महाशिवरात्रि का पर्व शिव-शिवा के एक होने का उत्‍सव है। इसी दिन देवाधिदेव शिव और हिमालय राज तथा मैना की पुत्री शिवा (पार्वती) विवाह बंधन में बंधे थे। पुराणों में शिव विवाह के कई प्रसंग मिलते हैं। इनमें भी शिव महापुराण के रुद्र संहिता के पार्वती खंड में व्‍यास मुनि ने शिव विवाह की सभी महत्‍वपूर्ण घटनाओं का जीवंत चित्रण किया है।

इस खंड में कैलाश पर्वत से हिमाचलपुरी तक निकली भगवान शिव की विहंगम बारात का वर्णन बड़ा ही अलौकिक है। आइए जानते हैं कैसे दूल्‍हा बनकर कैलाश से कैसे निकले थे महादेव शिव, कैसी थी जगत का मंगल और अमंगल का नाश करने वाली महादेव की महाबारात।

जब निकले शिव के गण डोलने लगी धरती
फाल्‍गुन मास के कृष्‍णपक्ष की त्रयोदशी तिथि को महादेव शिव कैलाश धाम से हिमाचलपुरी के लिए बारात लेकर निकले। इससे पूर्व शिव ने अपने कुछ गणों को कैलाश की व्‍यवस्‍था संभालने के लिए वहीं रुकने का आदेश दिया और बाकियों को अपने साथ चलने का आदेश दिया था।

बारात में शामिल थे शिव के ये गण
शिवादेश मिलते ही गणेश्‍वर शंगकर्ण, केकराक्ष, विकृत, विशाख, पारिजात, विकृतानन, दुंदुभ, कपाल, संदारक, कन्‍दुक, कुण्‍डक, विष्‍ठम्‍भ, पिप्‍पल, सनादक, आवेशन, कुण्‍ड, पर्वतक, चंद्रतापन, काल, कालक, कहाकाल, अग्‍निक, अग्रिमुख, आदित्‍यमूर्द्धा, घनावह, संनाह, कुमुद, अमोघ, कोकिल, सुमंत्र, काकपादोदर, संतानक, मधुपिंग, कोकिल, पूर्णभद्र, नील, चतुर्ववन, करण, अहिरोमक, यज्‍ज्‍वाक्ष, शतमन्‍यु, मेघमन्‍यु, काष्‍ठगूढ़, विरूपाक्ष, सुकेश, वृषभ, सनातन, तालकेतु, षण्‍मुख, चैत्र, स्‍वयम्‍प्रभु, लकुलीश, लोकान्‍तक, दीप्‍तात्‍मा, दत्‍यान्‍तक, भृंगिरिटि, देवदेवप्रिय, अशनि, भनुक, अमथ तथा वीरभद्र अपने असंख्‍य भूतों-गणों को संग लेकर निकले।

इसके अलावा नंदी आदि गणराज असंख्‍य गणों से घिरे चले तथा क्षेत्रपाल और भैरव भी कोटि-कोटि गणों को लेकर उत्‍सव मनाते हुए प्रेम उत्‍साह के साथ हिमाचलपुरी की तरफ बढ़ें।

बारातियों ने किया था अजब-गजब श्रृंगार
शिव महापुराण के रुद्र संहिता के पार्वती खंड में वर्णित शिव के बारातियों के श्रृंगार के बारे में विस्‍तार से लिखा गया है। शिव महापुराण के अनुसार बारात में शामिल हुए सभी बाराती सहस्‍त्र (हजार) हाथों वाले थे। सिर पर जटा का मुकुट, मस्‍तक पर चंद्रमा, गले में नील चिह्न धारण किये सभी त्रिनेत्रधारी थे। सभी ने रुद्राक्ष का आभूषण पहन रखा था। सभी उत्‍तम भस्‍म धारण किये हुए थे और हार, कुण्‍डल, केयूर तथा मुकुट आदि से सुशोभित थे।

और ऐसी थी रुद्र की अनुपम सेना
बारात में रुद्र शिव की सेना भी शामिल हुई थी। शिव महापुराण के अनुसार भगवान् महेश्‍वर स्‍वयं तो अद्भुत थे ही उनके अनुचर भी बड़े निराले थे। भूत-प्रेतों से बनी रुद्र की सेना में विचित्र-विचित्र प्रकार के जीव-जंतु शामिल थे। इनमें कितने ही बवंडर का रूप धारण करके आये थे। किसी के मुंह टेढ़े थे तो कोई अत्‍यंत कुरूप दिखायी देते थे। कुछ बड़े विकराल थे। किन्‍हीं का मुंह दाढ़ी-मूछ से ढंका हुआ था। कई लंगड़े थे। कितने ही अपने वाहनों को उल्‍टा चला रहे थे।

मां चण्‍डी बनीं शिव की बहन
शिव बारात में चण्‍डीदेवी रुद्रदेव की बहिन बनकर उत्‍सव मनाती हुई बड़ी प्रसन्‍नता के साथ वहां आ पहुंची। मां चण्‍डी ने खुद को सर्पों के आभूषण से सजाया हुआ था और वह अपने वाहन प्रेत पर सवार थीं। मां चण्‍डी ने अपने सिर पर सोने का भरा हुआ कलश धारण किया था शिव महापुराण के अनुसार वह कलश महान प्रभापुंज से प्रकाशित हो रहा था।

डमरुओं के डिम-डिम भेरियों की गड़गड़ाहट
शिव महापुराण के अनुसार करोड़ों दिव्‍य विकराल रूपी भूतगण बारात की शोभा बढ़ा रहे थे। उस समय डमरुओं के डिम-डिम घोष से, भेरियों की गड़गड़ाहट से और शंखों के गंभीर नाद से तीनों लोक गूंज उठे थे। दुन्‍दुभियों की ध्‍वनि से महान कोलाहल हो रहा था। जगत का मंगल और अमंगल का नाश करते हुए बारात हिमाचलपुरी की ओर बढ़ रही थी।

ब्रह्मा, विष्‍णु और देवगण भी बढ़ा रहे थे बारात की शोभा
शिव महापुराण के अनुसार देवता लोग शिवगणों के पीछे होकर बड़ी उत्‍सुकता के साथ बारात का अनुसरण करते हुए चल रहे थे। सम्‍पूर्ण सिद्ध और लोकपाल आदि भी देवताओं के साथ थे। देवमंडली के मध्‍यभाग में गरुड़ के आसनपर बैठकर लक्ष्‍मीपति भगवान विष्‍णु चल रहे थे। उनके ऊपर महान छत्र तना हुआ था। विष्‍णु पर चंवर डुलाए जा रहे थे और वे अपने गणों के घिरे हुए थे। विष्‍णु के शोभाशाली पार्षदों ने उन्‍हें अपने ही ढंग से आभूषणों से सजाया था।

इसी प्रकार जगद्पिता ब्रह्मा, मूर्तिमान वेदों, शास्‍त्रों, पुराणों, आगमों, सनकादि महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा परिजनों के साथ बारात की शोभा बढ़ा रहे थे। देवराज इंद्र भी आभूषणों से युक्‍त होकर अपने वाहन ऐरावत हाथी पर सवार अपनी सेना के साथ चल रहे थे। बारात में बहुत से ऋषिगण भी अपने तेज से प्रकाशित हो रहे थे। वे शिव का विवाह देखने के लिए उत्‍सुक थे।

इसके अलावा शाकिनी, यातुधान, बेताल, ब्रह्मराक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच आदि गण तथा तुम्‍बुरू, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्‍ठ गंधर्व तथा किन्‍नर भी बड़े हर्ष के साथ बारात की शोभा बढ़ा रहे थे।

बारात में शामिल हुईं थी देवियां
शिव महापुराण के रुद्र संहिता के पार्वती खंड के अनुसार शिव बारात में जगद् माताएं, सभी देवकन्‍याएं, गायत्री, सावित्री, लक्ष्‍मी, देवांगनाएं तथा अन्‍य देवपत्‍नियां शंकर जी का विवाह है, यह सोचकर बड़े ही उत्‍साह के साथ बारात में शामिल हुईं।

नंदी की शोभा
शिव महापुराण के अनुसार वेदों, शास्‍त्रों, सिद्धों और महर्षियों द्वारा जो साक्षात् धर्म का स्‍वरूप कहा गया है तथा जिसकी अंग कांति शुद्ध स्‍फटीक के सामन उज्‍जलव है, वह वृषभ नंदीश्‍वर भगवान शिव का वाहन बने।

इस प्रकार शिव के बाएं भाग में भगवान विष्‍णु, दाएं भाग में ब्रह्मा पीछे देवराज इंद्र सहित अन्‍य देवगण और शिवगण बारात की शोभा बढ़ा रहे थे।