कहते हैं कि केवल मनुष्यों या देहधारियों में जीवन है तो उन्हें अपनी जानकारी दुरुस्त करनी चाहिए कि प्रत्येक कोशिका, प्रत्येक कण और प्रत्येक बूंद तक जीवन का अनंत खेल चल रहा है। हर अणु-परमाणु में महानृत्य चल रहा है, सेकेंड के लाखवें हिस्से में अणु रूप लेते, बनते, बिगड़ते और बदलते दिख रहे हैं, वही सृजन-पालन और विलय का महारास।

जिसे वैष्णवों ने महारास और महालीला के रूप में देखा, उसे शैवों ने नटराज का नर्तन और शिव की क्रीड़ा के रूप में परिभाषित किया। वह जल आज भी इसीलिए अपने आराध्य शिव से मिलने के लिए बेचैन रहता है, शिव भी उसे पाकर परम आह्लादित और प्रसन्न। जल ही तो जीवन है, जल से ही जीवन में रस है, रस है तो आनंद है, इसीलिए वेदों ने कहा कि शिव का वह ब्रह्मतत्व क्या है तो वह रस और आनंद रूप है। रसो वै सः।।

दूर दूर तक फैला आकाश शिखर चूमते पर्वतों, इठलाती-बलखाती बहती नदियों और दूर दूर तक भरे वनों-उपवनों, फलों और एक से बढ़कर एक रंग-बिरंगे फूलों से खिली खिली भूमि को देखकर हर्षित होता है क्योंकि इसी पिता रूप आकाश और माता रूप पृथ्वी के भुवन आंगन में वह त्रिभुवनपति भुवनेश्वर त्र्यंबकेश्वर विराजते हैं। नित्य निरंतर ध्यानमग्न होकर योगी बन शिव रूप में जब वह खुद को निहारते हैं। यह आकाश उनकी विराट लीला को देखकर लज्जित हो उन्हीं के समक्ष नतमस्तक होकर ध्यान रूपी मनोमष्तिष्क में जगह मांगने लगता है। नित्य आवाज देने लगता है कि हे मन रूप, हे कर्ण रूप, हे मेरे नेत्र रूपों सुनो, नित्य उन्हीं एक का ध्यान करो जिनके कारण मुझे भी चैतन्यमयी चिन्मयी भूमि का साथ मिला है जहां ब्रह्म-विष्णु-रुद्र रूप यानी सृजन-पालन-विलय रूप में उन्हीं एक अद्वैत शिव का महानृत्य हर क्षण नित्य-निरंतर चल रहा है।

इस आकाश को भी क्षणमात्र अवकाश नहीं है कहीं और जाने के लिए क्योंकि उसके कारण रूप कर्ता देहधारी जो बनकर धरती पर लीला कर रहे हैं। इसीलिए सारे ग्रह-नक्षत्र और संपूर्ण ब्रह्मांड अपनी अपनी जगह उसी एक लीला देखकर आनंदमगन रहते हुए नृत्य रूप में घूमते हुए भी एक ही धुरी पर अविचल स्थिर चलता रहता है। यह आकाश है तो शब्द है।

इसी शब्द से ही सब कुछ प्रकट हुआ। शब्द के पहले तो अनंत शून्य था और कुछ नहीं। वह शब्द ही ब्रह्म कहा गया है। शब्द ही अनादि है, अनंत है। यह ओंकार रूप है। ध्यान अवस्था से जब शिव उठते हैं तो अपनी भवानी शक्ति के साथ एकाकार होकर वह ओंकार रूप यानी शब्द का आकार ग्रहण करते हैं।

इसी ओंकार शब्द के अनहद नाद से निरंतर नाद से महाचैतन्य चिन्मयी माता रूपी शक्ति से जीवन के सृजन का अंकुर फूटता है। तब विश्व सृजन की शिव की इच्छा के कारण ही ओंकार विश्व का अलंकार बनने की ओर चलता है। ध्वनि के अखंड निनाद से आकाश मूर्तिमंत प्रकट हो जाता है। तब से यह आकाश लगातार उस परम प्रभु की लीला का आनंद उठाने के लिए निर्गुण निराकार रूप में जगत को देख रहा है।

शब्द और आकाश ब्रह्म ही हैं, बिल्कुल निर्गुण और निराकार। लेकिन निर्गुण से ही बात बन गई होती तो शिव निर्गुण ब्रह्म बनकर ही रह गए होते। यात्रा सृजन की होनी होती है तो शिव निर्गुण से आगे सगुण रूप में आते हैं। ध्वनि और आकाश के मध्य पारस्परिक संवाद और पारस्परिक दबाव से तब वायु जन्म लेती है, पवन देव उनकी लीला को आगे बढ़ाने के लिए सहायक बनते हैं। नाद यानी ध्वनि से ही आकाश और आकाश में ओंकार नाद की गूंज से वायु का सृजन होता है। यह वायु तब तेजपुंज अग्नि को जन्म देती है।

जो जिससे जन्म लेता है, उसे पाकर बढ़ता है और उसी से मिटता भी है। आज भी अग्नि वायु की लपटें पाती है तो विकराल हो उठती है और जब उसी वायु का दूसरा रूप उसे शांत करने चलता है तो वह बुझ भी जाती है। यह अग्नि वायु के साथ मिलकर जल को जन्म देती है। क्रोध आए तो मूल स्थान से दूर चले जाइए हवा की तरह कुछ समय के लिए और स्वयं का ध्यान करिए। क्रोधाग्नि शांत हो जाएगी। जल अग्नि को मिटा देता है क्योंकि वह अग्निपुत्र है।

पिता पुत्र से पराजित होकर भी सुख मानता हैं तभी से यह जगत की रीति है और माता, वह तो हर स्थिति में सुख ही मानती है, कैसे भी हो, उसका लाल सदा जगत में आगे बढ़ता रहे, फलता-फूलता रहे। इसी जल, अग्नि, वायु और सबसे ऊपर आकाश की गोद में जल से अंत में पृथ्वी का जन्म होता है। पृथ्वी इन सभी को धारण करती है। शिव की लीला को विदेह से देहरूप में, निर्गुण से सगुण रूप में प्रकट करने का अब समय आ गया है।

शिव स्वयं तो ब्रह्म रूप में आनंदमगन ही रहते हैं, वह देह में आने के लिए दूसरा रूप धारण करते हैं। जीवात्मा के रूप में तो संपूर्ण देहधारियों में व्याप्त होते हैं लेकिन कभी कभी वह अपने मौलिक रूप में, उसी परम प्रकाश रूप में भी लीला का कार्य करने के लिए विष्णु रूप धारण कर पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।

हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होईं मैं जाना। यह देश जानता है कि प्रेम क्या है, भाव क्या है, भव क्या है, भवानी क्या हैं, इस भवसागर से हमारा नाता क्या है? हमने यह वेदकाल से ही जान लिया है कि शिव और ब्रह्म तो सदा ही निर्गुण रूप हैं, वह स्वयं अवतरित नहीं होते। देहधारियों में शिवत्व को वह विष्णु रूप में धारण कर भरते और परिपूरित करते हैं। इसीलिए इस देश में जब भी अवतार ग्रहण की लीला होती है तो शिव या ब्रह्मा को नहीं बल्कि विष्णु को ही उसका प्रतीक माना और बनाया गया है।

सत्य के विविध रूप हैं, आप माने या ना माने किन्तु सनातन भारत ने तो इसे जान लिया है। अनादिकाल से प्रकृति और पुरुष का, स्त्री और पुरूष का जो रूप है, उसमें उसी शिवत्व का रूप देखकर यह देश भाव-विभोर होता आया है, होता रहेगा। यही कारण है कि कान जब शब्द रूप को सुनते हैं और विशेष रूप से शब्द में जब उस शिव की क्रीड़ा को विष्णु की लीला के रूप में यह कान सुनते हैं तो फिर सुनते ही रहते हैं। शब्द से कर्ण यानी कानों का रिश्ता। शब्द से आकाश, आकाश में शब्द और शब्द के लिए कर्ण।

वायु है तो स्पर्श है और उसका ज्ञान देने के लिए त्वचा अपने कार्य पर डट जाती है। संसार में त्वचा से ज्यादा प्रभावी सेंसर क्या कोई हो सकता है। शब्द, आकाश से पैदा हुई वायु और वायु से स्पर्श और स्पर्श को जानने के लिए त्वचा यानी शरीर।

अग्नि को देखती हैं आंखें। प्रकाश से ही आंखों का रिश्ता है तो उस अग्नि के प्रकाश रूप उसी एक का विवर्तन देखने-बुनने की आदत आंखों को जब लग जाती है तो ज्ञान का महा-आकाश मष्तिष्क में प्रकट हो जाता है। वही अग्नि तेजरूप में समस्त अंग-प्रत्यंग को शक्ति और ऊर्जा भी प्रदान करती है ताकि एक दिन यह देह उस परम चैतन्य के आनन्द को सचमुच प्राप्त कर सके। अग्नि से नेत्रों से रूप और ऊर्जा का रिश्ता। शब्द, आकाश और वायु से अग्नि,अग्नि से रूप और रूप को जानने के लिए नेत्र।

जल से रस का रिश्ता बताने के लिए जिह्वा रूप लेती है। वायु से अग्नि और दोनों के मेल से जल की उत्पत्ति। जल से जीवन रस और उस रस को जानने के लिए जिह्वा।

उसी जल से प्रकट हुई पृथ्वी जिसकी मदमाती गंधशक्ति की संजीवनी घ्राण यानी नासिका के जरिए उस परम चैतन्य को परम प्रसन्न करती है। पृथ्वी की गंधशक्ति के लिए नासिका।

आंख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा। यही हैं पांच ज्ञानेंद्रियां। संपूर्ण ब्रह्मांड का रिश्ता कैसे एक दूसरे से गहरे जुडता है, यही तो बताना है। जगत रूपी महारात्रि को समझने के लिए शिव को ही जानना पड़ता है। इन ज्ञानेंद्रियों के द्वारा मन और बुद्धि का प्रयोग करके उस परम शिव को इसी देह में रहकर जाना जा सकता है। यही जानने के लिए महाशिवरात्रि है। सभी को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं।

(क्रमशः…बताऊंगा शिव और शक्ति और महाशिवरात्रि, नवरात्रि का वास्तविक स्वरूप।)