कबीर ने बांग दे रहे मुल्ला पर तंज कसते हुए जब पूछा था कि क्या खुदा बहरा है, हिंदी साहित्य में कायदे से व्यंग्य का आग़ाज़ उसी दिन से हो गया था। कुफ्र से बचने के लिए वक्रोक्ति का सहारा लेना बहुत पुरानी रवायत है। संत-साहित्य तक इसका सिरा जाता है। कबीर के दौर से लेकर अब तक व्यंग्य ने बड़ा लंबा सफ़र तय किया है लेकिन इस रास्ते मे मील के पत्थर एक मील के बजाय कई-कई मील पर पाए जाते हैं। हिंदी में व्यंग्यकार का नाम गिनवाने को कहिए तो हिंदी का पढ़ा-लिखा आदमी शरद जोशी, हरिशंकर परसाई से आगे या पीछे नहीं जा पाएगा। कुछ सुपढ़ लोग श्रीलाल शुक्ला को भी व्यंग्यकार कह देते हैं। कुछ कुपढ़ लोग केपी सक्सेना और काका हाथरसी का नाम पकड़कर लटक लेते हैं। सन् पन्चानबे में हरिशंकर परसाई के निधन के बाद लंबा वक्ता बीता। विपुल मात्रा में कवियों को पैदा करने वाली हिंदी भाषा ढंग का एक व्यंंग्यकार पैदा नहीं कर पायी। विडम्बना यह है कि बीते ढाई दशक में इस ज़माने के तमाम खुदा वाकई बहरे हो चले, लेकिन उन्हें सुनाने की कबीराना ज़हमत उठाने की फिक्र लिखने वालों ने नहीं की।

इतने लंबे वक्फ़े के बाद हिंदी में एक व्यंग्यकार आया है। नाम है विभांशु केशव। कबीर की धरती की पैदाइश है गोकि पैदाइश की तिथि ज्ञात नहीं, जैसा उन्होंने अपने स्वप्रकाशित पहले व्यंग्य संग्रह में अपना परिचय देते हुए लिखा है। ‘’गूगलकालीन भारत’’ नाम का यह संग्रह अपने शीर्षक के माध्य‍म से व्यंग्य के इतिहास के साथ न्याय करता दिखता है। गूगल की पैदाइश 1996 की है। परसाई के निधन के साल भर बाद, जब लैरी पेज और सर्जेइ ब्रिन ने इस पर काम करना शुरू किया था। दो साल बाद गूगल अपने मौजूदा स्वरूप में अवतरित हुआ। आज पूरी दुनिया गूगल पर है और गूगल पूरी दुनिया में। दुनिया में खोज करने वाले साइबर इंजनों के बीच गूगल की हिस्सेदारी 92 फीसदी है और भारत के 98 फीसदी बाज़ार पर इसका कब्ज़ा है। आधुनिक विश्व‍ की कल्पना गूगल के बगैर अधूरी है। गूगल ने बीते दो दशक में दुनिया और समाज ही नहीं बल्कि मनुष्य को बुनियादी रूप से बदल दिया है।

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ऐसे में बहुत मुमकिन है कि विश्व युद्ध से शुरू होने वाले आधुनिक इतिहास का अगला अध्याय गूगलकालीन इतिहास ही हो। विभांशु ने इस मायने में शीर्षक अच्छा चुना है। यह शीर्षक हमारी समकालीन दुनिया और समाज का अक्स है। यह समाज अपनी विभिन्न विडंबनाओं के साथ किताब के भीतर अलग-अलग अध्यायों में उपस्थित है। संग्रह में शामिल लेख फेसबुक पर अलग-अलग समय में लिखी टिप्पणियों का संशोधित संकलन हैं।

पुस्तक के पीछे वाले कवर पर लेखक ने अपना परिचय लिखा है। व्यंग्यकार की दृष्टि सबसे पहले खुद पर होती है। सच्चेे अर्थों में जो व्यंग्यकार होता है वह औपचारिकताएं नहीं बरतता। रूढि़यों के चक्कर में नहीं पड़ता। विभांशु केशव का परिचय इसका गवाह है, जिसमें वे लिखते हैं कि उनका साहित्यिक परिचय लगभग शून्य़ है। पुस्तक के स्वप्रकाशन की वजहें समझना मुश्किल नहीं है।

लेखक ने पुस्तक ‘’अपनी गलतियों’’ को समर्पित की है। यह भी रूढ़ से विक्षेप है। पुस्तक के कवर पर बना रेखांकन आधुनिक दौर की ‘’मिनि‍मल’’ विचारधारा को चुनौती देता है। भरे पूरे गाढ़े रंगों में तीन मानवीय और एक पशु आकृति से मिलकर बना आवरण चित्र चेतना के विक्षेप को दिखाता है। इसमें अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जा रहे माता-पिता बच्चे का हाथ पकड़ने के बजाय कुत्ते का पट्टा पकड़े हुए दिखते हैं क्योंकि दोनों मोबाइल फोन पर व्यस्त हैं।

गूगलकालीन दुनिया की विचारधारा मिनिमल है, न्यूनवादी है। यहां शॉर्टकट से काम चलता है। डिज़ाइन हो तो न्यूनतम, विचारधारा हो तो न्यू‍नतम, सरकार हो तो न्यूनतम। याद करें नरेंद्र मोदी का मिनिमलिस्टी नारा, ‘’मिनिमम गवर्नमेंट’’। कवर पर दिख रहा दंपत्ति इसी मिनिमल में फंस गया है लेकिन उसे दर्शाने वाली रेखाएं मैक्सिमल हैं। यह कलाकार का विद्रोह है। जिसे अंग्रेज़ी में आयरनी कहते हैं, वह पुस्तक के आवरण पर ही स्पष्ट है।

यह आयरनी भीतर के पन्नों पर सुघर भाषा और अतिसूक्ष्म प्रेक्षण के संयोग से घटित होती है। लेखक मिनिमल का आलोचक है, इसके लिए वह मैक्सिमल शैली अपनाता है। पूरी डीटेलिंग के साथ लेखन। जैसे कोई बात छूट न जाए। यह व्यंग्य में दोस्तोेयेव्सकी होना है। विस्तार के अपने खतरे भी होते हैं। फोकस छूट जाता है। यह लेखक फोकस विरोधी है। वह विवरणों को परत दर परत खोलते हुए व्यंग्य का सृजन करता है। परतों के बीच व्यंग है। व्यंग में गहन बौद्धिकता, कल्पंनाशीलता और इतिहासबोध का सम्मिश्रण है। मुक्तिबोध ने कविता लिखी थी ‘’चांद का मुंह टेढ़ा है’’। इसे फेस वैल्यू पर ले लिया गया। चूंकि चांद का मुंह वाकई टेढ़ा दिखता है तो साहित्य में इस कविता के शीर्षक को चमत्कारिक माना गया क्योंकि अब तक किसी ने इस तरह से कहा नहीं था। हिंदी में ऐसा चमत्कार दोबारा छह दशक बाद हुआ है जब एक व्यंग्यकार चांद का मुंह सीधा करने की बात लेखकों की ईर्ष्या के हवाले से लिख रहा है। ‘’ईर्ष्या सद्गुण है’’ में विभांशु लिखते हैं: ‘’वे साहित्यकार, जिनकी साहित्येतर गतिविधियां आलोचना और समीक्षा हैं, ईर्ष्यां की सीढ़ी के सहारे इतने ऊपर पहुंच गए हैं जहां से वे अपने हाथ से चांद का मुंह सीधा कर सकते हैं। चांद को कफ़न ओढ़ा सकते हैं।‘’

विभांशु केशव का व्यंग चमत्का़रिक है। ताज़ा है। प्रयोगधर्मी है। लीक को तोड़ता है। पूंजीवाद को भारत के संदर्भ में समझते हुए लेखक को वह भूत की तरह दिखता है। ‘’भूत का लोटा’’ में विभांशु भूत के बारे में लिखते हैं: ‘’पूंजीवाद की तरह ये भी नज़र नहीं आता। पूंजीवाद और भूत के बीच बाप-बेटे का रिश्ता है। पूंजीवाद ने अपने मैनेजर ब्राह्मणवाद की आर्थिक तरक्की के लिए कई उत्पादों की रचना की है। भूत उन उत्पादों में एक है।‘’ एडम स्मिथ के अदृश्य हाथ को सीधे सीधे भूत अब तक किसने कहा था? उसकी भारत के ब्राह्मणवाद के संदर्भ में सादृश्यमता किसने बैठायी? लेखक एडम स्मिथ के भूत का इलाज कबीर में पाता है- ‘’अगर कबीर को पागल घोषित नहीं किया जाता तो उनकी वाणी डर आधारित पाखंड की सत्ता से होने वाली तरक्की पर लगाम लगा देती।‘’

कबीर को पागल ठहराने की व्याख्या भी लेखक करता है: ‘’ब्राह्मणवाद पागल को ब्रह्मास्त्र की तरह प्रयोग करता है। जिसने भी पाखंड की सत्ता का मान-मर्दन किया, ब्राह्मणवाद उसे पागल घोषित कर देता है।‘’ ‘’भूत का लोटा’’ का ही विस्तार ‘’आत्मा की पुकार’’ है, जहां श्रेष्ठता भूत बन कर सामने आती है। श्रेष्ठताबोध आत्मा की पुकार पर भारी पड़ जाता है। इसी क्रम में ‘’पूंजी के ज्योतिषी’’ और ‘’विकास की रेसिपी’’ को भी पढ़ा जाना चाहिए।

आत्मा़, ब्रह्म, भूत, पूंजी आदि की अवधारणाओं से इतर एक अहम चीज़ है मस्तिष्क , जो हिंदी के साहित्यिक लेखन में दुर्लभ हो चली है। हिंदी का लेखक आत्मा की तो सुनता है, उसका मस्तिष्क लेकिन बोलता ही नहीं। विभांशु के  व्यंग्यों में पशु चरित्रों की बारंबारता और उनसे संवाद को पढ़ते हुए दार्शनिक विटगेंस्टाइन की मस्तिष्क की व्यााख्या याद हो आती है। विटगेंस्टाइन मानते थे कि मस्तिष्क कोई छुपी हुई, अंतर्भूत वस्तु नहीं बल्कि सार्वजनिक है। वे मनुष्य को महज भौतिक पदार्थ के रूप में देखने के बजाय उसे उसके मस्तिष्क की छाया में देखते थे और कहते थे कि यह मनुष्य का निजी मामला नहीं, सार्वजनिक है। बिलकुल सतह पर है। इस लिहाज से जब हम पशुओं को देखते हैं तो उन्हें महज भौतिक पदार्थ मानने के बजाय मस्तिष्कवान प्राणी मानना पड़ेगा, जिनका बोलना कुछ सार्थकता रखता है।

विटगेंस्टाइन की इस अवधारणा को रेमंड गाइता ने ‘’दि फिलॉसफर्स डॉग’’ नाम की अपनी एक दिलचस्प पुस्तक में व्याख्यायित किया है। कुछ साल पहले इस किताब को पढ़ते हुए ओशो रजनीश की ज़ेन कथाओं का सहज स्मरण हो आया था जहां एक ज़ेन भिक्षुक प्राय: किसी कुत्ते के साथ विचरण करता होता था। कुत्ते दार्शनिकों को प्यारे होते हैं, लेखन का इतिहास इसका गवाह है। ‘’पागल की डायरी’’ में लू शुन एक कुत्ते का जि़क्र करते हैं जो उनकी गली में पड़ा रहता था और उन्हें देखकर मुस्कुराता था और पीछें जाएं तो महाभारत में पांडवों के साथ स्वर्ग जाते वक्त एक कुत्ते का जि़क्र आता है। मध्यकाल में हुआ गयासुद्दीन तुग़लक अन्य राजाओं की तरह अपने पास कई पशु रखता था लेकिन अपने कुत्ते के मरने पर उसे सबसे ज्यादा दुख हुआ था। दिल्ली के तुगलकाबाद किले के ठीक सामने तुग़लक का जो मकबरा है, उसमें कुत्ते की भी मज़ार है। तुग़लक दार्शनिक प्रवृत्ति का राजा था। उसने तुग़लकाबाद किला बनवाया लेकिन पानी न होने के चलते कभी उसमें रह नहीं पाया। अपने बेटे के पास मोर्चे पर गया था, वहां से लौटते में गुज़र गया। निज़ामुद्दीन औलिया ने ‘’हनूज़ दिल्लीय दूरस्त’’ यानी दिल्ली दूर है इसी संदर्भ में कहा था।

दिल्ली के कुत्ते टम्पी के साथ विभांशु का एक प्रसंग इस संग्रह का सबसे मारक व्यंग्य है। वहां दर्शन है, समाज विज्ञान है, एक जिरह है और बदलते हुए समाज में मस्तिष्क विहीन होते मनुष्य की छवियां हैं। कुत्ते के साथ संवाद की शैली में लिखा गया यह व्यंग्य अव्वल तो इस बात की पुष्टि करता है कि दार्शनिक मन का कुत्तों के साथ कुछ तो जुड़ाव है। फ़ैज़ ने यूं ही गलियों के आवारा कुत्तों के साथ एकजुटता जताते हुए कविता नहीं लिख दी थी। टम्पी गली का एक आवारा कुत्ता है, लेकिन लेखक की धारणा को वह तोड़ता है। केवल भौकता ही नहीं काटता भी है, जबकि दिल्ली के कुत्ते केवल भौंकते हैं। ‘’मुझे काटने वाले कुत्ते के नाम’’ में टम्पी एक पशु की तरह नहीं, एक मस्तिष्क की तरह हमारे सामने खुलता है। यह तकनीक ‘’स्टीकर काल’’ में भी प्रयुक्त हुई है गोकि वहां कुत्ते की जगह एक बछड़ा है जो चुनाव लड़ना चाहता है और इसकी तरकीबें लेखक को बताता है।

व्यंग्य में पशु चरित्रों के प्रयोग को तकनीक कहना ठीक नहीं होगा। वक्रोक्ति में पशुओं का आलंबन सबसे आसान और अहानिकर होता है लेकिन दिक्कत यह है कि कुत्ते या गदहे या कौवे अथवा किसी भी लोकप्रिय पशु के माध्यम से इतना कुछ पहले कहा जा चुका है कि अब कुछ मौलिक कहने को बच नहीं रहा। पशुओं के साथ संवाद के विभांशु के प्रयोग इस अर्थ में बिलकुल मौलिक कहे जा सकते हैं।

संग्रह में कुछ कमज़ोर रचनाएं भी हैं लेकिन उनका होना ही लेखक के मजबूत बिंदुओं को उभारता है। लेखक के दो मजबूत पक्ष हैं- डीटेलिंग और उपमाएं। उपमाओं की अधिकता कभी-कभार पाठ को बोझिल भी बना देती है लेकिन इसे स्वप्रकाशन और स्वसंपादन के खाते में डाला जा सकता है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि तकरीबन एक अनुशीलन के बतौर व्यंंग्य लेखन करने वाले विभांशु की रचनाओं पर साहित्यिक सुधीजनों की निगाह नहीं गई जबकि वे लंबे समय से फेसबुक पर लिख रहे हैं। हिंदी के जगत से पिटी लगी स्वार्थों की दीमकों ने ऐसे ही अतीत में प्रतिभाओं का नाश किया है। भला हो गूगल का जिसने स्वप्रकाशन का एक अवसर नए लेखकों को मुहैया कराया जिससे वे खुद अपनी रचनाओं को दुनिया के सामने लाने में सक्षम हुए। गूगलकालीन भारत का एक और अर्थ यहां भी खुलता है।

कुल दो दर्जन से ज्यादा लेखों की चर्चा करना यहां संभव नहीं है। विभांशु केशव के लेखन में अटूट संभावनाओं को दर्शाते उनके लिखे दो वाक्यों के साथ बात पूरी करूंगा, लेकिन उससे पहले मरहूम नामवर सिंह द्वारा अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी के लिए साक्षात्कार का एक प्रसंग उद्धृत करना उपयुक्त जान पड़ता है। नामवर जी ने अपने गुरु से पूछा था सुख क्या है। उन्होंने जवाब दिया था- जब अपनी बात कोई समझ ले। दूसरा सवाल था दुख क्या है। गुरु ने कहा- जब अपनी बात कोई न समझे। मार्क्सवादी लतीफ़ों की दुनिया में इसे कुछ यों कहते हैं कि अपना गुंडा कामरेड, तुम्हारा कामरेड गुंडा। विभांशु इसी बात को कुत्तों के सहारे कहते हैं।

‘’मिलने पर दोनों के कुत्ते एक दूसरे से बात करते हैं। वे दोनों अपने कुत्तों की बातें सुनते हैं। एक दूसरे से बात नहीं करते। जब कभी एक दूसरे से बात करते हैं तो कुत्तों के सुख दुख की चर्चा करते हैं। दोनों ने आदम के सुख दुख को कुत्तों के सुख दुख से रिप्लेस कर लिया है। सुख उनका कुत्ता है। दुख दूसरों का कुत्ता है।‘’

‘’अपना कुत्ता सुख, दूसरे का कुत्ता दुख’’। ‘’नेबर्स एनवी, ओनर्स प्राइड’’ को इतने कल्पनाशील और इतने बारीक तरीके से कहने वाले लेखक का स्वागत व्यंग की दुनिया को बहुत कायदे से करना चाहिए था। अफ़सोस, कि गूगलकालीन भारत में पैदा हुआ यह व्यंग्यकार अपनी बिरादरी में निपट अकेला है। यह उसकी कमज़ोरी है तो यही उसकी ताकत भी है।

अभिषेक श्रीवास्तव
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं
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