नारस। मैगसेसे अवार्ड से सम्मानित किए जा चुके डॉ संदीप पाण्डेय ने अपनी किताब जारी की है।  “मुझे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से क्यों निकाला गया” नाम की किताब में उन्होंने अपने BHU से निष्कासन के कारणों का खुलासा किया है।  इस किताब में उन्होंने आरएसएस पर गंभीर आरोप लगाए हैं।  उन्होंने इस किताब में लिखा है कि आरएसएस के विचारधारा वाले तत्कालीन कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने पढ़ाने के उनके कॉन्ट्रैक्ट को रीन्यू नहीं किया।  यही नहीं इलाहबाद हाईकोर्ट द्वारा उनके पक्ष में निर्णय देने के बाद भी उन्हें पढ़ाने के लिए BHU में वापस नहीं बुलाया गया।

उन्होंने अपने उपर नक्सली होने के आरोप के बारे में लिखते हुए कहा है कि वे गांधीवादी हैं, लेकिन वे नक्सलियों के मुद्दों का समर्थन करते हैं, लेकिन उनके तौर तरीकों से सहमत नहीं हैं।  हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि नक्सली होने के लिए बहुत साहस व त्याग की जरूरत पड़ती है, जो उनमें नहीं है।

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डॉ संदीप पांडेय ने इस किताब के पहले ही चैप्टर में अपने बीएचयू से निष्कासन के कारणों का उल्लेख किया है। उनके मुताबिक़, “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय प्रौद्योगिकी सं स्थान में ढाई वर्ष पढ़ाने के पश्चात मेरा अनुबंध समय से पूर्व ही समाप्त कर दिया गया है।  21 दिसम्बर, 2015 को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक में मेरा अनुबंध समाप्त करने का निर्णय कुलपति प्रोफेसर गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, जो केन्द्रीय सरकार की मानव संसाधन मंत्री द्वारा जिन पांच नामों की बोर्ड ऑफ गवर्नरस् ने संस्तुति की थी को नजरअंदाज कर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पर अध्यक्ष के रूप में थोपे गए थे, तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के फैकल्टी मामलों के डीन प्रोफेसर धनंजय पाण्डेय के दबाव में लिया गया।

उन्होंने आगे लिखा है कि प्रोफेसर त्रिपाठी ने कई वर्षों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जहां से वे पहले तनख्वाह लेते थे, में कोई कक्षा नहीं पढ़ाई और न ही कोई शोध पत्र प्रकाशित किया, फिर भी वे एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति बनाए गए यह आश्चर्य का विषय है।  मेरे खिलाफ ये आरोप हैं कि मैंने सरकार द्वारा प्रतिबंधित निर्भया कांड से जुड़ी एक फिल्म अपनी कक्षा में दिखाने का निर्णय लिया था, मैं नक्सलवादी हूं और राष्ट्र विरोधी गतिविधियो में संलिप्त हूं।  6 जनवरी, 2016 के एक आदेश में निदेशक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान ने बिना कोई कारण बताए कहा है कि पत्र से एक माह की अवधि पूरा होने पर मेरा अनुबंध समाप्त हो जाएगा।”

वे आगे लिखते हैं, ” मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं कोई नक्सलवादी नहीं हूं।  मैं अपने आप को गांधीवादी विचारधारा के सबसे नजदीक पाता हूं।  किन्तु नक्सलवादी जो मुद्दे उठाते हैं उनका मैं समर्थन करता हूँ भले ही मैं उनके तरीकों से सहमत न होऊं।  मैं यह भी मानता हूं कि नक्सली होने के लिए बहुत साहस व त्याग की जरूरत पड़ती है, जितनी क्षमता मुझमें नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ब्राह्मणवादी विचारधारा जिसके साथ जातिवादी सोच जुड़ी ही हुई है कभी भी समतामूलक न्यायपूर्ण समाज के लिए संघर्ष को समझ ही नहीं सकती।

उन्होंने अपने निष्कासन का कारण बनी निर्भया पर बनी बीबीसी की डाक्यूमेंट्री का जिक्र करते हुए लिखा है, “निर्भया पर बीबीसी द्वारा बनाई गई डॉक्यूमेण्टरी फिल्म जिसे भारत सरकार ने प्रतिबंधित किया था, मैं अपनी कक्षा में 11 मार्च, 2015 को दिखाने वाला था किंतु कक्षा से पहले मुख्य प्रॉक्टर व लंका के थानाध्यक्ष के आ जाने से और उनके मना करने पर मैंने उस फिल्म का प्रदर्शन नहीं किया।  मुख्य प्रॉक्टर तो मुझसे कक्षा ही रद्द करने को कह रहे थे किंतु चर्चा पर भारत सरकार ने कोई रोक नहीं लगाई थी अतः मैंने महिला हिंसा के मुद्दे पर एक अन्य फिल्म दिखा कर चर्चा करवाई।  अभी कुछ महीनों न्यूयॉर्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय की एक छात्रा, जिसके साथ उसी के एक सहपाठी ने बलात्कार किया था, ने अपने एक प्रोफेसर की राय पर परिसर में एक गद्दा लेकर घू मना शुरू किया. यह गद्दा उसके बोझ का प्रतीक था।  छात्रा ने यह भूमिका ली कि जब तक दोषी छात्र निलंबित नहीं किया जाता तब तक वह यूं ही गद्दा लेकर सब जगह जाएगी।  यहां तक कि छात्रा गद्दे को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भी लेकर चली गई।  चार अन्य छात्राओं ने उसका गद्दा मंच पर चढ़ाने में मदद की। उसी दीक्षांत समारोह में दोषी छात्र को भी डिग्री मिली जिसने विश्वविद्यालय के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया।  एक तरफ कोलम्बिया विश्वविद्यालय का प्रशासन है जो एक कीमत चुका कर भी पीड़िता के साथ खड़ा रहा और दूसरी तरफ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय है जो महिला हिंसा पर चर्चा भी नहीं होने देना चाहता और किसी पुरुष प्रोफेसर द्वारा किसी छात्रा अथवा महिला कर्मी के साथ यौन शोषण की घटनाओं में अपने पुरुष प्रोफेसर को ही बचाने की कोशिश करता है।

डॉ संदीप पाण्डेय अपने आपको राष्ट्रवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी बताते हुए लिखते हैं, “मैं राष्ट्र की अवधारणा या राष्ट्र की सीमाओं को नहीं मानता।  मेरा मानना है कि मनुष्य को धर्म व जाति की तरह कृत्रिम श्रेणियो में बांटती हैं अतः मैं राष्ट्र के विरोध में या राष्ट्र के पक्ष में तो हो ही नहीं सकता।  मैं राष्ट्रवादी नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रवादी या उससे भी बेहतर ब्रह्माण्डवादी, जिसमें प्रकृति भी शामिल है, हूं, वी भी ऐसे लोगों द्वारा राष्ट्रद्रोही होने के आरोप लगाने, जो उस विचारधारा को मानते हैं, जिसने अपने आप को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से अलग रखा, जो महात्मा गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार है, जिसने बाबरी मस्जिद ध्वंस कर भारत में आतंकवाद नामक समस्या को न्यौता दिया और जो देश में कम-से-कम पांच बम विस्फोट की घटनाओं- दो मालेगांव में, हैदराबाद, अजमेर व समझौता एक्सप्रेस -को अंजाम देने के लिए जिम्मेदार है, को मैं गम्भीरता से नहीं लेता।  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा में हिं सा के बीज हैं, जो भारत को दीर्घकालिक समस्याग्रस्त राष्ट्र में तब्दील कर देगा।  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सोच भारत के सामाजिक ताने-बाने को क्षतिग्रस्त कर, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा देखे गए सपनों और संविधान में दिए गए मूल्यों के आधार पर प्रत्येक परिवार को बिना भेदभाव के सम्मानजनक ढंग से जीने व आजीविका के अधिकार प्रदान करने वाले, आधुनिक भारत के निर्माण में बाधा बनेगी।

डॉ संदीप पाण्डेय ने अपने बीएचयू से निष्कासन पर कोई अफ़सोस न होने का जिक्र करते हुए लिखा है, “मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में मेरा अनुबंध समाप्त कर दिया गया है क्योंकि यह फैसला मेरी अकादमिक योग्यता में किसी कमी के आधार पर नहीं बल्कि मेरी एक राजनीतिक विचारधारा में निष्ठा और सामाजिक कामों को लेकर लिया गया है।  मेरे छात्रों और कर्मचारियों, प्रोफेसरों व परिसर के आस-पास रहने वाले समुदायों के साथ बिताए क्षण यादगार रहेंगे.”

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