‘आदमी की जेब में जब पैसे अधिक हो जाते हैं, तब वो प्रयोगधर्मी बन जाता है’

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साधो, आदमी की जेब में जब पैसे अधिक हो जाते हैं, तब वो प्रयोगधर्मी बन जाता है। वो एक सीट वाली मोटरसाइकिल खरीदता है। दो सीट वाली कार खरीदता है। अमीरों का मनोरंजन भी महँगा होता है। वे मनोरंजन के लिए स्नूकर, बिलियर्ड और गोल्फ खेलते हैं। अमीरों का महँगा मनोरंजन उनका शौक कहा जाता है। अमीरों की नकल करने के लिए कोई कर्ज लेकर महँगा शौक पाले, तो उसे गरीब गुंडा कहा जाता है।

साधो, आदमी की तरह आर्थिक रूप से शक्तिशाली और विकसित देश भी मनोरंजन के लिए नए प्रयोग करते रहते हैं। विकसित देश के वैज्ञानिक भी मनोरंजन के महँगे शौक पालते हैं। विकसित देशों के वैज्ञानिक आज कल एलियन की खोज कर अपना मनोरंजन कर रहे हैं। उनका मनोरंजन देख आर्थिक रूप से कमजोर देश दुखी हो जाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर देश गरीब गुंडा बनने के लिए विकसित देशों के आगे झोली फैलाए खड़े हो जाते हैं- मालिक! कर्ज दो तो हम भी आपकी तरह मनोरंजन का महँगा शौक पालें।

साधो, आर्थिक रूप से कमजोर एक देश रेल की पटरी बिछा रहा है। तभी आर्थिक रूप से सुदृढ़ विकसित देश चाँद पर पहुँच गया। ये देख आर्थिक रूप से कमजोर देश रेल की पटरी बिछाना छोड़ विकसित देश के आगे झोली फैलाकर खड़ा हो जाता है- मालिक! कर्ज दो तो मैं भी चाँद पर घूम आऊँ। आर्थिक रूप से कमजोर एक देश सभी नागरिकों के लिए घर बनवाने की योजना बना रहा है। तभी आर्थिक रूप से सुदृढ़ विकसित देश चाँद पर इंसानी बस्ती बसाने की योजना तैयार करने लगता है। ये जान आर्थिक रूप से कमजोर देश विकसित देश के आगे झोली फैलाकर खड़ा हो जाता है- मालिक! कर्ज दो तो मैं भी अपने देशवासियों के लिए चाँद पर घर बनवा दूँ।

 

आर्थिक रूप से कमजोर देश प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान के लिए सेटेलाईट छोड़ रहा है। तभी आर्थिक रूप से सुदृढ़ विकसित देश मंगल ग्रह पर उतर गया। ये देख आर्थिक रूप से कमजोर देश प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल की चिंता छोड़ विकसित देश के आगे झोली फैलाकर खड़ा हो जाता है- मालिक! कर्ज दो तो मैं भी मंगल की यात्रा कर आऊँ।

साधो, आर्थिक रूप से कमजोर देश के नागरिक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अभी तक उनके देश में सभी नागरिकों को स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे मूलभूत अधिकार भी उपलब्ध नहीं हो सके हैं। पर जैसे ही देश मंगल ग्रह पर अपना रोबोट उतारता है, नागरिक भी सभी चिंताओं से मुक्त हो तालियाँ बजाने लगते हैं। नागरिक कई महीनों तक इस कल्पना में खोए रहते हैं कि कब वहाँ इंसान उतरेगा ? कब वहाँ मैं उतरूँगा ? अंतरिक्ष यात्री के सूट में मेरी सेल्फी कैसी लगेगी?


विभांशु केशव के व्यंग्य संग्रह ‘गूगल कालीन भारत’ से
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