काशी की बेटी और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के 159वें वीरगति दिवस पर दी गयी श्रद्धांजलि

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नारस। “बुंदेले हरबोलो से हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।” सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित झांसी की रानी कविता की ये पंक्तियां भला किसे याद नहीं। काशी की बेटी मणिकर्णिका (मनु और छबीली) ने आज ही के दिन 160 साल पहले रणभूमि में फिरंगियों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई में अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाली वीरांगना लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि भदैनी स्थित उनकी जन्मस्थली पर मंगलवार को मनायी गयी।

इस अवसर पर संकटमोचन मंदिर के महंत प्रोफ़ेसर विशंभर नाथ मिश्र ने कहा की वीरांगना लक्ष्मीबाई ने 1857 की लड़ाई अपने पराक्रम से पूरे देश में वीरता की एक ऐसी मिसाल की, उसके बाद से ही अंग्रेजो के पांव उखड़ना शुरू हो गये। उन्होनें अपने जिंदा रहते अपनी रियासत में अंग्रेजों को प्रवेश नहीं करने दिया, ऐसी महान विभूति का जन्म काशी के भदैनी मुहल्ले में हुआ है। यह हमलोगों का सौभाग्य है।

इस दौरान उन्होनें जिला प्रशासन से अनुरोध किया की ऐसी वीरांगना की जयंती व पुण्यतिथि के साथ-साथ, 15 अगस्त व 26 जनवरी को आयोजन कर उनकी स्मृति में आयोजन करे। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि वरूणेश चन्द्र दीक्षित ने वीरांगना को श्रद्वांजली देते हुए कहा की काशी की बेटी ने पूरे विश्व में काशी व देश का नाम किया जो इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने जो किया वो हमारे लिए बाहरी ताकतों से लड़ने की प्रेरणा है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए जागृति फाउण्डेशन के महासचिव रामयश मिश्र ने कहा की वराणसी के सांसद व देश के पी.एम. मोदी से मांग की वह रानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली वाराणसी से चलकर उनकी शहीद स्थली ग्वालियर जाने वाली बुंदेलखंड एक्सप्रेस ट्रेन का नाम बदलकर वीरांगना एक्सप्रेस ट्रेन करने की मांग की।