गंगा की लहरों पर नज़र आया बायो टॉयलेट, शुरू हुआ विरोध

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नारस। काशी में यदि कोई आता है तो उसका पहला पग मां गंगा के आचमन के लिए बढ़ता है। मां गंगा उसे असीम प्यार से अपने पास बुलाती हैं और बरसों की इच्छा पूर्ती कर उसे तृप्त करती हैं। काशीवासियों के मां गंगा अमृत समान हैं जिसे देख और पीकर बनारसी अपने दिन की शुरुआत करते हैं पर आस्था के इसी मंदिर पर चोट पहुंचाने का कार्य किया गया है।

काशी के प्रसिद्ध घोड़ा घाट और अब राजेंद्र प्रसाद घाट के सामने गंगा की लहरों पर जब काशीवासियों ने आचमन के दौरान बायो टायलेट तैरता देखा तो उनका आक्रोश फूट पड़ा है। कहने को यह बायो टायलेट है पर आस्था को चोट पहुंचाने के लिए इसमें लगा टायलेट शब्द ही काफी है।

जहां पूजा पाठ वहां मूत्र विसर्जन महापाप
गंगा के ऊपर सामने की तरफ़ बायो टॉयलेट के निर्माण से काशीवासियों में रोष व्याप्त है। उनका कहना है कि धार्मिक लिहाजे से ये कदम ठीक नही है। यहाँ लोग पूजा पाठ करने आते है औऱ यही सामने मल मूत्र विसर्जित हो ये धर्म के नाम पर पाप है। इसका विरोध धर्म गुरुओं ने भी किया ,भले ही स्वच्छता को देखते हुए इसे सही क़दम कहा जरूर मगर धार्मिक दृष्टिकोण से ये उनकी नजर में गलत है।

आस्था के साथ खिलवाड़ है ये
इस सम्बन्ध में पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर बाबा बालक दास ने कहा कि मोक्षदायिनी गंगा के जल को अमृत कहा जाता है। इसका आचमन करके व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है। इस धार्मिकता को सदियों से हमारी संस्कृति के साथ जोड़कर पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। उसी माँ गंगा के ऊपर बायो टॉयलेट का निर्माण करना गलत है और आस्था के साथ खिलवाड़ है।

बनारसी नाराज़
फक्कड़ मिजाज़ बनारसी से हमारी जब इस संदर्भ में बात हुई तो वो भड़कते हुए हमसे ही पूछ बैठा की ये बायो टॉयलेट सभी को गलत लग रहा यहा पर सिर्फ हम ही गलत क्यों ठहराये, अगर बनवाना ही था तो थोड़ी दूरी पर बनवाये होते, एकदम से बीचो बीच, सामने नाव पर बनवाने का क्या मतलब है ,यही पूजा -पाठ हो औऱ यही पर गंगा में आकर लोग गंदगी कर के चले जाएं क्या ये उचित है, ये सारी गंदगी गंगा के जल में जाकर गिरती है तो क्या गंगा का जल शुद्ध रह पाएगा।

यह गंगा मां का अपमान
साधु-संतों का भी इस व्यवस्था पर सवाल उठाया कि धर्म के नाम पर ये खिलवाड़ क्यों ,स्वच्छता को अगर बढ़ावा देना ही है तो बायो टॉयलेट का निर्माण गंगा के पानी में नाव के ऊपर नही कराना चाहिए था, इससे धार्मिक भावनाएं आहत होंगी। श्रीमद भागवत कथा का वाचन करने वाले आशीष कृष्ण शास्त्री ने कहा कि हम घाटों पर माँ गंगा की पूजा करने जाते हैं वहां मंत्रोच्चार करते हैं औऱ वही सामने बायो टॉयलेट जहाँ गंदगी उत्सर्जित हो ये कहां तक सही है ,ये सोचने वाली बात है इसपर विचार करना चाहिए। उन्होंने साफ़ लफ़्ज़ों में कहा कि यह गंगा का अपमान है।

अन्य सन्तो ने भी इसे धार्मिक नजरिये से गलत ठहराया, मगर स्वच्छता के नजर से उनका ये भी कहना था कि मल मूत्र त्यागने के वक़्त इंसान बेबस हो जाता हैं जब उसे कोई स्थान नही दिखता उस स्थिति में वो घाटों पर ही गंदगी फैला देता है, जिसकी वजह से रोग फैलने के साथ- साथ गंदगी का गंगा के पानी में बहकर जाने की वजह से जल भी प्रदूषित होता है उस लिहाज से हो सकता है ये कदम ठीक हो मगर धर्म के नजरिए से गलत है।