प्रतीकात्मक तस्वीर

थाने के कार्यालय में पिछले एक महीने से पड़ी छुट्टी की अर्जी को देख कर सिपाही ने थाने के मुंशी से बोला दीवानजी, मेरी छुट्टी कब अप्रूव होगी। 2 महीने से घर नही गया हूं!! मुंशी ने नाक पर रखे चश्मे की बीच से झांकते हुए कहा, क्यो… तुम चले जाओगे तो डियूटी कौन करेगा?? पहले ही थाने में सिपाहियों की कमी है औऱ तुम्हे छुट्टी चाहये!! फिर कभी चले जाना!!”

कब जाऊंगा सरजी? पिछले एक महीने से मां बुला रही है, कि घर कब आयगा” सिपाही ने झुंझलाते हुए कहा! मुंशी ने धमकाते हुए कहा, “ज्यादा बहस मत करो, दो लाइन जीडी में लिख दूँगा तो जबाब नहीं दे पाओगे! सिपाही गुस्से का घूंट पीता है और छुट्टी की एप्लिकेशन उठाकर चला जाता है!

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अगले दिन सुबह, हाथ मे छुट्टी की एप्लिकेशन लिए सीओ साहब के दफ्तर के बाहर खड़ा होता है और पेशी के मुंशी से पेश करने के लिए आग्रह करता है। “सर मां बहुत बीमार है, घर जाना जरूरी है, साहब के सामने छुट्टी के लिए पेश करा दो सर”, पेशी मुंशी ने कहा,”अरे यार, तुम सुबह-सुबह छुट्टी के लिए आ गये, देख कर साहब और नाराज होंगे, 2 घंटे बाद आना!!”‘ सिपाही चला जाता है और 2 घंटे बाद आता है।

फिर से पेश होने के लिए आग्रह करता है, पेशी मुंशी कहता है, “अभी साहब का मूंड ठीक नही है, अभी खड़े रहो थोड़ी देर।”

एक घंटे खड़े होने के बाद, सिपाही अपनी एप्लिकेशन के नीचे सौ की दो पत्ती लगाकर, पेशी मुंशी के आगे बढ़ाते हुए कहता है,”अब तो देख लो साहब”, मुंशी मुस्कुराते हुए कहता, “ठीक है देखता हूं, वैसे साहब का मूड अभी भी ठीक नही है,” आधा घंटा और खड़े होने के बाद मुंशी आवाज लगता है, ” ऐ…आ जाओ साहब बुला रहे हैं।”

टोपी, बेल्ट ठीक करके सिपाही सीओ साहब के सामने थम बनाता है, सीओ साहब पूछते हैं, “तुम्हारी माँ की तबियत खराब है? इलाज के कागज कहाँ है? और 10 दिन की छुट्टी का क्या करोगे, दवाई दिलाकर 2 दिन में वापस आ जाना, कौनसा तुम डॉक्टर हो।”

“साहब 2-3 महीने हो गए घर गए हुए। साहब कम से कम 7 दिन की तो कर दीजिय छुट्टी।” सिपाही ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, सीओ साहब ने डांटते हुए कहा, “3 दिन की ले जाओ, इससे ज्यादा नही करूँगा,”

सीओ ने 10 में से 3 दिन की छट्टी कर सिपाही की तरफ अर्जी फेंक दी। सिपाही 3 दिन की छुट्टी पर भी खुश होते हुए बाहर आकर अपने घर पर फोन कर बताने लगा, कि तभी सीओ ने उसे खुश होते देख अपने पेशी मुंशी से कहा, “इसकी तो मां बीमार थी और यह खुश हो रहा है, लगता है झूठ बोल रहा है, बुलाओ उसे”, मुंशी ने चिल्लाते हुए सिपाही से कहा,”ऐ… झूट बोलकर छुट्टी लेते हो, सीओ साहब को बेवकूफ समझते हो, चलो साहब बुला रहे है।”

सिपाही डरते हुए दुबारा सीओ साहब के सामने गया। सीओ ने डांटते हुए कहा, “तुम्हारी तो मां बीमार थी और तुम बाहर खड़े हो कर हंस रहे हो। अपनी मां से बात कराओ।” पेशी मुंशी ने सिपाही से उसकी मां का नम्बर मिलाकर साहब को मोबाइल पकड़ा दिया। मोबाइल रिसीव होने पर सीओ ने पूछा।” आप सिपाही की मां बोल रही हैं, उधर से आवाज आई, “हां”। सीओ ने पूछा, ”आप बीमार हैं।” मां ने कहा, ”नहीं तो।” इतना सुनते ही सीओ ने फोन काट दिया।

भोली भाली मां, पुलिस की बेबसी को नही समझ पाई, जबाब नहीं में सुनकर सीओ ने सिपाही को हजार तरह की गलियां सुनाते हुए अनुशासन हीनता और अफसर को गुमराह करने के जुर्म में ओआर का आदेश दिया और छुट्टी भी कैंसिल कर दी।

ओआर वाले दिन सिपाही एसपी के सामने पेश किया गया और जुर्म की सजा देकर सिपाही से सफाई देने के लिए कहा गया।

सिपाही ने अपने जबाब में कहा, “साहब, दो महीने से छट्टी की एप्लिकेशन लगा रखी थी, घर गए हुए महीनों हो गए थे, साहब पुलिस में जबतक किसी की मां-बाप बीमार नहीं होते या मर नही जाते, छट्टी इतनी आसानी से कहाँ मिलती है, साहब कौन अपनी मां को बीमार करना चाहता है। मजबूरी में ये सब करना पड़ता है। वरना सिर्फ घर जाने के लिये छट्टी कहाँ मिलती हैं। सिपाही की आंखे नम थी और सब खामोश थे।

सिपाही को दुःख सजा मिलने का नही था। उससे बड़ी सजा उसके लिए यही थी, कि उसकी छट्टी एक बार फिर मंजूर नही हो सकी और उसकी मां का उससे मिलने का इंतज़ार अभी तक खत्म नहीं हुआ है।

(यह घटना काल्पनिक ही सही अपितु एक कल्पना भी हमारे समाज की वास्तविकता हो सकती है। स्याही की कमी या कागज का छोटापन तो बहाना होगा। खुली आँखों से ही सही, परन्तु इसका सम्बन्ध पुलिस के हर एक सिपाही से भी होगा।)

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