नारस। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मानों होड मची हुई है। दूर दूर से जाने-अनजाने नेता यहां चुनाव लडने आ रहे हैं। कई स्थानीय भी पीएम के खिलाफ चुनावी ताल ठोंकने में लगे हुए हैं। हालांकि अबतक प्रमुख पार्टियों ने अभी तक अपने प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारे हैं। बावजूद इसके दिन प्रतिदिन निर्दल प्रत्याशियों की संख्या बनारस में बढती जा रही है। इसमें एक से बढकर एक दिलचस्प नाम सामने आ रहे हैं।

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इसी क्रम में दिल्ली के जंतर मंतर पर 2012 से लगातार धरना दे रहे ‘ज़िंदा-मुर्दा चाय वाला’ भी प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनावी रण में उतरने जा रहा है। बता दें कि ये चाय वाला वाराणसी जनपद का ही रहने वाला है और खुद को ज़िंदा साबित करने की लड़ाई लड़ रहा है।

आखिर कौन हैं ‘जिंदा-मुर्दा चाय वाला’
वाराणसी के चौबेपुर के रहने वाले संतोष मूरत सिंह उर्फ़ ”मैं ज़िंदा हूं उर्फ़ ज़िंदा मुर्दा चाय वाला” इस समय जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं और खुद को ज़िंदा साबित करने की गुहार लगा रहे हैं। संतोष ने टेलीफोनिक बात की तो संतोष ने बताया कि मैंने चाय की दूकान पर नौकरी कर ली है ताकि जीवन चलता रहे। सतोष ने हमें बताया कि चाय वाले के यहां नौकरी करने की वजह से मै जंतर-मंतर पर केतली लेकर चाय बेचता हूं इसलिए मुझे नया नाम ‘मुर्दा चाय वाला’ दिया गया है।

खुद को ज़िंदा करने की कवायद
संतोष ने बताया कि जब एक चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है तो एक मुर्दा चाय वाला क्यों नहीं। इसी सोच के साथ मैंने फैसला किया है कि मै प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़कर खुद को ज़िंदा साबित करूंगा।

ऐसे हुआ ये ज़िंदा व्यक्ति मृत
संतोष ने बताया कि मुंबई में वर्ष 2003 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में उनको मृत दिखाकर उनके पट्टीदारों ने बनारस के चौबेपुर के छितौनी में स्थित उनकी 12.5 एकड़ पुश्तैनी जमीन को अपने नाम करा लिया। नाना पाटेकर का साथ और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आश्वासन मिलने के बाद भी वह अब तक खुद को जिंदा साबित नहीं कर पाए हैं। संतोष ने बताया कि फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर 2003 में रिलीज हुई फिल्म आंच की शूटिग के लिए वर्ष 2000 में उनके गांव पहुंचे थे।

दलित मराठी युवती से शादी पड़ी भारी
संतोष ने बताया कि उसी दौरान नाना पाटेकर से उनकी मुलाकात हुई और वह अपने साथ मुंबई ले गए। वहां मराठी दलित युवती से उन्होंने प्रेम विवाह कर लिया। विवाह बाद जब वह गांव लौटे तो दलित लड़की से शादी के कारण गांव वालों ने उनका बहिष्कार कर दिया। माता-पिता का निधन पहले ही हो चुका था। ऐसे में पट्टीदारों ने मुंबई ट्रेन धमाकों में उन्हें मृत दिखाकर गांव में तेरहवीं कर दी और उनकी जमीन अपने नाम करा ली।

भर चुके हैं राष्ट्रपति पद का नामांकन
बता दें की संतोष मूरत सिंह खुद को ज़िंदा साबित करने के लिए दी गयी अर्जी पर साल 2018 में यूपी डीजीपी कार्यालय द्वारा संज्ञान लेते हुए वाराणसी क्राइम ब्रांच को इस मामले की जांच दी थी। काफी लम्बी पूछताछ के बात क्राईम ब्रांच ने डीजीपी कार्यालय को इसकी रिपोर्ट सौंपी थी पर अभी तक उसकी कोई फ़ाइनल रिपोर्ट नहीं आई। संतोष साल 2012 से जंतर मंतर पर धरनारत हैं और साल 2012 में ही संतोष ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन भी किया था।

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