गूगल कालीन भारत…

हम माने या न माने पर इंटरनेट, स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और गूगल जैसे सर्च इंजन के दौर ने हमारी दुनिया और हमारी जिंदगी को बदलकर रख दिया है। हम क्या देखते हैं, हम क्या पढ़ते हैं, कैसे सोचते हैं, कैसे चीजों को समझते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं..ये सब अब पहले जैसा न रहा, हम पहले जैसे नही रहे। एक इंसान, एक समूह, एक समाज के रूप में हमारे बात-विचार, आहार-व्यवहार में आमूलचूल परिवर्तन हो गया है। देश-काल-समाज में तेजी से हो रहा यह कायापलट एक संवेदनशील लेखक की नजर में न आये, ये कैसे हो सकता है?

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विभांशु केशव एक ऐसे ही संवेदनशील लेखक हैं जो इन मुद्दों पर सोशल मीडिया में अपने चुटीले व्यंग्य रचनाओं के लिये चर्चित रहे हैं और अब अपनी पहली किताब के साथ आये हैं जिसका जिक्र हमने इस पोस्ट के शीर्षक में किया है।

लेखक ने संग्रह की पहली रचना को लिफाफा शीर्षक दिया है। रचना की पहली पंक्ति है- सुना है लिफाफा देख खत का मजमून भाँप लेते हैं…….। लिफाफा शीर्षक की रचना पढ़ने से पहले ही वो लिफाफा खुला हुआ है। वो लिफाफा गूगल कालीन भारत का आवरण चित्र है। जिसमें चेतावनी, निवेदन, करुणा और औद्योगिक सभ्यता की दयनीयता का चित्रण है। आवरण चित्र का लिफाफा विकास के नए आयाम छूती वर्तमान सभ्यता की विसंगति, विडम्बना और पाखंड को भी प्रदर्शित करता है। आवरण चित्र के रूप में लिफाफे को देखकर संग्रह नामक खत के मजमून की गंभीरता समझ में आ जाती है।

आवरण चित्र में तकनीकि का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। उसे प्रभाव कहें या दुष्प्रभाव या असंतुलन, ये संग्रह की रचनाएँ पढ़ने के बाद स्पष्ट हो जाता है। तकनीकि मानव जीवन को उन्नत और आसान बनाने वाली खोजें कर रही है। पर मानव का ही एक ‘पक्ष’ उन्हीं खोजों को मानव के लिए कोढ़ में खाज के रूप में स्थापित कर रहा है। मनुष्य का ‘डाटा’ प्राप्त कर उसे अपने इशारे पर नचा रहा है। पहले से व्याप्त सामाजिक, आर्थिक विसंगति के कोढ़ में तकनीकि ने ऐसी खाज पैदा की है, जिसके प्रभाव से मानव हास्यास्पद हो चला है। उसी हास्यास्पदता ने मानव को विसंगति, विडम्बना और पाखंड की कठपुतली बना दिया है। इस कठपुतली ने व्यंग्य को नए-नए विषय दिए हैं। साथ ही सामाजिकता, सामुदायिकता को नई-नई चिंताएँ भी दी हैं।

गूगल कालीन भारत में उन विषयों पर भी लेखक ने व्यंग्य लिखे हैं, जो संपादकीय या आर्टिकल के रूप में लिखे जाते हैं। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लेखक ने संपादकीय और आर्टिकल्स को व्यंग्य में ढालने में कामयाबी हासिल की है।

गूगल कालीन भारत में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, पत्रकारिता, शैक्षणिक विषयों पर आधारित कुल 26 व्यंग्य हैं। जिनका कंटेंट चौंकाता है। सोचने पर मजबूर करता है। लेखक व्यंग्य के माध्यम से ऐसे तथ्य सामने लाता है, जो कहीं-कहीं अवाक होने वाली स्थिति भी पैदा कर देते हैं। इस स्थिति में लाने का खतरा भी है। उन तथ्यों, विचारों को यूटोपिया कहकर खारिज किए जाने का खतरा- ऐसा नहीं होता या ऐसा नहीं हो सकता। पर मेरी समझ से ऐसा कहकर हम खुद से भागने की कोशिश करते हैं। भागने की हमारी यही कोशिश व्यंग्य के संबंध में हरिशंकर परसाई के कथ्य की याद दिलाती है- व्यंग्य स्वयं से साक्षात्कार कराता है।

गूगल कालीन भारत के व्यंग्य को पढ़ते समय ऐसा भी होता है, जब उनकी गंभीर विवेचना के कारण हास्य का अनुभव लगभग नहीं होता। मस्तिष्क में गंभीरता का ऐसा प्रभाव पैदा होता है, जिससे पढने की गति मंद पड़ जाती है।
तकनीकि के प्रभाव से मोबाइल, लैपटॉप पर दिन-रात धड़ाधड़ सार्थक-निरर्थक सूचनाएँ आ रही हैं। उन सूचनाओं तक पहुँचने के लिए हम तेजी से ‘स्क्रॉल’ करते जा रहे हैं। इस प्रक्रिया ने हमारे पढ़ने की गति तो बढ़ा दी है, पर सोचने-समझने की गति मंद कर दी है। अपनी व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से लेखक ठहरकर सोचने के लिए प्रेरित करता है। सोशल मीडिया पर हास्य प्रधान व्यंग्य की बहुतायत, या उन्हें पढ़ते-पढ़ते गूगल कालीन भारत के व्यंग्य पढ़ते समय ऐसा अनुभव भी होने लगता है कि व्यंग्य उबाऊ है। पर नहीं, जहाँ हम उबाऊ है सोचते हैं, वहीं लेखक व्यंग्य में हास्य का छींटा मार देता है। हास्य के छीटों से व्यंग्य की आत्मा पर चोट भी नहीं करता और अपनी बात भी कह जाता है। ये भी हो सकता है कि गूगल कालीन भारत इस परिचर्चा को भी नया आयाम दे कि क्या बिना हास्य के व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता ? या व्यंग्य में प्रयुक्त हास्य को किस श्रेणी में रखा जाय ? सिर्फ पाठक को गुदगुदाने, हँसाने वाला या पाठक को सोचने पर मजबूर करने वाला ?

एक युवा, उदीयमान लेखक अपने शुरूआती दिनों में अपने आदर्श की तरह लिखना चाहता है। लेखक के पहले व्यंग्य संग्रह गूगल कालीन भारत को पढने के बाद ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि लेखक अपने किस आदर्श की तरह लिखना चाहता है ? लेखक के आदर्श कौन-कौन हैं ? गूगल कालीन भारत पढ़ने के बाद व्यक्तिगत तौर पर मुझे ऐसा लगता है कि लेखक ने हरिशंकर परसाई और मुक्तिबोध के गद्य को छननी में छान व्यंग्य प्राप्त किए हैं। पूँजी और स्टेट के षड्यंत्रों और पूँजी, धर्म तथा राष्ट्रवाद के गठजोड़ ‘सत्ता’ को बेनकाब करते समय लेखक एदुआर्दो गलुआनो की याद दिलाता है।

लेखक एक पैरा के बाद दूसरे पैरा पर जिस अंदाज में जाता है, उसे देखते हुए मेरी समझ के अनुसार लेखक की अपनी शैली है। अपने पहले संग्रह में अपनी शैली प्राप्त कर लेना व्यंग्य की दुनिया में लेखक के भविष्य के प्रति आशांवित करती है।
लेखक के लिये खूब बधाई और शुभकामनाएं रहेंगी।

( किताब अमेजन पर उपलब्ध है )

सन्तोष कुमार सिंह
मुख्य प्रबंधक-आईसीडी नागपुर
कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड
रेल मंत्रालय के अंतर्गत
भारत सरकार का नवरत्न उपक्रम

 

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