नारस। उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश है जहां सम्पूर्ण देश की विविधताओं का संगम है और इस धरती पर सभी प्रकार के उत्सव और त्यौहार मनाए जाते हैं। इस समय फागुन की मस्ती पूरे देश में चढ़ चुकी है और विश्व की मशहूर ब्रज की लट्ठमार होरी शुरू हो गई है।

ब्रजमण्‍डल में जहां मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगांव में लट्ठमार होली खेलने का प्रचलन है। वहीं दुनिया की दूसरी सबसे मशहूर होली है काशी के पुराधिपति भगवान शिव के साथ बनारसियों द्वारा खेली जाने वाली रंग भरी एकदशी की होली। फल्‍गुन माह के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी जिसे वैष्‍णवों में आमलकी एकादशी भी कहते हैं, इस दिन शिव नगरी काशी में रंगभरी एकादशी मनायी जाती है। यह होली भी सूखे रंगों और अबीर गुलाल से खेली जाती है।

यह होली बाबा विश्वनाथ के माता गौरा के गौना बरात के समय ससुराल से घर वापसी पर खेली जाती है। 354 वर्ष पुरानी इस परम्परा के पीछे क्या तथ्य हैं और कैसा होता है इसका माहौल जानिए इस रिपोर्ट में।

 

पहली बार काशी पहुंची थीं गौरा
फाल्गुन शुक्ल की एकादशी को बनारस में रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली पर्व की शुरुआत भी इसी दिन से होती है। श्रीकाशी विश्‍वनाथ मंदिर के महंत आचार्य कुलपति तिवारी ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रंगभरी एकदशी के ही दिन पहली बार भगवान् शिव माता पार्वती को काशी लेकर आए थे।

परिवार संग निकलते हैं बाबा विश्वना
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के महंत कुलपति तिवारी बताते हैं कि वैसे तो काशी में रंगों की छठा शिवरात्रि के दिन से ही शुरू हो जाती है, लेकिन भोले की इस नगरी में एक दिन ऐसा भी रहता है जब बाबा खुद अपने भक्तों के साथ होली खेलते है। रंगभरी एकादशी के दिन बाबा की चल प्रतिमा अपने परिवार के साथ निकलती है। वैसे तो हमारे देश में ब्रज की होली मशहूर है, लेकिन रंगभरी एकादशी के दिन साल में एक बार बाबा भोलेनाथ अपने परिवार के साथ अपने नगर के भ्रमण पर निकलते हैं।

स्वर्गलोक से डाला जाता है बाबा पर गुलाल
आचार्य कुलपति तिवारी ने बताया कि रंगभरी एकदशी के पावन दिन बाबा की चल प्रतिमा का दर्शन भी श्रद्धालुओं को होता है और बाबा के दर्शन को मानों आस्था का जन सैलाब काशी की गलियों में उमड़ पड़ता है। मान्यता है की देव लोक के सारे देवी देवता इस दिन स्वर्गलोक से बाबा के ऊपर गुलाल डालते हैं। भक्त जमकर बाबा के साथ होली खेलते हैं। मान्यता है की बाबा इस दिन माँ पार्वती का गौना कराकर वापस लौटते हैं। बाबा की पावन मूर्ति को बाबा विश्वनाथ के आसान पर बैठाया जाता है।

शुरू हो जाता है होली का हुड़दंग
काशी में बाबा विश्वनाथ के संग होली खेलने के बाद ही होली का हुड़दंग शुरू हो जाता है। कुलपति तिवारी ने बताया कि श्रद्धालुओं के संग होली खेलने के बाद मान्यताओं के अनुसार बाबा विश्वनाथ महाश्मशान मणिकर्णिका पर भस्म से होली खेलने के लिए पधारते हैं। यहां उनके संग भूत और गण भी होली खेलते हैं।

ये है मुहर्त
इस वर्ष 16 मार्च को एकादशी सायं 6 बजकर 42 मिनट से लगकर रविवार 17 मार्च को शाम 4 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। अतः उदयीमान तिथि 17 मार्च को होने के कारण इसी तारीख को रंगभरी एकादशी मनाई जाएगी। काशी नगरी में होली का हुड़दंग भी इसी दिन से आरम्भ हो जाता है।

इस वर्ष ये है ख़ास
मंदिर के महंत डॉ कुलपति तिवारी ने बताया कि इस वर्ष की रंगभरी एकदशी ख़ास होने जा रही है। पहली बार भगवान् के मस्तक पर राजस्थानी टोपी सजेगी और भगवान् शिव खादी से बनी धोती और कुर्ता पहनेंगे । वहीँ माता पार्वती को केसरिया बनारसी साड़ी पहनाई जाएगी। इसके अलावा पहली बार हर्बल गुलाल का प्रयोग किया जाएगा जो मथुरा से मंगाया गया है और इसमें चन्दन का चूर्ण भी मिला होगा।