नारस। कुछ दिनों पहले बॉलीवुड के सुपरस्टार आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ आयी थी। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे लड़कियों ने एक बाप का सपना पूरा किया था। अब उसी नक्शेकदम पर वाराणसी के परमानंदपुर गांव और आस पास की बेटियां चल रही हैं और इनमे कुश्ती का बीज बो रहे हैं काशी के द्रोणाचार्य राजेश कुमार यादव। राजेश कुमार यादव परमानंदपुर ग्राम में स्थित विकास इंटर कालेज में स्पोर्ट्स टीचर हैं और ये यहां पढ़ने वाली 200 से अधिक बच्चियों को कुश्ती के साथ साथ कबड्डी और खो-खो का प्रशिक्षण दे उन्हें नई ऊंचाइयों पर पहुंचा रहे हैं। पेश है एक रिपोर्ट

ओलम्पिक में आया पदक तो बढ़ गया बेटियों का रुझान
रियो ओलम्पिक में पहली बार किसी महिला रेसलर ने भारत के लिए पदक जीता तो पूरे देश में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। कई बड़ी हस्तियों के होने के बावजूद साक्षी मालिक ने यह पदक हासिल किया। इसके बाद तो पूरे देश में महिला रेसलिंग के लिए लड़कियों और उनके परिजनों में रुझान देखा गया। एका एक अखाड़ों और प्रशिक्षण केंद्रों में लड़कियों की संख्या बढ़ गयी पर यहाँ भी सिर्फ वही आये जिनके पास संसाधन थे,लेकिन काशी में एक ऐसे भी द्रोणाचार्य है जो रोज़ दो घंटा काशी के ग्रामीण इलाकों की लड़कियों को कुश्ती के दांव पेंच सीखा रहे हैं।

विज्ञापन

यहां मिले कुश्ती के द्रोणाचार्य
शिवपुर थानाक्षेत्र के परमानंदपुर गांव के विकास इंटर कालेज के स्पोर्ट्स टीचर राजेश कुमार सुबह सवेरे ही कॉलेज की लड़कियों को कुश्ती के दांव पेंच सिखाते मिले। यह दांव पेंच आधुनिक मैट पर नहीं बल्कि पारम्परिक मिट्टी के अखाड़े में थे। हम जब वहां पहुंचे तो अखाड़े को घेरे लड़किया बैठी थी और दो बेटियां अखाड़े में ज़ोर आज़माईश कर रही थी।

बेटियों में दिखी ललक तो शुरू किया प्रशिक्षण
अखाड़े में लड़ रही बेटियों ने एक लम्बी व्हिसिल पर एक दुसरे को गले लगाया और हाथ मिलकर अखाड़े से बाहर निकल आयी और तुरंत ही दूसरी लडकियां अखाड़े में मौजूद थी। राजेश यादव व्हिसिल बजाते उसके पहले हमने उन्हें रोक लिया और कहा कि कुछ समय हमें भी दें। वो मुस्कुराए और लड़कियों को वर्क आउट समझकर हमसे बात के लिए वहीँ बैठ गए। राजेश ने बताया कि जब यहाँ आया तो देखगा कि बेटियां बहुत ही हार्ड वर्किंग हैं और किसी भी कार्य में जीजान से लग जा रही हैं। इस पर मैंने इन्हे कुश्ती का प्रशिक्षण देने का मन बनाया। पहले तो वो डरी पर फिर वो खुद ही इस खेल में रम गयी है।

संसाधन के बिना ग्रामीण क्षेत्र में दम तोड़ रही प्रतिभा
हमने राजेश कुमार यादव से पूछा तो उन्होंने सहजता से कहा कि शहरी क्षेत्र की लड़कियों को संसाधन आसानी से मुहैया हो जाते हैं इसलिए उन्हें किसी भी खेल को अपनाने में आसानी होती है। ऐसे ग्रामीण इलाकों मेँ प्रतिभा का दम घुट जाता है। इसी प्रतिभा को खुली हवा में सांस दिलाने के लिए स्कूल की मदद से यह ट्रेनिंग दी जा रही है, जिसमे करीब 200 बच्चियां हैं जो कुश्ती, खो- खो और कबड्डी की शिक्षा ले रही है।

कुश्ती में बनाना है कैरियर, लाना है ओलम्पिक पदक
राजेश यादव से प्रशिक्षण ले रही ज़्यादातर बच्चियां दंगल फिल्म से प्रभावित हैं और कुश्ती की शौक़ीन है साथ ही कुश्ती में ही अपना कैरियर बनाना चाहती है। इस सम्बन्ध में जूही यादव ने बताया कि हम सब लोग सुबह 5 बजे यहां आ जाते हैं। पहले वर्कआउट होता है उसके बाद हम प्रैक्टिस करते हैं। हमारा लक्ष्य ओलम्पिक में पदक लाना है।

विज्ञापन
Loading...