चैत्र नवरात्र : दुर्गामंदिर में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, माता कुष्मांडा से भक्तों ने लिया आशीर्वाद

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नारस। चैत्र नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्मांडा के दर्शन का विधान है। मां कुष्मांडा धर्म की नगरी काशी में दुर्गाकुंड में स्थित प्राचीन दुगा मंदिर में विराजमान हैं। देर रात से ही दुर्गाकुंड स्थित दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं की लम्बी कतार लगी हुई थी। दुर्गाकुंड मंदिर अति प्राचीन मांदरी है इसलिए सिर्फ काशी ही नहीं आसप पास के जनपदों से भी श्रद्धालू मां के दर्शन को उमड़े हैं। माता कुष्मांडा को नारियल चढाने का विशेष महत्त्व है। इसके अलवा मां को चुनरी के साथ लाल गुडहल के फूल की माला व मिष्ठान का भोग लगाया जाता है।

माता कुष्मांडा के सेवक और मंदिर के पुजारी सोनू झा ने बताया कि मान्यता हैं की माता कुष्मांडा वो देवी हैं जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है। देवी कूष्माण्डा इस चार जगत की अधिष्ठात्री हैं। पुजारी सोनू झा ने बताया कि जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था। देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई और उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलके झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अंडकोष का जन्म होता है, उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ अत: यह देवी कुष्मांडा के रूप में विख्यात हुई।

पुजारी सोनू झा ने बताया कि मान कुष्मांडा का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं। इस दिन भक्त का मन ‘अनाहत’ चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए।