काशी का दसवां त्योहार है संकट मोचन संगीत समारोह, छह रातों तक संगीत से पखारे जाते हैं प्रभु के पांव

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देश के शीर्ष मीडिया संस्‍थानों में कार्य कर चुके बनारस के सीनियर जर्नलिस्‍ट अभिषेक त्रिपाठी जी की कलम से (साभार)। लेखक वरिष्‍ठ मीडियाकर्मी हैं।


  1. विश्व प्रसिद्ध संकटमोचन संगीत समारोह में विदेशों से भी आते हैं संगीत प्रेमी
  2. 93 वर्ष से चला आ रहा है शास्त्रीय संगीत का सफर, काशी के लिए अब बना त्योहार
  3. मंदिर में कोई बड़ा-छोटा नहीं, दीर्घाओं में साथ बैठते हैं राजा और रंक

संगीत की कितनी विधाएं हो सकती हैं, जानना हो तो बनारस के संकटमोचन मंदिर पहुंचिए। हनुमान जयंती पर यहां नाद, नृत्य और सुरों को अंजुरी में भर-भर कर भगवान के पांव पखारे जाते हैं। संगीतवेत्ताओं और संगीत प्रेमियों के साथ-साथ संगीत के छात्रों और जिज्ञासुओं का मजमा जुटता है। संध्या आरती से भोर की आरती तक चलने वाला छह रातों का यह रतजगा सात वार और नौ त्योहारों के लिए पहचाने जाने वाले बनारस का दसवां त्योहार बन चुका है।

अचंभित कलाकार और मुग्ध संगीतप्रेमी
93 वर्ष पहले शुरू किया गया संगीत का यह सफर अब एक कारवां बन चुका है। ‘मुक्तांगन’ के नाम से प्रसिद्ध इस कार्यक्रम स्थल की विश्वभर में ख्याति यूं ही नहीं है। देश के बड़े-बड़े कलाकार जिन्हें देखने-सुनने के लिए बड़े जतन करने पड़ते हैं, यहां आम लोगों के बीच मौजूद होते हैं और हनुमत प्रभु को स्वरांजलि अर्पित कर अपनी साधना को वह तप का रूप दे देते हैं। खास यह है कि मंच के ठीक नीचे, अगल-बगल और कई बार मंच पर कलाकारों के पास ही बैठे संगीत प्रेमी मिल जाते हैं। पहली बार आने वाले कलाकार यहां का माहौल देखकर अचंभित हुए बिना नहीं रह पाते। संकटमोचन दरबार की महिमा भी कुछ ऐसी है कि पहली बार यहां आने वाला अगली बार के लिए पहले से ही तैयार हो जाता है।

जसराज नहीं, इन्हें यहां रसराज कहते हैं
संकटमोचन मंदिर के इस मंच पर यूं तो बड़े-बड़े कलाकारों ने हाजिरी लगाई है मगर पद्मविभूषण पं. जसराज ऐसे हैं जिन्हें इस मंच का नेमि बुलाना गलत नहीं होगा। 1972 से पंडित जसराज हर वर्ष यहां नियमित आते रहे हैं। एक वर्ष अस्वस्थता के कारण उनके कार्यक्रम में कुछ व्यवधान आ रहे थे मगर फिर भी वह दरबार पहुंचे। बजरंगबली के सामने शीश नवाया और कुछ मिनटों की प्रस्तुति कर लौट गए। जसराज को संकटमोचन दरबार से ही ‘रसराज’ की उपाधि भी मिली हुई है।

जिन्होंने दिलाई विश्व में पहचान
रामधुन के भजन से शुरू हुए इस संगीत समारोह की गरिमा बनाए रखने और इसे विश्वभर में पहचान दिलाने के लिए महंत स्व. वीरभद्र मिश्र को हमेशा जाना जाएगा। समारोह के दौरान अक्सर श्रोता और कलाकार उन्हें याद करते रहते हैं। महंत जी छहों रातों को कार्यक्रम में पूरे समय मौजूद रहते थे और अब यह जिम्मेदारी उनके सुपुत्र और वर्तमान महंत प्रो। विश्वम्भरनाथ मिश्र निभा रहे हैं। पिछली बार 2018 के समारोह में पहुंचे मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने भी स्व. महंत जी को याद किया। वर्ष-2006 में मंदिर में बम धमाके के बाद जावेद अख्तर कौमी यकजहती का संदेश लेकर यहां आए थे। उन्होंने कहा कि महंत जी उन चुनिंदा लोगों में थे जिनके वह पैर छुआ करते थे।

23 पद्म अवार्डियों ने लगाई हाजिरी
2018 का संकटमोचन संगीत समारोह यूं भी खास रहा कि यहां युवा कलाकारों ने अपनी साधना की परीक्षा दी तो पुरनियों ने अपनी तपस्या से बजरंगबली को प्रसन्न किया। पद्मविभूषण से अलंकृत कथक सम्राट पं बिरजू महाराज, पं. जसराज, पं. हरिप्रसाद चौरसिया, पद्मभूषण सोनल मानसिंह और डॉ. एल. सुब्रहमण्यम के अलावा अनूप जलोटा, येल्ला वेंकटेश्वर राव, नलिनी-कमलिनी, उस्ताद राशिद खां, मालिनी अवस्थी, कंकणा बनर्जी, गुलाम मुस्तफा खां, नीलाद्रि कुमार जैसे कलाकारों ने संकटमोचन दरबार में हाजिरी लगाई।

परिवर्तन में भी पूरा अनुशासन
शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत के लिए प्रसिद्ध संकटमोचन संगीत समारोह में समय के साथ तमाम बदलाव हुए मगर परंपराओं को भी उसी शिद्दत से सहेजा गया। यहां शास्त्रीय गायन है तो विश्वविख्यात ड्रमर शिवमणि भी कई साल से आ रहे हैं। युवाओं के लिए यहां चित्रकला गैलरी, मूर्तिकला, सेल्फी प्वाइंट जैसे प्रयोग भी किए गए मगर यह भी ध्यान रखा गया कि किसी भी प्रयोग से मंच की गरिमा कम न होने पाए।

यहां संगीत ही धर्म है
संकटमोचन दरबार की एक और खासियत यहां आने वाले कलाकारों के चयन में है। किसी भी धर्म या पंथ के कलाकारों को यहां पिछले दो वर्षों से निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के सरकारी कव्वाल निजामी बंधुओं के जरिए यहां अमीर खुसरो की कव्वालियां भी गूंज रही हैं। गजल सम्राट गुलाम अली यहां 2015 और 16 में हाजिरी लगा चुके हैं। कुछ रूढ़ीवादियों ने भगवान के दरबार में इन कलाकारों की मौजूदगी पर विरोध जताने की कोशिश भी की मगर संगीत प्रेमियों ने उन्हें यह कहकर नकार दिया कि ‘संगीत का कोई धर्म नहीं होता और इससे बढ़कर प्रभु की कोई साधना नहीं होती…’

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तस्वीरों में देखें संकट मोचन संगीत समारोह के पूर्व के वर्षों की सांस्कृतिक निशाओं की झलकियां