नारस। आस्था या फिर अंधविश्वास? हमारी परम्पराओ में न जाने ऐसे कितने रीती-रिवाज और अनुष्ठान हैं, जिसमे यह अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही एक प्राचीन अनुष्ठान है, कड़ाहा पूजा, नवरात्र में शक्ति की उपासना होती है, लेकिन वाराणसी के जैतपुरा के बागेश्वरी देवी दुर्गा मंदिर में नवरात्र में कड़हा पूजन होता हैं, जिसमे सैकड़ो भक्तो की मौजूदगी में पुजारी, खौलते खीर, दूध, घी और आग से खेलता है। बागेश्वरी देवी मंदिर में आखिर इस आयोजन के पीछे का क्या रहस्य है जानिए इस रिपोर्ट में

नवरात्र पर हुआ आयोजन
आग और इन्सान या यूँ कहें आग से किसी भी जीव-जंतु या पेड़-पौधे का मेल नहीं है। अपनी राह में आने वाली हर चीज को आग जलाकर राख कर देती है। मगर आग से कोई लड़ना सीख ले तो क्या इसको चमत्कार कहा जायेगा या फिर कोई मैजिक ट्रिक? पूरे देश में नवरात्र पर्व को शक्ति अराधना के रूप में मनाने की परम्परा है, लेकिन वाराणसी के जैतपुरा बागेश्वरी मंदिर में नवरात्र का दिन रोमांच और चमत्कार से भरा होता है, क्योकि दशको से यहां आस्था और अंधविश्वास के बीच फसे कड़ाहा पूजन का आयोजन होता आ रहा है।

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खौलती खीर को शरीर पर लगता रहा पुजारी
कड़ाहा पूजन को उस गोवर्धन पूजा से जोड़ा जाता है, जिस लीला को भगवान् कृष्ण ने द्वापर युग में गोवर्धन पर्वत उठाकर किया था। इसमें दुर्गा मंदिर में भानी भगत नवरात्र के चौथे दिन आग से खेलकर लोगो को चौका देते हैं। सामान्य पूजा-पाठ और आरती के साथ अनुष्ठान की शुरुआत होती है। फिर ढोल, नगाडो और ताशो की थाप माहौल में उर्जा भर देती है। ठन्डे पानी से स्नान कर पुजारी, खौलते घी से पूड़ियां निकालता है और सबको बांटता है, अग्नि कुंड में झुककर देवी को पुजारी प्रसन्न करता है। इतना ही नहीं खौलती खीर की कई हांडियों से खीर निकालकर पुजारी अपने शरीर पर और भक्तो पर लगाते हैं या यूँ कहे लगभग नहाते दिखता हैं। इतना सब कुछ करने के बाद भी पुजारी का बाल भी बाका नहीं होता और लोग चमत्कार को नमस्कार करते हैं।

कृष्ण और उनके भाई बलदाऊ की होती है पूजा
आस्था में डूबे भक्त इस पूजन को देखने के लिए दूर-दराज से आते हैं। इस पूजा के आयोजक अशोक यादव बताते हैं कि भगवान कृष्ण और उनके भाई बलदाऊ का पूजा होती हैं। इसमें खीर का भोग लगाकर अपने शरीर पर लगाते हैं। भगवान के प्रसाद होने के कारण खौलती खीर भी शरीर पर कोई फर्क नहीं डालती । इस पूजा को क्षेत्र के सुख-शांति के लिए करवाया जाता हैं। यह यदुवंशियो की मुख्य पूजा हैं।

यदुवंशी समाज करवाता है आयोजन
यदुवंशी समाज के इस प्राचीन अनुष्ठान को समाज का पढ़ा-लिखा तबका भी आस्था की शक्ति मानता है। भानी भगत ही नहीं उनके पूर्वजो से ही इस अनुष्टान को निभाने की परम्परा चली आ रही है। अनुष्टान के बाद शाकला,दूध, पूड़ी और घी लोगो में प्रसाद स्वरुप वितरित भी कर दिया जाता है। कड़ाहा पूजन में आयी श्रद्धालु कांति देवी की माने तो ये माता की पूजन हैं इसमें गर्म खीर से भक्त लोग नहाते हैं। हम माता का आशीर्वाद लेने के लिए आये हैं और जो पुजारी कहते हैं उसे सुनते हैं। इसमें माता का आशीर्वाद हैं कि भक्त खौलते खीर से भी नहीं जलते हैं। श्रद्धालु बताते हैं कि हमारा विश्वास है कि इस पूरी पूजा में माता साक्षात् यहां आती हैं और उन्ही की शक्ति होती हैं। इस पूजा की बहुत मान्यता होती हैं।

लगी थी रोक
न जाने ऐसी रुढियों पर कब रोक लग सकेगी? कड़हा पूजन का अनुष्ठान धर्म की नगरी काशी में कोई नया नहीं है। इससे पहले भी इस अनुष्टान को काफी अमानवीय तरीके से वाराणसी में कई बार अंजाम दिया जा चुका है, जिसमे अबोध से लेकर गोद के बच्चो को भी पुजारी अपने साथ गरम दूध से स्नान में शामिल कर लेता था, लेकिन मीडिया में चर्चा के बाद इसपर अंकुश लग पाया था, पर धीरे धीरे ही सही यह अनुष्टान एक बार फिर धार्मिक आस्था के नाम पर किसी मदारी के तमाशे की तरह परोसा जाना शुरू हो गया है और प्रशासन बिल्कुल भी फिकरमंद नहीं है।

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