नारस। बीएचयू में विगत 31 वर्षों के बाद आयुर्वेद संकाय चिकित्सा विज्ञान संस्थान मे आयुर्वेद की दिशा – दशा एवं गुणवत्ता सुधारने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ़ आयुर्वेद बीएचयू 2019 आयोजन शुभारंभ हुआ।

आप को बता दें कि 1987 में प्रो केएन. उडूपा तथा प्रो एसएन त्रिपाठी के निर्देशन मे ऐसा कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

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1100 प्रतिभागी कर रहे है शिरकत

इस कार्यक्रम में अबतक लगभग 1100 देश एवं विदेश के प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया, इनमेे से लगभग 30 प्रतिभागी विश्व के अन्य देशों जैसे अमेरिका, जर्मनी, रूस, स्वीटजरलैण्ड, नेपाल एवं श्रीलंका से आये हैं।

250 शोध पत्र हुआ प्रस्तुत

कार्यक्रम का प्रारम्भ प्रातः 8.बजे से वैज्ञानिक सत्रों के साथ शुरू हुआ जिसमें लगभग 200 से 250 शोध पत्र तथा 80 से 90 पोस्टर प्रस्तुत किया गया। जिसमें यूएसए, जर्मनी, श्रीलंका, नेपाल तथा भारत के भिन्न- भिन्न प्रदेशों से आये विशेषज्ञों एवं शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किये।वही मुम्बई से आये प्रो. अश्वनी राउत ने आयुर्वेद में शोध की बिधि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि रिवर्स फार्माकोलाजी के माध्यम से चिकित्सा का मानकीकरण आसानी से किया जा सकता है। डाॅ राउत आयुर्वेद संकाय से 1986 में एमडीकी डिग्री प्रो एसएन त्रिपाठी के निर्देशन में किये थे।

गुग्गलु के पौधे में है अनेक गुण

उन्होने गुग्गलु का उदाहरण देते हुए बताया कि एक ही दवा में बहुत से गुण होते हैं जिससे विभिन्न रोगों पर उनके प्रभाव को देखा जा सकता है। परन्तु उस उद्देश्य के पूर्ति के लिए पंचकषाय कल्पना की विभिन्न कल्पनाओं एवं मात्रा को बदल-बदल कर किया जा सकता है।

बिना एन्टीबायोटिक दवा के प्रयोग से मरीजों को कर रहे है स्वस्थ्य 

इसके साथ मेरठ से आये एमबीबीएस, एमएस (आर्थोपेडिक सर्जन) डाॅ संजय जैन ने आश्चर्य जनक परिणाम बिना किसी एन्टीबायोटिक दवा के प्रयोग से मरीजों को स्वस्थ्य कर रहा हूँं । ध्यान देने योग्य बात यह है कि औषधियों का निर्माण सही प्रकार से मानकीकरण युक्त हुआ हो। अन्य वक्ताओं ने बताया कि आयुर्वेदिक औषधियों से व्याधिक्षमत्व बढ़ता है जिससे रोग होने की सम्भावनायें कम रहती है।

शरीर में होते है 107 मर्म

डाॅ सुनील जोशी, उत्तराखण्ड ने अपने शोध पत्र में बताया कि शरीर में 107 मर्म (महत्वपूर्ण स्थान) होते हैं। यदि उस स्थान पर चिन्हित करके दबाया जाय तो कई रोगों में तत्काल आराम मिलता है जिसे हम मर्म चिकित्सा कहते हैं।

पैनल डिस्कशन का हुआ आयोजन

सत्रों के दौरान पैनल डिस्कशन का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मुम्बई से आये अशोक वैद्य, आयुर्वेदिक कालेज के प्रधानाचार्य उमेश शुक्ला, प्रो. जी.एस. तोमर, जर्मनी से आये डाॅ प्रिक, वैज्ञानिक एवं चिकित्सक रमा वैद्या तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व निदेशक आयुर्वेद, प्रो. केके ठकराल के सहभागिता सम्पन्न किया गया।

शोध पत्रों एवं पैलन डिस्कशन के माध्यम से निष्कर्ष यह निकल रहा था कि सीसीआईएम के पाठ्यक्रम को सुधारने की आवश्यकता है। चर्चा के दौरान संकाय प्रमुख, प्रो यामिनी भूषण ने बताया कि आयुर्वेद के छात्रों को प्रथम वर्ष से ही स्वास्थ्य संरक्षण के क्षेत्र मे उनके बृहद् योगदान एवं वैद्य होने के उपरान्त उनकी अद्वितीय क्षमता के बारे में बताने की आवश्यकता है।जिससे छात्र आधुनिक चिकित्सकों की नकल न करके अपने को एक विशिष्ट वैद्य के रूप में स्थापित कर सके। हमे ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक चिकित्सा की नकल करने से आयुर्वेद काफी पिछड़ता चला गया।

सीसीआईएम की सदस्य बनने की प्रक्रिया में हो बदलाव

आठ मूल विभागों मे से बचे तीन विभाग रसायन, वाजीकरण तथा भूतविद्या का स्वतन्त्र रूप विभाग बनाये जाने से आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है। पंचकषाय कल्पना की वैज्ञानिकीकरण की आवश्यकता तथा सीसीआईएम की सदस्य बनने हेतु चुनाव प्रक्रिया मे बदलाव की अत्यन्त आवश्यकता है।

मरीजों का हुआ स्वास्थ्य परीक्षण

आयुष्मान एक्सपो, पिपुल्स फाउण्डेशन तथा आयुर्वेद संकाय के चिकित्सकों द्वारा मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया, जिसमें सीआरपीएफ. के जवानों की एक टोली में निरीक्षण किया एवं अपने स्वास्थ्य का परीक्षण कराया।

आयर्वेद की नामी कंपनियों ने औषधियो का किया वितरण

इस अवसर पर एमील, उँन्झा, वैद्यरत्नम, श्रीआयुर्वेद, उमा फार्मेसी, हिमालया, झण्डू, बासू, आर्गेनिक इण्डिया आदि कई कम्पनियों ने अपने विचार रखे तथा जनता की पूछ-ताछ मे सहयोग देते हुए औषधियों का भी वितरण किया साथ ही आयुर्वेद संकाय के चिकित्सकों द्वारा चिकित्सा सुविधा प्रदान किया गया।

आयुर्वेद की चिकित्सा द्वारा नेत्र रोग को ठीक करने की काफी है सम्भावनायें

वही नेत्र रोग के क्षेत्र में कार्य कर रहे एमिरिटस प्रोफेसर महेन्द्र सिंह बासु द्वारा अपने शोध पत्र में बताया कि विश्व की अन्धता को केवल मोतियाबिन्द के आपरेशन से ठीक नही किया जा सकता। आपरेशन के दौरान काफी लोंगों कि दृष्टि वापस नही हो पाती।आयुर्वेद की चिकित्सा द्वारा नेत्र रोग को ठीक करने की काफी सम्भावनायें है।

इन औषधियों की वैज्ञानिकीकरण करने हेतु विश्वविद्यालय के समक्ष शोध करने हेतु प्रस्ताव दिया। तथा एमील फार्मा के संचित शर्मा द्वारा छात्रों के उत्साह वर्धन हेतु क्वीज का आयोजन किया गया साथ ही बताया गया कि हमारी कम्पनी के द्वारा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित औषधियों का लाभ जनता पर कराया जा रहा है।

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